अस्तित्व

अम्बा … पर्वतों की छाँव पिथौरागढ़ में रहनेवाली है । उसकी पांच बेटियां व एक बेटा सुधीर है । बचपन से ही पांच बहिनों में सबसे छोटा सुधीर माँ का बेहद दुलारा था । सुधीर को आज भी वो दिन याद है जब वह चार वर्ष का था और उसके पिता की खाई में गिरने से मृत्यु हो गई थी । माँ का चूड़ियाँ तोडना … रोना तड़पना … आज भी उसकी आँखें नम कर देता है ।कितनी अकेली हो गयी थी वो |बिलकुल टूट सी गयी थी |
पहाड़ों पर रहने वाले ही जानते हैं की उनकी जिंदगी कितनी कठिन होती है | पर्वतों पर रहने वालों को पर्वत सा ही कलेजा चाहिए | तभी तो अम्बा ने बड़ी हिम्मत से घर को संभाला । कम उम्र , पति का वियोग , बच्चों की जिम्मेदारी … लड़कियों की शादी की चिंता ऊपर से स्वयं उसका अल्प शिक्षित होना । पर वो अटल दुःख के इन थपेड़ों से टकराती रही । पर इस पहाड़ के अन्दर एक नदी भी बहती थी , बिलकुल मीठे पानी की , अपने बच्चों की खातिर , तभी तो दिन – रात मेहनत करके दूसरों के खेतों में मजदूरी करके वह जब घर आती तो सुधीर को अपनी गोदी में लिटा कर लोरी सुनाना नहीं भूलती ।पहाड़ी लोक लोक गीत और उनकी मिठास …. सुधीर भी बहार से कठोर और अन्दर से मुलायम होता चला गया |

कभी – कभी नन्हा सुधीर माँ के गले में बाहें डाल कर पूंछता, ” माँ एक बात बताओ तुम इतना सब कुछ कैसे कर लेती हो “। अम्बा अपनी एक अंगुली उठाकर उठाकर पहाड़ की तरफ इशारा कर के कहती … मैं उस पहाड़ की तरह हूँ जो तेज़ आंधी तूफ़ान में भी अडिग रह कर अपने ऊपर जमी घास का बाल भी बांका नहीं होने देता ।पर जब – जब जीवन में विपरीत परिस्तिथियाँ आती हर बार माँ के प्रति चिंतित व् आदर भाव से भरे सुधीर का यही प्रश्न होता … और माँ का यही उत्तर होता । सुधीर को उसकी माँ की हर बात अच्छी लगती, उसकी मेहनत … उसका प्रेम … उसकी तपस्या । सब कुछ देख कर वो सोंचता जब मैं बड़ा हो जाऊँगा तो माँ का खूब ध्यान रखूँगा। कोई दुःख नहीं होने दूंगा उसे |
पर जैसे चाँद में दाग होता है | एक बात उसे भी माँ की बिलकुल अच्छी नहीं लगती थी, कि चाहे खुद कितनी कंगाली में रहे पर दूसरों को कुछ देने की बात आये तो सबसे आगे बढ़ कर सहायता करती | अपने लिए कुछ बचाने का सोंचती ही नहीं , यहाँ तक की खाना भी | पड़ोस के बच्चे अक्सर खाना खाने के समय आ जाते तो अंपने लिए बनाया खाना वह उन बच्चों को खिला खुद पानी पीकर सो जाती थी । एक दिन सुधीर ने माँ से पूंछ ही लिया ‘ माँ तुम ऐसा क्यों करती हो ‘। माँ हंसकर जवाब देती कहा ना मैं उस पहाड़ की तरह हूँ जब कोई मेघ मुझसे टकराता है तो मैं हर तरफ वर्षा करती हूँ । केवल अपने लिए नहीं दूसरों को देने में मुझे सुख मिलता है ।
