अप्रैल फूल – याद रहेगा होटल का वो डिनर

अप्रैल फूल -याद रहेगा होटल का वो डिनर

अप्रैल फूल है तो आयातित त्यौहार पर हम भारतीय भी अपने जीवन में हास्य
और रोमांच जोड़ने के लिए इसे बड़े उत्साह से मानते हैं| मेरे द्वारा अप्रैल फूल मनाने
की शुरुआत बचपन में ही हो गयी थी, जब हम सहेलियाँ एक दूसरे को कहती, ये देखो
छिपकली, वो देखो कॉक्रोच, फिर जैसे ही अगला डरता, कहने वाला “अप्रैल फूल” कह कर
हँस देता| धीरे –धीरे मेरी उम्र तो बढ़ने लगी पर अप्रैल फूल की उम्र ‘ये देखो
छिपकली, वो देखो कॉक्रोच’ से आगे बढ़ी ही नहीं| मैंने भी उसे पुराने फैशन की तरह
भुला दिया, पर आज से 4-5 साल पहले अप्रैल फूल ने दुबारा मेरे जिंदगी में दस्तक दी| 

अप्रैल फूल – याद रहेगा होटल का वो डिनर


मार्च का आखिरी सप्ताह चल रहा था, एक सुबह चाय पीते हुए पतिदेव ने मेरा हाथ
थाम
  कर कहा, “अगले सोमवार को हम दोनों
होटल अशोका में डिनर पर चलेंगे|” फाइव स्टार में जाने की बात सुन कर मैं खुश हो
गयी| मैंने पतिदेव से कहा , “ठीक है, मैं बच्चों से कह दूँगी |” पतिदेव बोले,
“बच्चे नहीं, सिर्फ तुम और मैं| मैं घर से दूर थोड़ा समय तुम्हारे साथ अकेले में बिताना
चाहता हूँ|
  कितना थक जाती हो तुम और मैं
भी अपने काम में व्यस्त रहता हूँ| इतने सालों में तुमने कितना कुछ किया है मेरे
लिए, इस घर के लिए इसलिए| कुछ समय तुम्हें घर –गृहस्थी के झंझटों से दूर रिलैक्स
कराना चाहता हूँ| बस तुम और मैं और हमारा पुराना समय|”



ढ़िए -तुम्हारे पति का नाम क्या है


 किसी मध्यम वर्गीय भारतीय
स्त्री के लिए ये प्रस्ताव बहुत अजीब सा है| अमूमन तो बच्चे होने के बाद कोई पति –पत्नी,
बच्चों के बिना अकेले किसी बड़े होटल में डिनर पर जाते नहीं| वहीं जैसे–जैसे शादी
पुरानी होती जाती है तो साथ में भाई-बहन और उन के बच्चे भी जाने लगते हैं| फिर
हमारी शादी तो पड़ोसियों के बच्चों को साथ ले जाने तक पुरानी हो चुकी थी| अटपटा तो
बहुत लगा| मन में ख्याल आया कि लगता है पतिदेव ने “अच्छे पति कैसे बनें” या “पत्नी
को खुश कैसे रखे” जैसी कोई किताब पढ़ ली है या फिर मेरी लिखी किसी नारी की व्यथा–कथा
पढ़ ली होगी| खैर जो भी हो, हमारे धर्म में प्रायश्चित करने वालों को मौका देने का
प्रावधान है| आज के माहौल में मैं धर्म विरुद्ध बिलकुल भी नहीं जाना चाहती थी|


 हामी
भरते हुए मैंने बस इतना पूंछा, “उस दिन तो सोमवार है, क्या आप छुट्टी लेंगे?” पतिदेव
बोले, “नहीं मैं टेबल बुक करा दूंगा| मैं ऑफिस से पहुँच जाऊँगा और तुम घर से|”
मैंने पति की तरफ देखा उनकी आँखों में सच्चाई नज़र आई| 



चुपके-चुपके हुई मेकअप की तैयारी 



पतिदेव के ऑफिस जाते ही
मैंने ये बात फोन कर के अपनी बहन को बतायी| वो तो ख़ुशी के मारे उछल पड़ी, “वाओ!
क्या बात है, जीजाजी अभी भी तुम्हारी इतनी कद्र करते हैं! वर्ना इस उम्र में
पतियों को अखबार और टी.वी की बहसों से छुट्टी ही नहीं मिलती”| थोड़ी देर में
भाभियों और अन्य बहनों के फोन आने लगे| सब हमें इस बात का अहसास दिला रहे थे कि हम
कितने खास हैं जो हमें शादी के इतने साल बाद भी ये अवसर मिला| उस दिन हमें पहली
बार अहसास हुआ कि शादी के कई साल बाद पति का अपनी पत्नी को अकेले डिनर पर ले जाने
का प्रस्ताव मध्यम वर्गीय भारतीय समाज में किसी पत्नी के लिए ये किसी दिवा स्वप्न
से कम नहीं है|

