बहुत पढाई करनी होगी | बचपन में ऐसी ही
सोच –समझ ज्यादातर लोगों की तरह मेरे दिमाग में भी थी | परन्तु क्रिकेट के पूर्व कप्तान
महेंद्र सिंह धोनी के साहस , लगन और कठोर परिश्रम ने मेरी सोच को बदल दिया |
मैं , महेंद्र सिंह धोनी , क्रिकेट और बच्चों का कैरियर
पैशन बढ़ रहा है | न सिर्फ देखने का बल्कि खेलने का भी | क्योंकि अब सब को समझ आ
गया है कि खेल हो नृत्य हो , या कोई और कला … हर किसी में कैरियर बन सकता है धन
आ सकता है | ऐसे में मुझे वो समय याद आता है जब नानाजी हम लोगों को रटाया करते थे
, “खेलोगे कूदोगे तो होगे ख़राब , पढोगे लिखोगे तो बनोगे नबाब “ धीरे –धीरे ये बात
दिमाग में बैठती गयी या नवाब बनने के लालच
में कूदने वाली रस्सी , खो –खो , विष अमृत
, पोषम पा सब को छोड़कर किताबो से दोस्ती कर ली |
खेलोगे कूदोगे होगे खराब
भी (IIT, कानपुर से ) पढ़ाकू किस्म के जीव
मिले | ये अलग बात है कि उनकी रूचि साइंस और टेकनोलोजी विषय में रहती है और हम
विज्ञानं से लेकर कर साहित्य , सुगम साहित्य , असाहित्य कुछ भी पढ़ डालते | पढने की
आदत का आलम ये है कि आज़ भी अगर घर लौटने में थोड़ी देर हो जाए तो बच्चे मजाक बनाते है कि
मम्मी लगता है मूंगफली वाले ने अख़बार का बना जो ठोंगा दिया था आप उसकी कहानी पढ़ने
लगी | उनकी बात गलत भी नहीं है | अगर कुछ लिखा होता है तो हम पढ़ते जरूर हैं | खैर
बात उन दिनों की हो रही है जब हम सिर्फ पढाई को ही अच्छा समझते थे | ऐसा नहीं है
कि खेल और खिलाड़ियों के बारे में हम जानते नहीं थे | कई मैच भी देखे थे | हमें
वर्ल्ड कप का वो फाइनल की भी याद है
जिसमें कपिल देव की कप्तानी में भारत ने पहला वर्ल्ड कप जीता था | हम उस समय छोटे
थे , कई पड़ोसी भी हमारे घर आये हुए थे और हर बॉल में हम लोग हाथ जोड़ रहे थे कि इस में छक्का पड़
जाए | काफी समय तक क्रिकेट में हमारी रूचि भी इसी लिए रही कि इसमें हमारा देश
जीतता है | खिलाड़ियों के प्रति श्रद्धा भाव था पर एक खिलाड़ी बनने में कितनी संघर्ष और
कितनी मेहनत है इस बारे में हम सोचते नहीं थे |
महेंद्र सिंह धोनी के घर के सामने मेरा फ़्लैट
बात तब की है, जब शादी के तुरंत बाद हम पति के साथ रांची “ श्यामली
कॉलोनी “ में रहने गए | नयी गृहस्थी थी
ज्यादा काम था नहीं , उस पर सुबह जल्दी उठने की आदत …. पति की नींद न खुल जाए ये
सोच सीधे बालकनी की शरण में ही जाते |
सामने महेंद्र सिंह धोनी का फ़्लैट था | उस समय वो नव-युवा थे और हम लोगों की जान –पहचान नहीं हुई
थी | मैं देखा करती थी कि सुबह चार-पाँच बजे उसके दोस्त बुलाने आ जाते और वो बैट ले कर निकल पड़ते | कभी –कभी उसकी माँ और बहन भी
नीचे छोड़ने आती , पिताजी नहीं आते थे | क्योंकि मैं पढाई को ही ऊपर रखती थी और लगता था अच्छा कैरियर बनाने के लिए पढना बहुत जरूरी है, इसलिए मेरे
दिमाग में बस एक ही बात आती ये लड़का बिलकुल पढ़ता नहीं है , बस खेलता रहता है जरूर फेल हो जाएगा |
तुरंत मेरी कथा -बुद्धि सक्रिय हो जाती , पिताजी
नहीं आते हैं , जरूर वो डाँटते होगे पर माँ और बहन पक्ष ले लेती होंगीं | अक्सर ऐसा ही होता है , माँ के लाड़ से बच्चे बिगड़ जाते हैं |
यही बात अपने पति से कह दी , “ ये सामने वालों का लड़का बिलकुल पढता –लिखता नहीं है
बस खेलता रहता है , जरूर फेल हो जाएगा | पति हंसने लगे और बोले , “ अरे वो रणजी
में खेलता है , पूरे रांची को उस पर नाज़ है , इंडियन टीम में आ सकता है | उस समय
से धोनी को देखने का दृष्टिकोण थोडा बदलने लगा | थोड़ी बातचीत भी हुई | एक खिलाड़ी
को बनने में कितना संघर्ष करना पड़ता है यह बारीकी से देखने और समझने का मौका मिला
| अब सुबह चार –साढ़े चार बजे बैट ले कर निकलता
धोनी मुझे अर्जुन से कम न लगता | उफ़ , हर क्षेत्र में कितनी मेहनत है | मेरा
नजरिया बदलने लगा | मुझे लगने लगा खेल हो सिनेमा हो , कोई अन्य कला हो , व्यापार हो या पढाई …. सब में सफलता
के लिए कुछ बेसिक नियम लगते हैं वो हैं …
से मैदान में उतरना , और लेज़र शार्प फोकस |
बच्चों को न उतारे प्रतिशत की रेस में
के प्रतिशत के अतिरिक्त भी बहुत सारी संभावनाएं है | फिर भी हम सब ने अपने बच्चों को
प्रतिशत की रेस में उतार दिया है बच्चा लायक है नहीं लायक है , दौड़ सकता है नहीं
दौड़ सकता है पर रेस में भागने को विवश है | मेरा नज़रिया धोनी की वजह से बदला था
हालांकि जब तक धोनी इंडियन टीम में सिलेक्ट हुआ हम राँची छोड़ चुके थे | फिर और लोगों की सफलता पर भी गौर
किया | दरअसल हर बच्चे में एक अलग तरह की प्रतिभा होती है | कई बार माता –पिता यहाँ
तक कि बच्चे भी उससे अनभिज्ञ रहते हैं | हर बच्चे का कुछ पैशन हो या ये समय पर समझ
आ जाए ये जरूरी भी नहीं है , इसलिए भीड़ कुछ ख़ास प्रतियोगी परीक्षाओं की तरफ ही
भागती है | यहाँ पूरा दोष माता -पिता को भी नहीं दे सकते ( आगे के लेखों में अपने बच्चे के पैशन को कैसे पहचाने विषय पर जानकारी दूंगी ) लेकिन अगर किसी बच्चे में पहले बताये गए चार गुण किसी क्षेत्र विशेष
के लिए हैं तो माता –पिता को उसका साथ देते हुए उसे उसी दिशा में आगे बढ़ने देना चाहिए |
टू इडियट्स की तरह ही व्यव्हार कर रहे हैं | उम्मीद है देर सवेर उन्हें भी अक्ल आएगी और वो अपने बच्चे के किसी खास क्षेत्र की
तरफ रुझान के इन चार स्तंभों को पहचानेगे फिर बोमन इरानी की तरह कहेंगे …
, “ किक
मारता है , फुटबॉलर बनना है … “चल बन जा “
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