कहानी -अरक्षित
ही रहा जैसा मैंने कल्पना में उकेर रखा था|
के साथ घनी, विपुल वनस्पति; ऊँची, लाल दीवारों व पर्देदार खुली खिड़कियाँ लिए वह बँगला
पूरी सड़क को सुशोभित कर रहा था|
है,” अभी हम पहले फाटक पर ही थे, किएक साथ चार संतरियों ने अपनी बंदूकें अपने कंधों
पर तान लीं|
से नहीं, तुम्हारी मेमसाहब से मिलने आए हैं,” मैंअपनी पत्नी की ओट में खड़ा हो गया,
“हम उनके रिश्तेदार हैं|”
बताएँगे, हुजूर?” सभी संतरियों ने तत्काल अपनी बंदूकें अपने कंधों से नीचे उतार
लीं और हमें सलाम ठोंक दिया|
हैं,” मैंने पत्नी की ओर इंगित किया|
हमारे लिए फाटक खोला तो दूसरे ने आगे बढ़कर मेरे हाथ का सूटकेस अपने हाथ में ले
लिया|
ने हमें दूसरे फाटक की ओर निर्दिष्ट किया|
फाटक का संतरी अतिरिक्त रुखा व रोबदार रहा|
हैं,” सामान उठाए हमारे साथ चल रहेसंतरी ने कहा|
रहीं,” दोसरे फाटक के संतरी ने सिर हिलाया, “मेम साहिब की एक ही बहन हैं और उनसे
हमारा खूब परिचय है….. वे खुद गाड़ी चला कर आती हैं, गहनोंऔर खुशबुओं से लक-दक
रहती हैं, ऐसे नहीं…..”
चेहरा-मोहरा अति सामान्य है तथा वह अपने परिधान व केश-भूषा की ओर अक्षम्य लापरवाही
भी दिखाती है| उसे देखकर कोई नहीं जान सकता वह एक नौकरीशुदा कॉलेज लेक्चरर है|
अपनी मेम साहिब को दिखा आएँ| फिर हमसे कुछ बोलना,” अपना नाम मुझे अपनी रेल टिकट पर
लिखना पड़ा| दूसरा कोई फ़ालतू कागज उस समय मेरे पास न रहा|
के दौरान मिली थीं|
के कोच में पर्दे के उस तरफ जो चार सीटें रहीं, उनमें दो हमारी थीं और एक उनकी|
वाली महिलाओं पर भड़कना मेरी पत्नी अपना परम कर्तव्य मान कर चलती है, “नीचे की
दोनों सीटें हमारी हैं| “
बहुत लेट हो गयी थी और हमारे स्टेशन पर शाम के सात बजे पहुँचने के बजाय रात के दस बजे
पहुँची | दो दिन बाद पत्नी के भये की शादी थी और हमनें अपनी सीटें बहुत पहले बुक करवा
रखीं थीं |
“मैं अपना
खाना खत्म कर लूँ ?” उनके चेहरे पर एक भी शिकन न पड़ीं थी और वो पूरे चाव व् इत्मीनान
के साथ अपने मुँह में नियंत्रणीय निवाले भेजती रहीं
तपाक के साथ कहा था|
वर्ग के पुरुष मुझे गहरे कोप में भर देते हैं, वहीं सावकाश वर्ग की स्त्रियाँ मुझे
शुरू से ही तरंगित करती रही हैं|
अपने आस-पास की स्त्रियों को ‘बहुत जल्दी में’ पाया है|
परिचय बहुत कम रहा है| बचपन में माँ और बहनों को जब देखा, “जल्दी में’ ही देखा|
मेरी पत्नी की जल्दी तो अकसर उतावली और हड़बड़ी में बदल जाती है|
हैं,” वे हँसने लगी थीं|
अपनी खातिर,” मैंने चुटकी ली थी, “हमनेअभी खाना नहीं खाया है| भूखे पेट बिस्तर
बिछाने से बच गए|”
दिखाइए,” वे एक बच्ची की मानिंद मचल ली थीं, “देखूँ, क्या-क्या छीना जा सकता है?”
रहे पनीर के उन बड़े टुकड़ों में से जब कुछ टुकड़ों की मेरी पत्नी कीऔर मेरी प्लेट
में आ जाने की संभावना उत्पन्न हुई तो खीझ रही पत्नी की खीझ तुरन्त भाग ली|
में मैंने पाया अपनी बात कहने का उनके पास अपना ही एक विशेष परिमाण व मापदंड रहा|
अपने श्रोता के अनुरूप वे एक मर्यादित सीमा के भीतर नियमित, आयोजित व सुव्यवस्थित
बोल ही मुख से उचारती रहीं| उनके शब्द देववाणी सदृश वेदवाक्य न भी रहे, फिर भी
उनके मुख से जो भी सुनने को मिला, सहज में ही, उन शब्दों ने सुनिश्चित रूप से एक
असाधारण सोद्देश्यता तथा अलंकरण अवश्य ही धारण कर लिया|
कार्ड है,” जब हम लोग अपने स्टेशन पर उतरे थे तो उन्होंने हमें अपने न्यौते के साथ
एक उत्साही मुस्कान दी थी, “मुझे मिलने जरूर आइएगा…..”
