कर्म और आत्मसंतुष्टि

कर्म और आत्मसंतुष्टि

गीता के अध्याय 3 में श्रीकृष्ण से अर्जुन ने कहा – हे जर्नादन! हे केशव! यदि आप बुद्धि को सकर्म से श्रेष्ठ समझते हैं तो आप मुझे घोर युद्ध में क्यों लगाना चाहते हैं? आपके उपदेशों से मेरी बुद्धि भ्रमित हो रही है। इसलिए मुझे निश्चयपूर्वक बताये कि इनमें से मेरे लिए श्रेष्ठतम क्या है? कृष्ण ने कहा – हे निष्पाप अर्जुन! जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूं। आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने वाले दो तरह के इंसान होते हैं। कुछ लोग ज्ञान योग से कुछ लोग भक्ति सेवा के द्वारा आत्मसाक्षात्कार की अवस्था को प्राप्त करने का प्रयास करते हंै। हे अर्जुन! न तो कर्म से विमुख होकर कोई कर्म फल से छुटकारा पा सकता है। और न केवल संन्यास से सिद्धि पायी जा सकती है। प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति के अर्जित गुणों के अनुसार कर्म करना पड़ता है। कोई भी इंसान एक क्षण के लिए भी कर्म से दूर नहीं रह सकता।

Karma and self satisfaction(in Hindi)

कर्म न करने की अपेक्षा यज्ञीय भाव से कर्म करना श्रेष्ठ है। यज्ञीय भाव से कर्म करने से भगवान के भक्त सारे पापों से मुक्त हो जाते हैं। यज्ञ नियत कर्म करने से उत्पन्न होता है। इन्द्रियों की तृप्ति के लिए कर्म करने से जीवन व्यर्थ में जाता है। कर्मफल में असाक्त हुए बिना मनुष्य को निरन्तर यज्ञीय भाव से कर्म करना चाहिए। यज्ञीय भाव से जीवन जीने वाले राजा जनक इसका श्रेष्ठ उदाहरण थे। भगवान कहते है कि यदि मैं भी निश्चित कर्म न करूं तो सारे लोग भी मेरा अनुसरण करेंगे। विद्वान लोगों को चाहिए कि साक्षी भाव से अपने प्रत्येक कर्म को परमात्मा को समर्पित करके करें ताकि उनके जीवन से संसार के लोगों को प्रेरणा मिले। इसलिए हे अर्जुन अपने कार्याें को मेरे पर समर्पित करके युद्ध करो। हमारा मानना है कि ज्ञानी पुरूष अपनी प्रकृति के अनुकूल नौकरी या व्यवसाय का कार्य करते हैं। लोककल्याण की भावना से अपनी नौकरी या व्यवसाय करना आत्मसाक्षात्कार के लिए सहायक है।

अर्जुन ने कहा- हे देवकी नंदन! मनुष्य न चाहते हुए भी बुरे कर्म में क्यों संलग्न रहता है? कृष्ण ने कहा- हे भारत! इन्द्रियों को वश में करके कार्य करें। फल की इच्छा से प्रेरित होकर कर्म ही बंधन बनते हैं। क्योंकि हमारे कर्म यज्ञ नहीं बने है। यज्ञीय तथा साक्षी भाव से हम जीवन में जो क्रिया करते हैं उस कर्म को करते हुए हमें जो आनंद प्राप्त होता है वह ही उस कर्म का महाफल हैं। 

हमारा मानना है कि माया निरन्तर दूरबीन लेकर हमारे ऊपर नजर लगाये बैठी है। वह अपनी पैनी दृष्टि से यह देखती है कि इस इंसान की रूचि किसमें है। माया के लिए हमको वश में करने के लिए एक इन्द्री की पकड़ ही काफी है। डोर का एक छोर पकड़ में आ गया तो फिर डोर की पूरी रील खीची जा सकती है। शरीर से पांच इन्द्रियां श्रेष्ठ हैं, पांच इन्द्रियों से मन श्रेष्ठ है, मन से श्रेष्ठ बुद्धि है तथा बुद्धि से श्रेष्ठ आत्मा है। इस प्रकार हमें आत्मा के द्वारा बुद्धि को वश में करके पूर्णतया अहंकाररहित तथा भौतिक इच्छा रहित संतुलित जीवन जीना चाहिए।

गीता के अध्याय 3 को जानकर, पीकर तथा जीकर अब हम जो भी कर्तव्य करेंगे उसमें महा-आनंद तथा महाफल मिलना सुनिश्चित है। भौतिक समृद्धि तो बोनस में मिलने ही वाली हैं। 

माता-पिता अपने बच्चे से कहते हैं कि बेटे! जाओ मोहल्ले के मैदान/पार्क में बच्चों के साथ खेल कर आओ हम तुम्हें चाकलेट देंगे। बच्चे अच्छी तरह समझते हैं  कि खेलने में ही महाफल छिपा है। उसके लिए चाकलेट की लालच देने की क्या आवश्यकता है। सहजता में जी रहे बच्चे के लिए जीवन ही एक खेल है और वह उसके प्रत्येक पल का आनंद लेते हैं। इसलिए बच्चे भगवान के ज्यादा नजदीक रहते हैं। बच्चों को हम बड़ी उम्र के लोग ही अज्ञानतावश ईश्वर से दूर करते हैं । इस शायरी के ये पंक्तियां बहुत प्रेरणादायी हैं – घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो, यूँ कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये।