माँ और पर्वत ये उपमा सुनते सुनते सुधीर बड़ा अफसर बन कर मुंबई चला गया | उसकी शिक्षा माँ की ही त्याग तपस्या का फल थी , और उसकी पसंद उसके जीवन में उजाला करने के लिए आई मुंबई की ज्योति पर भी माँ ने सहजता से अपनी पसंद की मोहर लगा दी | और विवाह के पवित्र सूत्र में बंध ज्योति व् सुधीर एक हो गए ।ज्योति सुधीर के मुंह से अम्बा की तारीफे सुनती रहती , वो जानती थी सुधीर के मन में अम्बा के लिए बहुत सम्मान है , इसीलिए तो उसने ही सुधीर के आगे ” माजी को अपने पास लाने का प्रस्ताव रखा था | इधर अम्बा पहाड़ की मिटटी में घुल मिल सी गयी थी | पड़ोस के बच्चों , रोज के काम और पहाड़ी लोक गीत … दिन तो कट ही जाता था | पर रात घिरते ही पुत्र मोह जाग उठता | सुधीर को देखने की इच्छा बलवती होती | पर मन में तसल्ली कर लेती , चलो , ” ज्योति जैसी पत्नी उसके जीवन में जो उसका पूरा ध्यान रखती है व् सुधीर भी तो उसे बहुत प्रेम करता है | उसका क्या है ? पूरा गाँव ही उस का घर है , बची खुची जिन्दगी भी कट ही जायेगी | फिर भी माँ की सेवा करने के लिए सुधीर उसे गाँव से अपने पास ले चलने के लिए आया , तो उसकी ख़ुशी छिपी न रह सकी , आँखों के रास्ते निकल ही गयी | गाँव वाले स्नेह से उलाहना देने लगे ,” अब पहाड़ नदी बन कर मैदानों को हरा- भरा करने चला है |”
पर जैसा सोंचा था हुआ उसका उल्टा । ना तो अंग्रेजी सभ्यता में पली बढ़ी ज्योति अम्बा को भाई और ना ही बात बात पर रीति रिवाज़ और पहाड़ की बात करने वाली अम्बा ज्योति को । तनाव बढ़ने लगा ।दोनों लाख कोशिश करतीं पर किसी न किसी बत पर विवाद हो जाता | घर का माहौल बिगड़ जाता |पहाड़ी और मैदानी दो सभ्यताओं की टकराहट हो रही थी | पहाड़ी नदी का उफान मैदानों में बाढ़ लाता , तो कभी मैदानी तपिश पहाड़ पर बेमौसम बरस जाती | प्रेम की धारा विवादों के कीचड में तब्दील होने लगी | ऐसा कीचड जिसमें कमल नहीं खिलते , तभी तो मुरझा गया था सुधीर |किसकी तरफ से बोले … एक तरफ माँ है जिसने लाख मुसीबत झेल कर उसे पाला है दूसरी तरफ पत्नी है जो आजन्म उसकी सहचरी है । वह दोनों के बीच पिसने लगा और उसका स्वास्थ्य दिन प्रति दिन बिगड़ने लगा । दोनों उसके लिए चिंतित थीं पर प्रेम का धागा जो ज्योति और अम्बा के बीच टूट चूका था , वह जुड़ने से भी नहीं जुड़ पा रहा था । सुधीर का स्वास्थय बिगड़ता जा रहा था ।
एक दिन जब सुधीर घर लौटा तो माँ दिखाई नहीं दी । ज्योति से पूंछा , पर उसने भी अनभिज्ञता दिखाई | मन में उठते अनेकों प्रश्नों हल के रूप में मेज पर राखी एक चिट्ठी दिखाई दी । सशंकित हृदय से सुधीर पढने लगा , ” बेटा मैंने तुम्हे कई बार बताया की मैं पहाड़ हूँ । आज मैं तुम्हें तुम्हारा परिचय देती हूँ । तुम पहाड़ से निकलने वाली नदी हो । तुम मुझसे निर्मित हो । मैं दूर रहकर मैं धीरे धीरे पिघल कर तुममे संचार करती रहूंगी । पर मैं तुम्हारे साथ चल नहीं सकती क्योंकि जिस दिन मैं तुम्हारे साथ चल दी तो तुम्हारा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा ।
तुम्हारे अस्तित्व की रक्षा के लिए मेरा दूर रहना ही जरूरी है ‘ ।
पत्र पढ़कर सुधीर के साथ साथ ज्योति की आँखें भी गीली हो गयी । पहाड़ बारिश लाते हैं, पर इस तरह से इसकी कल्प्ना किसी को नहीं थी |
वंदना बाजपेयी
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