तभी पड़ोसन आ धमकी, शायद उन्होंने हमारी फोन पर की हुई बातें  सुन ली थी| वो चहक कर बोली, “भाभीजी आप को मैं
तैयार करुँगी| मैंने झेंपते हुए कहा, “अरे तैयार क्या होना है|” वो बोली, “अरे,
ऐसे मौके बार–बार थोड़ी ही न आते हैं| बिलकुल परी सी तैयार हो कर जाइएगा| सोमवार
में पाँच दिन बाकी थे| हम चुपके–चुपके साड़ी, मैंचिंग चूड़ियाँ, बिंदी, पर्स, लिपस्टिक
सेलेक्ट करने में जुट गए| लिपस्टिक के शेड्स ट्राई करते–करते मेरे होंठ ही छिल गए|
खैर नियत दिन आया| मैं सज धज कर घर से बाहर निकली| पड़ोसिनों ने ‘आल दा बेस्ट’ कह
कर हाथ हिलाया| मैं किसी राजकुमारी की तरह मुस्कुराते हुए टैक्सी में बैठ गयी|

मेरा सजधज कर होटल पहुंचना 


 होटल पहुँच कर देखा पति देव तो आये ही नहीं हैं| रिसेप्शन पर पता किया तो हमारे नाम
पर कोई टेबल भी बुक नहीं थी| मैं खुद ही आधा घंटा लेट थी, उस पर टेबल भी बुक नहीं,
पतिदेव भी नदारद| मुझे लगा जरूर अपनी पुरानी आदत के अनुसार जनाब टेबल बुक कराना
भूल गए होंगे| मैंने भी तय कर लिया कि मैं भी फोन नहीं करुँगी| जब आयेंगे तब
कहूँगी, “मुझे नहीं करना आप के साथ डिनर-विनर, आप और आप का भुल्लकड़पन आपको ही
मुबारक |” मन ही मन गुस्सा होते हुए मैं होटल के बाहर खड़ी पतिदेव का इंतज़ार करने
लगी| मेरे दिमाग में वो सारी घटनाएं एक–एक करके
 
रील की तरह चलने लगीं जब–जब पति कुछ भूले थे| समय बढ़ता जा रहा था और मेरे
गुस्सा भी| 


वो घबराहट भरे पल 


मैंने घड़ी देखी| दो घंटे बीत चुके थे| अब तो मुझे थोड़ी घबराहट हुई| अभी
तक कोई फोन भी नहीं किया| क्या बात है? मैंने अपनी भीष्म प्रतिज्ञा तोड़ते हुए
पतिदेव को फोन लगाया, फोन उठा ही नहीं| मेरी घबराहट और बढ़ी| मैं फोन पर फोन लगाने
लगी, पर कोई फोन नहीं उठा| मुझे लगा शायद पतिदेव घर पहुँच कर बच्चों को साथ ला रहे
होंगे| मैंने बच्चों को फोन किया, वो भी नहीं उठा| घबरा कर मैंने पड़ोसन को फोन
करके घर में देख कर आने को कहा| थोड़ी देर बाद पड़ोसन का फोन आया, वो बोली, “भाभी जी,
घर से तो कोई आवाज़ आ नहीं रही है| लगता है कोई है नहीं|” 



अब तो मेरी घबराहट की कोई
सीमा नहीं थी| दिल जोर-जोर से धडकने लगा| मैंने घर के लिए ऑटो किया| मैं लगातार
फोन किये जा रही थी, और लगातार ‘नो रिप्लाई’ आ रहा था| अनिष्ट की आशंका से मेरे
आँसू बहे जा रहे थे और सब सकुशल हो कि मेरी मनौतियाँ १०१ रुपये से १००१ रुपये, १६
सोमवार, ११ ब्रहस्पतिवार तक बढती जा रहीं थी| इसी उहापोह में घर आ गया मैं तेजी से
सीढियां चढ़ने लगी| अब तो आँसू का साथ गले की घरघराहट ने भी देना शुरू कर दिया था|
मैंने तेजी से बेल दबाई| 



उफ़ ! ये अप्रैल फूल 


पति और बच्चों ने दरवाज़ा खोल कर हँसते हुए जोर से कहा, “अप्रैल
फूल!” एक मिनट बाद चेतना में लौटने पर जब मुझे अप्रैल फूल बनाए जाने का सारा माजरा
समझ आया तो मेरे लिए ये निर्णय लेना कठिन हो गया कि मैं इस बात पर हँसू या अपना
रोना जारी रखूं|


वंदना बाजपेयी




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दूरदर्शी दूधवाला 


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