साथ हमारे सामने प्रकट होने में उन्होंने अधिक समय न लिया|
उन्होंने हमारे लिए अपना बड़ा हॉल खुलवाया, “मैं अभी चाय का प्रबंध देखकर आती हूँ|”
पनीर के वे टुकड़े मैं अभी तक न भूला था, “कॉफ़ी मिलेगी क्या?”
गर्मजोशी के साथ मुस्कुराईं, “अभी हाजिर हुई जाती है|”
देख कर मैं हँसने लगा| उधर घर पर जब भी कोई मेहमान आता है, पत्नी उसे
खिलाने-पिलाने के मामले में कभी भी पूर्णतया सन्तुष्ट नहीं कर पाती है|
देखकर मुँह नहीं बनाया|” मैंने जान-बूझ कर पत्नी को छेड़ा|
बनाएँगी?” पत्नी ने गोल बात की, “चीजें बनाने और चीजें लाने के लिए जिसके एक इशारे
पर बीसियों अर्दली हाजिर हो जाते हैं, वे अपने आदर-सत्कार में क्यों टाल-मटोल करेंगी?”
खुद बनाया था,” एक सुसज्जित ट्रॉली के साथ वे जल्दी ही लौटआईं|
खाने में तीन नेपकिन लगी प्लेटें व चटनियाँ रहीं तथा ऊपर वाले खाने में केक और नमकीन
की तश्तरियाँ|
केक के दो बड़े खंड हमारी प्लेटों में परोस दिए, “कल हमारे बड़े बेटे का सोलहवाँ
जन्मदिन रहा| बेटा तो, खैर, होस्टल में था, मगरइस केक के बल पर उसका जन्मदिन हमारे
यहाँ भी मना लिया…..”
मैंने कहा, “मुँह में जाते ही हलक से जा लगता है…..”
मेरी प्लेट फिर प्रचुर मात्रा में भर दी|
रहने पर आपके पास बहुत समय खाली रहता होगा,” पत्नी ने अपने ब्यौरे एकत्रित करने
चाहे| अपने कुतूहल के विषय का सूक्ष्म सर्वेक्षण करने में वह निपुण है|
होस्टल में हैं?” मैंने पूछा|
मुस्कुराईं भी और उदास भी हो चलीं, “उधर नैनीताल में जब वे दो साल डी.आई.जी. रहे तो
बच्चों को उधर अच्छे, सही स्कूल मिल गए| इसी लिए कस्बापुर की इस पोस्टिंग में अकेले
ही आए, उन्हें साथ नहीं लाए…..”
यहाँ|” पत्नी बोली, “क्या कभी आप डर भी जाती हैं?”
अपनी गरदन को बल दिया, “मेरी रक्षा के लिए यहाँ बहुत अर्दली तैनात हैं…..”
बनाती हूँ,” कॉफ़ी खत्म होते ही उन्होंने अपनी नजर मेरे चेहरे पर गड़ा दी, “आप को मेरे
चित्र बहुत तुच्छ लगेंगे, फिर भी मैं आपकी राय जानना चाहूँगी|”
नहीं है,” मैं तुरन्त उठ खड़ा हुआ, “आप दिखाइए तो|”
है,” पत्नी हँस दी, “आपके केक की लागत बराबर कर देगी…..”
बहुत ऊँचे चित्रकार हैं,” उन्होंने मेरी ओर देखा, “इतने बड़े आर्ट्स कॉलेज में
पढ़ाते हैं….. चित्रकला के सिद्धांत व इतिहास के बारे में क्या-क्या नहीं जानते
होंगे?”
भी देखना चाहता हूँ,” मैंने उत्साह दिखाया, “मुझेविश्वास है, आपके चित्र भी आपकी
ही तरह भव्य व लोकोत्तर होंगे…..”
समझीं नहीं|
मैं मुस्कुराया, “इस दुनिया के नहीं….. उस दुनिया के….. जहाँ पेड़ छाया
देते हैं, फूल खुशबू और बादल इन्द्रधनुष…..”
