स्वागत करिए प्रतियोगिता का

स्वागत करिए  प्रतियोगिता का

        ६ साल का  नितिन अ ब स द लिखने की जगह लग गया पेंसिल से
आडी  –तिरछी रेखाएं खीचने में | माँ ने बड़े
दुलार से कहाँ पढ़ते समय अगर ये सब हरकते करोगे तो क्लास में प्रथम कैसे आओगे | जब
ध्यान  लगा कर पढोगे तो क्लास में फर्स्ट आओगे
| तब तुम्हारा रिजल्ट  देते समय मैम और
बच्चे  सबसे ज्यादा तालियाँ बजायेंगे  | 
नितिन खुश हो कर पढने में जुट गया | राधा आजकल नृत्य का बहुत जयादा अभ्यास
कर रही है | उसे अपने स्कूल के डांस फंक्शन में ढेर सारे बच्चो के बीच में सेलेक्ट
होना है | दसवी बारहवी के बोर्ड के  एग्जाम
के दिनों में हमारे मोहल्ले में बहुधा पिन ड्राप शांति रहती है | जिससे बच्चे
अच्छे से पढाई कर सके व् अच्छे नंबरों से पास हो सके | रीना और सुहाना जी आजकल
स्कूल में बहुत मेहनत कर् रही हैं |  दोनों
में से एक को प्रधानाचार्या  बनना है |
जबसे स्वेता जी ने दो कामवालियाँ लगा ली हैं ,तब से दोनों ठीक से काम करने लगी हैं
जिससे उनकी जगह दूसरी न ले ले |

स्वागत करिए  प्रतियोगिता का    

           Welcome to the competition

           एक अनार सौ बीमार | जब चीज
एक हो और उसको चाहने वाले कई तो प्रतियोगिताओ से गुजरना ही पड़ता है | यह जीवन का
अभिन्न अंग हैं | परन्तु उस दिन  मेरे
पड़ोसी रमेश जी यूँ ही बातों बातों में कहने लगे | इन प्रतियोगी परीक्षाओं की वजह
से बच्चे कितने दवाब में रहते हैं | क्या जरूरत है ऐसी प्रतियोगितो की जो हमारे
बच्चो की जान ही ले ले | मैंने उनकी बात तुरंत काट कर कहा “ये प्रतियोगिताएं नहीं
हैं , जो हमारे बच्चों पर अनावश्यक दवाब बना रहीं हैं |  यह दवाब माता –पिता व् समाज के द्वारा  बच्चे की रूचि व् क्षमता को जानते बूझते हुए भी
उन्हें उनके  मन के विरुद्ध किसी अनावश्यक
प्रतियोगिता में उतारने से बनता है | रमेश जी थोड़े सहमत हुए थोड़े असहमत बात आई गयी
हो गयी |

          उस दिन बेटी का मेडिकल परीक्षा का परिणाम
निकला | एक प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में उसका चयन हो गया था | उसके  साथ –साथ हमारा चेहरा भी गर्व से भर गया था |
मुझे याद आने लगा वो दिन जब उसने मेडिकल में जाने की इच्छा जताई थी | मैंने उसे उस
कठिन प्रतियोगिता ( जहाँ चयनित अभ्यर्थी का प्रतिशत परीक्षा देने वाले
अभियार्थियों की तुलना में बहुत कम होता है )के बारे में समझाते हुए कोई अन्य क्षेत्र
चुनने को कहा था |  बेटी अड़  गयी |उसने कठोर परिश्रम किया और विजय हांसिल की
| इस जीतने की अदम्य  इच्छा  शक्ति की वजह से ही उसने जूनून की हद तक पढाई की
थी | बर्नौड़ शॉ ने कहा भी है ………. 

“ हम अपने जीवन का लक्ष्य न पा सके
इससे ज्यादा दुखद ये है कि हमारे जीवन में कोई लक्ष्य ही न हो “ 

कुछ पाने की
इच्छा  रखना और उसे प्राप्त करने के लिए
अनवरत प्रयास ही जीवन को गतिशील बनता है | अन्यथा 
मोनोटोनस स्थिरता के तालाब  में  जिन्दगी सड़ती  रहती है |

निकालिए अपने मन से प्रतियोगिता का डर


               आज्  बेटी का उत्साह  देखकर मुझे फिर से प्रतियोगिता विरोधी रमेश जी
याद आ गए | खाली रमेश जी ही क्यों ऐसे बहुत सारे लोग चलते –फिरते टकरा जाते हैं ,जो
प्रतियोगिताओ को सिरे से नकारना चाहते हैं | बच्चे  अक्सर प्रतियोगिता की बात पर  डरा दिए जाते हैं | ये डर असुरक्षा और प्रतिरोध
की भावना उत्पन्न करता है | यह ठीक वैसा ही है जैसे ससुराल के लिए लडकियाँ पहले से
ही इस कदर डरा दी जाती हैं कि  आगामी भविष्य
में विद्रोह व् विवाद तय है | अगर आप भी कॉम्पटीशन फोबिया “ से ग्रस्त हैं तो जरा
मेरी बातों पर ध्यान दीजिये | क्योंकि जहाँ तक मेरा मानना है …..

