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मैं मेहनत के पैसे लेता हूँ , मदद के नहीं

मैं मेहनत के पैसे लेता हूँ , मदद के नहीं

अमीर लोगों का दिल कई बार बहुत छोटा होता है और गरीबों का बहुत बड़ा | ऐसे नज़ारे देखने को अक्सर मिल ही जाते हैं | परन्तु  कभी  -कभी कोई बहुत छोटी सी बात हमें बहुत देर तक खुश कर देती है और जीवन का एक सूत्र भी दे देती है |

मैं मेहनत के पैसे लेता हूँ , मदद के नहीं

किस्सा आज का ही है | यूँ तो दिल्ली में बंदर बहुत है | पर किस दिन किस मुहल्ले पर धावा बोलेंगे यह कहा नहीं जा सकता | जब ये आते हैं तो ये झुंड के झुंड आते हैं | ऐसे में सामान लाना मुश्किल होता है | क्योंकि ये हाथ के पैकेट छीन लेते हैं | पैकेट बचाने की जुगत में काट भी लेते हैं | 
आज शाम को जब मैं पास की बाज़ार से सामान लेने गयी तब बन्दर नहीं थे | अपनी कालोनी में घुसते ही बहुत से बंदर दिखाई दिए | मेरे दोनों हाथों में बहुत सारे पैकेट थे , उसमें कई सारे खाने -पीने के सामान से भरे हुए थे | मैं घर के बिलकुल पास थी पर मेरे लिए आगे बढ़ना मुश्किल था | उपाय यही था कि मैं वापस लौट जाऊं और आधा एक घंटा इंतज़ार करूँ जब बन्दर इधर -उधर हो जाए तब घर जाऊं |
 तभी एक रिक्शेवाला जो मेरी उलझन देख रहा था बोला , ” लाइए आपको छोड़ दूँ | उसने मेरा सामान रिक्शे में रख दिया , मैं बैठ गयी | मुश्किल से पाँच -सात मिनट का रास्ता था पर मेरी बहुत मदद हो गयी थी इसलिए मैं घर पहुँच कर रिक्शेवाले को धन्यवाद देते हुए २० रुपये का नोट देने लगी | 
रिक्शेवाले ने नोट लेने से इनकार करते हुए कहा ,
 ” ये मत दीजिये , मैं मेहनत के पैसे लेता हूँ , मदद के नहीं “| 
रिक्शेवाला तो चला गया पर उसका वाक्य मेरे दिमाग में अभी भी बज रहा है … शायद मैं उस वाक्य को जिंदगी भर ना भूल पाऊं | आदमी छोटा बड़ा नहीं होता … दिल छोटे बड़े होते हैं | कुछ खुशियों को पैसे में नहीं तोला जा सकता | वो सबके लिए सुलभ हैं फिर भी मैं , मेरा मुझसे में हम क्या -क्या खोते जा रहे हैं |आज बरबस ही राजकपूर जी पर फिल्माया गीत गुनगुनाने का जी कर रहा है ….
किसी को हो न हो हमें है ऐतबार , जीना इसी का नाम है …..

वंदना बाजपेयी 


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