का ढेरों सामान रहा: तेल-चित्रकारी हेतु कई तरह के छोटे-बड़े ब्रश, कैनवास, पेंट व
रंगलेप|
चित्राधार पर रंग-बिरंगी एक लड़की के तदरूप चित्रण नेमुझे प्रभावित किया तो पीछे,
दूर रखे एक चित्रफलक पर बने एक समूह ने बुरी तरह चौंका दिया|
सदस्य केधड़की तमगों वाली पुलिस यूनिफार्म के ऊपर बाघ के सिर टिकाए गए थे|
रहे: वही छलघाती मुद्रा, हिंस्र आँखें, अभिधावक जबड़े, आक्रामक दाँत व रक्त-पिपासु
जिह्वा|
एकाएक उस नीरव बँगले का सन्नाटा टूटा और चारों तरफ मोटरों के हो-हल्ले व
अर्दलियों-संतरियोंके तौबा-तिल्ले की प्रदर्शनी शुरू हो ली|
हैं,” उनके भव्य चेहरे की रंगत व स्नेहिल भंगिमा की सरगरमी तत्काल लुप्त हो गई|
वे हमें पीछे के बरामदे में रखी बेंत की कुर्सियों तक ले गईं|
उत्तेजनावश वे काँपने लगीं|
प्रकार के साथ पुलिस के जूतों की चीं-चीं हमारे निकट आने लगी|
वे चीं-चीं की दिशा में लपक लीं|
पुलिसियाआवाज बहुत सख्त रही|
की एक छात्रा है,” उन्होंनेसफेद झूठ बोला और अपने वाक्यों के मुख्यांश दुहराने
लगीं, “पुराने कॉलेज की एक छात्रा| साथ में उसका पति है, उसका पति…..”
नहीं पूछा….. मुझे मालूम नहीं….. नहीं मालूम वह क्या करता है…..”
कैसे मालूम हुआ?”
गई थी तो ये दोनों रेलगाड़ी में मिले थे….. रेलगाड़ी में मिले थे,” उनका स्वर
काँप-काँप गया|
दिया?”
वेरी सॉरी…..”
में भेज दो| मुझे ड्राइंग-रूममें सात चाय चाहिए, तुम्हारे हाथ की| साथ में सैंड-विच
और कुक्कू का बर्थ-डे केक|”
वे घिघियाई, “मिठाई ज्यादा ठीक रहेगी….. हाँ, मिठाई ज्यादा ठीक…..”
कई बार मेरे लिए केक लाती रहती थी….. बहुत बार केक लाया करती….. मैंने
सोचा मिठाई तो घर में है ही….. मिठाई बहुत रखी है अभी….. सो केक इन्हें खिला
दिया….. सोचा केक इन्हें ही खिला दूँ…..”
मैं उन वी.आई.पी. को अपने साथ लाया था,” पुलिसिया हाथ ने उनकी देह के किस भाग को
चोट पहुँचाई, बीच में खिंचे परदे के कारण हम देख न पाए, “अब केक सामने न रखेंगे तो
मेरी कितनी खिंचाई होगी…..
रियली सॉरी, वेरी सॉरी….. वेरी-वेरी सॉरी…..”
जल्दी भेजो,” पुलिस के जूतों की चीं-चींफिर शुरू हो ली, “अब उनसे मिलने की
कोई जरूरत नहीं| तुम रसोई में जाओ| उन दोनों को मेरा निजी अर्दली फाटक तक छोड़ आएगा…..”
भीज गया है,” पत्नी से अपनी हँसी दबाए न दबाई गई, “अब वह हमें अपना मुँह न
दिखाएगी…..”
फुरसत में नहीं,” तभी एक पिस्तौल धारी सिपाही प्रकट हो लिया, “आपको जाने के लिए
बोला है|”
की देख-रेख में हम दोनों फाटक पार कर सड़क पर आ गए|
मेरी पत्नी ने सिपाही से कहा, “हम रिक्शे से चले जाएँगे|”
अंदर लपक लिया|
थी!” मैंने अपना सामान एक रिक्शे पर टिका दिया, “बायें संतरी, दायें संतरी, इधर
संतरी उधर संतरी और बीच में एक अरक्षित…..”
पत्नी मेरे साथ रिक्शे पर बैठ कर अपनी समूची हीं-हीं खंडित करने में जुट गई|
सेवा निवृत्त
चुकी हैं | उन की पैनी नज़र समाज की विभिन्न गतिविधियों का एक्स रे करती है और जब
उन्हें पन्नों पर उतारती हैं तो शब्द चित्र उकेर देती है | पाठक को लगता ही नहीं
कि वो कहानी पढ़ रहा है बल्कि उसे लगता है कि वो
उस परिवेश में शामिल है जहाँ घटनाएं घट रहीं है | एक टीस सी उभरती है मन
में | यही तो है सार्थक लेखन जो पाठक को कुछ सोचने पर विवश कर दे |
प्रकाशित हो चुकी हैं जिन्हें इन कथा संग्रहों में संकलित किया गया है |

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