प्रतियोगिता हमारे जीवन का जरूरी हिस्सा हैं 


 हम प्रतियोगिता
से कभी बच  ही नहीं सकते… ये  जीवन अपने आप में एक प्रतियोगिता है | भ्रूण
अवस्था से ही जीवन और मृत्यु के बीच एक प्रतियोगिता शुरू हो जाती है | मनुष्य हो ,
पशु-पक्षी या पेड़ पौधे जब तक अपने को जीवन की कसौटी पर खरा सिद्ध नहीं कर देते तब
तक जन्म ही नहीं ले सकते | प्रसिद्द वैज्ञानिक डार्विन ने २० वर्षों तक डार्विन
फिनजिस पर प्रयोग कर “ सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट “ का नियम दिया | जो प्रकृति से
भिड़ने के  योग्य है ,वही जन्म ले सकता है
और जन्म लेने के बाद भी बैक्टीरिया ,वायरस से हमारे प्रतिरक्षी तंत्र की
प्रतियोगिता तो चलती ही रहती है | जीते तो हम अगले दिन अपने स्कूल काम या ड्यूटी
पर मौजूद  रह सकते हैं अन्यथा हाजिरी
अस्पताल में लगती है  | कहने का तात्पर्य यह
है कि जो चीज प्रकृति प्रदत्त है वो गलत नहीं हो सकती | लाख चाहे भी तो हम किसी
प्राकृतिक  प्रतियोगिता को नकार नहीं सकते
|

स्कूल में बच्चों के बीच में प्रतियोगिता  डालती है परिश्रम की आदत 


             स्कूल में बच्चों के बीच
में प्रतियोगिता हो या न हो इस विषय पर अक्सर बहस होती रहती है | कुछ लोगों का
मानना है की सभी बच्चों को प्रतियोगिताओ से दूर रखना चाहिए | पर अगर प्रतियोगिता न
हो तो कौन बच्चा पढना चाहेगा | जो लोग शिक्षा के क्षेत्र में हैं ,वो भली भांति
जानते हैं कि  जबसे आठवीं तक सब को पास
करने का नियम आया है तब से कई बच्चे ऐसे हैं जो अगली कक्षा में चले जाते हैं पर
उन्हें पिछली कक्षा का विषय  का ज्ञान ठीक
से नहीं होता | एक कमजोर नीव पर एक ईंट और रख दी जाती है | आगे भवन कर भडभडाकर  गिरना तय है| नवी  ,दसवी में जब इन्हीं बच्चों की वस्तु स्थिति  माता –पिता व् समाज के सामने आती है ,तो ये कुंठा व् निराशा के शिकार हो जाते हैं
| जीवन के वो स्वर्णिम  वर्ष जब उन्हें
पूरा जोर लगा कर सुनहरा भविष्य सुनिश्चित करना होता है ,निराशा के गहन अन्धकार में
डूब जाता है | तब इस प्रतियोगिता विहीन व्यवस्था में खामियाँ  नज़र आती है | काश तब थोड़ी कड़ाई बरती गयी होती तो
हम भी खेल कूद में समय व्यर्थ न करते |
 प्रतियोगिता का सबसे अच्छा उदाहरण हैं खेल – कूद   
फिर खेल कूद तो प्रतियोगिता का
सबसे अच्छा उदाहरण हैं | आज हमारे देश में हर गली मोहल्ले में बच्चे क्रिकेट खेलते
 हैं | पर टीम में तो ग्यारह ही जाने हैं |
नार्मन विन्सेंट पील कहते हैं कि “एक सफल और असफल व्यक्ति में अंतर क्षमता ,ज्ञान
और शक्ति का नहीं वरन प्रतियोगिता को जीतने की इच्छा
 शक्ति का आभाव होता है | सफलता असीम उत्साहवर्धक  होती है |लेकिन असफलता के भय से हम प्रतियोगिताओ को नकारना चाहते
हैं |
  कही हमारी या हमारे बच्चे की  सेल्फ एस्टीम कम न हो जाये | छोटे बच्चों के
स्कूलों
  में माता –पिता इसी भय के कारण
प्रतियोगिताओ को नकारने की बात करते हैं |
 
उस समय वह  इस सत्य को भूल जाते हैं
कि प्रतियोगिता में हारने वाला भी लूजर नहीं होता | 