रोशनी की भी हिफाजत है इबादत की तरह, 
बुझते सूरज से, चारागों को जलाया जाये। 


जीवन हो खेल जैसा 

हम जैसे-जैसे बड़े होते हैं उसके साथ ही हम यह भूलते जाते हैं कि कर्म में ही महाफल आत्मिक संतुष्टि तथा आनंद के रूप में छिपा है। हमारा सारा जीवन एक खेल ही है। समझ के साथ कर्म करने से अन्दर से आनंद के रूप में महाफल मिलता ही है। हमें जीवन में होने वाली घटनाओं को खेल समझकर लेना चाहिए। खेल में आसक्ति की वजह से उलझ ना जाएँ। जीविका लक्ष्य के साथ ही उसके साथ पृथ्वी में आने के उद्देश्य को भी साथ जोड़कर हर पल जीना चाहिए। पृथ्वी का लक्ष्य है – इस हथियार रूपी मन तथा मित्र रूपी शरीर के द्वारा ईश्वर की उच्चतम अभिव्यक्ति करना। ईश्वर ही है हम है कि नहीं पता करें?

वर्ष 2018 गीता का श्रवण और मनन करने के लिए बेहतरीन सुअवसर


ईमानदारी के साथ अपनी नौकरी या व्यवसाय करना ही आत्मा के विकास का एकमात्र तथा सबसे सरल उपाय है। इसके अलावा आत्मा के विकास का अन्य कोई रास्ता नहीं है। यदि हम गीता के द्वारा भगवान के इशारे तथा संकेतों को समझ गये तो पूरा जीवन सफल है। वर्ष 2018 गीता का श्रवण और मनन करने के लिए बेहतरीन सुअवसर है। गीता के 18 अध्याय की तरह इस वर्ष में भी 18 का योग है। इसलिए वर्ष 2018 में पूरे वर्ष गीता का श्रवण तथा मनन करने का सुनहरा अवसर है।

इस संजोग का भरपूर लाभ उठाकर हमें अपनी गीता को अपने रोजाना के क्रियाकलापों तथा आचरण द्वारा प्रकट करना है। ज्ञान को आचरण में लाना ही भक्ति है। यह सब बहुत आसान है। बस केवल सूचनाओं को पालन करना पड़ता है। हम बीमारी में मेडिकल स्टोर से दवा लेकर आते हैं। दवा के डिब्बे में सूचनायें लिखी होती है कि डाक्टर के पूछे बिना दवा मत लीजिए। डाक्टर को दवा के बारे में पूरा ज्ञान होता है। ज्ञानी युधिष्ष्ठिर बनकर नहीं बैठना है। ईश्वर को जो लगे अच्छा वह ही मेरी इच्छा है। ईश्वर की इच्छा को अपनी इच्छा बनाकर जीने में समझदारी है। इसके ठीक उलटा अर्जुन की तरह अपनी इच्छा को ईश्वर की इच्छा बनाने की जिद्द तथा नसमझी नहीं करनी चाहिए।
भारत भूमि पवित्र भूमि है। भारत राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध, गुरू नानक जैसे महान अवतारों की कर्म भूमि रही है। करूणा के सागर ईसा, हजरत मोहम्मद तथा बहाउल्लाह ने धरती माता की गोद में जन्म लिया है। यदि हम श्रद्धापूर्वक इन सभी अवतारों की मूल शिक्षाओं को ग्रहण कर लें तो परम पिता परमात्मा को कितनी प्रसन्नता होगी।
परम पिता परमात्मा की दिव्य योजना के अन्तर्गत युग-युग में महान अवतार आकर अपने युग की समस्याओं का समाधान देते हैं। युग अवतार की पहचान प्रत्येक मनुष्य को स्वयं करनी पड़ती है। किसी युग अवतार की पहचान उसके विचारों से होती है। किसी के बताने से युग अवतार की पहचान नहीं होती है। जो भी युग अवतार को पहचान करके उनके कार्य में सहयोग करता है उसका जीवन सफल हो जाता है। कुछ लोग युग अवतार को अहंकारवश न पहचाने के कारण उनका विरोध करते हैं। युग अवतार की पहचान उसके युगानुकूल विचारों से होती है। युग अवतार की पहचान की पहचान के लिए स्वयं की अंदर की दृष्टि को व्यापक बनाना होता है। हमें खोजी बनकर कुंए से देखने की बजाय अब हेलिकाप्टर से संसार की घटनाओं को देखना तथा उसके समाधान देना चाहिए। विश्व हमें देता सब कुछ हम कुछ देना सीखे। वसुधा एक कुटुम्ब बनें, नवयुग की सुन्दर रचना सीखें।

प्रदीप कुमार सिंह ‘पाल ‘

लेखक

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