प्रतियोगिता बचपन से ही दवाब झेलने को करती है तैयार 

अगर हम बचपन में प्रतियोगिता
विहीन शिक्षा की व्यवस्था भी कर दें और सब बच्चों के समान ग्रेड्स आये तो भी इतने
रोज़गार कहाँ है | शिक्षित बेरोजगारों का प्रतिशत भारत में कितना है ,यह बात किसी
से छुपी नहीं है | रोजगार पाने के लिए तो उन्हें प्रतियोगिता से गुज़ारना ही पड़ेगा
तो क्यों न उन्हें बचपन से ही इस दवाब को झेलने के लिए थोडा- थोडा तैयार किया जाता
रहे | हारने की पीड़ा और जीतने के जश्न
  व्
गिर कर फिर से उठने की हिम्मत जब बच्चों में शुरू से ही विकसित की जायेगी तो वो
जीवन की वास्तविकताओ के लिए पहले से तैयार रहेंगे | कई बार माता –पिता छोटे बच्चों
को खेल में जबरदस्ती जिता देते हैं | वह ये सोचते हैं कि बच्चा खुश हो जाएगा पर
यहीं से वह उसे कमजोर करना शुरू कर देते हैं |

  रविन्द्र नाथ टैगोर कहते हैं कि, “आप
अपनी सीमाएं तब तक नहीं जानेगे जब तक आप अपने को उस ओर धकेलेंगे नहीं “| 


प्रतिभा को निखारती हैं प्रतियोगिताएं 

प्रतियोगिताएं
हमारी प्रतिभा या क्षमता का विस्तार करने में उत्प्रेरक का काम करती हैं | फिर
प्रतिभा चाहे पढाई की हो खेल कूद की या फिर लेखन की | अगर आप फिर भी प्रतियोगिताओ
से डरते हैं , प्रतियोगिता का नाम सुन कर ही पसीने पसीने हो जाते है और सेफ गेम
खेलना पसंद करते हैं| तो एक फ़िल्मी डायलाग 
 “ अकेले खेलने वालों को हारने का
डर नहीं होता “
आपकी जिंदगी पर फिट बैठेगा ……. पर ये वाक्य कुछ इस तरह से पूरा
होगा कि,”फिर  जीतने का मजा भी कहाँ आता है”
|  इतना समझ लीजिये कि आप भले ही जीवन के
हर क्षेत्र में प्रतियोगिता से बचने  के
रास्ते चुन लें ,पर आप के घर में एक –एक चीज प्रतियोगिता से गुज़र कर ही आती है |
आप बाज़ार जाते हैं अबक का टूथ पेस्ट लेंगे या गबक का , xy की किताब पढेंगे या yz
की ……… छोटी ही सही हर चीज आप के पास प्रतियोगिता से गुज़र कर ही आती है |
कहाँ तक नकारेंगे ,कब तक नकारेंगे | जो सार्वभौमिक है उसे अपने जीवन में स्वीकार
करिए |

 याद रखिये अच्छा ,अच्छा और अच्छा करने
का दवाब ही आप को निखरता है | यह आप को 
जीत पाने के लिए नए रास्ते खोजने पर विवश करता   है | आप 
अपनी क्षमताओं  पर गहराई से विचार
करते हैं | यह आपको  दूसरों की प्रतिभा का
सम्मान करना स्वीकार करना सिखाता   है |
हार जाने से फिर से उठ कर खड़ा होना सिखाता  है | भले ही आप बिल गेट्स ,सचिन तेंदुलकर
या  कोई और न बन पाए पर आप रोज निखरते हैं
और इस निखार से आप जीवन में कोई न कोई मुकाम अवश्य हासिल कर लेते हैं | आपकी
प्रतिभा हीरा है तो प्रतियोगिताएं उसे तराशने की मशीन | तराशे जाने पर ही हीरा
बहुमूल्य होता है वर्ना मामूली पत्थर ही रह जाता है | 

आदत डालिए प्रतियोगिताओ को जीतने की 


बड़ी प्रतियोगिताएं जीतने के
लिए छोटी –छोटी प्रतियोगिताओ को जीतने की आदत डालिए | चाहे वो खुद से ही क्यों न
हों | आज ७ बजे तक यह पाठ याद करना है , सुबह ४ बजे उठना है | ये प्रतियोगिताएं आप
में जोश व् जूनून का संचार करती हैं और जीवन खुशनुमा बनाती हैं | वर्ना जिंदगी तो
घिसटते –घिसटते कट ही जाती है | कभी सफलता न मिले लोग उपहास बनाए तो अपना मदद
बनाये रखने के लिए ये प्रसिद्ध  पंक्तियाँ
गुनगुना लीजिये ………….

“ गिरते हैं शह सवार ही मैदाने जंग में
वो क्या गिरेगा खाक!  जो घुटनों के बल
चले “

 कमलेश मिश्रा 
कानपुर       

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