ड्रग एडिक्शन की गिरफ्त में युवा – जरूरी है जागरूकता

ड्रग एडिक्शन की गिरफ्त में युवा - जरूरी है जागरूकता

जैसे –जैसे शाम  गहराने लगती
है , बड़े पार्कों में , जहाँ ज्यादा घने पेड़ व् झाड़ियाँ हों , दो तरह के लोगों की की
संख्या बढ़ने लगती है पहला “ प्रेमी युगल जो हॉस्टल , कॉलेज या कोचिंग से कुछ पल
साथ बिताने के लिए बहाने बना कर आये होते हैं , और दूसरा उन किशोर बच्चों और
युवाओं के
  छोटे –छोटे समूह जो ड्रग्स के शिकार हैं | पार्क
के किसी सुनसान कोने में किसी चिलचिलाते
 कागज़ , इंजेक्शन या सिगरेट  के साथ अपनी जिंदगी धुंआ करने वाले इन बच्चों के
बारे में आज
  मैं बात कर रही हूँ , जिन्हें
आप ने भी शायद सब से डरते छुपते नशा करते देखा होगा , परन्तु कुछ कहा नहीं होगा ,
क्योंकि उस समय ये कुछ कहने सुनने की मानसिक अवस्था में नहीं होते हैं | 


ड्रग एडिक्शन की गिरफ्त में युवा – जरूरी है जागरूकता 


अभी  कुछ
दिन पहले व्हाट्स एप पर एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें एक माँ अपने बच्चे को
ढूंढते हुए कूड़े के ढेर के पास जाती है | वहाँ  उसे अपने बेटे का शव मिलता है |
रोती –विलाप करती माँ को उसके हाथों में एक इंजेक्शन मिलता है |   ड्रग्स ने  उसके बच्चे की जान ले ली थी | 
माँ के ऊपर अंगुली उठाने से पहले रुकिए … ये भी हमारी आप जैसे ही कोई माँ होगी जो अपने बच्चे को दुनिया का सबसे प्यारा बच्चा कहती होगी … पर कब कैसे ये लाडला ड्रग की गिरफ्त में आया इसकी कहानी माँ के प्यार की कमी नहीं एक साजिश थी , जिसका वो शिकार हुआ | 

ड्रग्स लेने वाले
बच्चों की संख्या दिनों दिन बढती जा रही है | ये बहुत दुखद है | भारत में हर साल
१० हज़ार करों रुपये की हेरोईन इस्तेमाल होती है | भारत एशिया का सबसे बड़ा हेरोइन
इस्तेमाल करने वाला देश है | ५० लाख से ज्यादा युवा ड्रग्स के एडिक्शन के शिकार
हैं ये संख्या हर रोज बढ़ रही है | पंजाब और दिल्ली ने इनकी संख्या पूरे भारत में
सबसे ज्यादा है | सबसे ज्यादा नुक्सान पंजाब को हुआ है | इस विषय पर “उड़ता पंजाब”
फिल्म भी बनी थी | पाकिस्तान जो की अफीम का सबसे बड़ा उत्पादक है, वहाँ 
  से आने वाली
अफीम को नार्कोटेरिरिज्म का नाम दिया गया है | पाकिस्तान से एक लाख की अफीम दिल्ली
आते –आते एक करोंण की हो जाती है , यानी पैसा और युवा वर्ग दोनों की बर्बादी का
उद्देश्य पूरा हो जाता है | ये जानते समझते हुए भी ये संख्या रोज बढ़ रही है | 

क्यों होते हैं ड्रग एडिक्ट 


ये
ड्रग्स कुछ रुपयों से ले कर लाखों रुपयों तक की होती है | इसीलिये गरीब से लेकर
अमीर तक इसके शिकार हैं | यूँ तो किसी भी एडिक्शन से निकलना मुश्किल है पर
  दूसरे नशों में एडिक्ट बनने  में समय लगता है पर ड्रग्स के मामले में एक या
दो डोज ही एडिक्ट बनाने के लिए पर्याप्त हैं | ड्रग्स रीहैब सेंटर्स के अनुसार
 हम जब भी तकलीफ में होते हैं तो हमारा शरीर कुछ
ऐसे केमिकल बनाता
 है जो हमें आराम
पहुचायें , घर में किसी प्रियजन की मृत्यु होने पर भी इंसान एक सीमा तक रोने चीखने
के बाद खुद ही शांत पड़ जाता है , थोड़ी देर बाद फिर दर्द की लहर आती है | दरअसल ये
हमारे शरीर की दर्द की प्रतिरोधक क्षमता होती है | जो हमें बचाए रखती है |
 ड्रग्स की एक या दो डोज लेने के बाद ही हमारा
शरीर वो केमिकल बनाना बंद कर देता है | अब जब भी मष्तिष्क को शांति या आराम चाहिए
तो ड्रग्स की शरण में जाना ही पड़ेगा | ये एक ऐसा चक्रव्यूह है जिसमें एक बार फंसने
के बाद निकलना मुश्किल है |

कैसे बढ़ रहे हैं ड्रग एडिक्ट 


 ड्रग एडिक्शन की शुरुआत केवल किसी परिचित के ये कहने
से होती है , “ एक बार , बस एक बार …. और ये शिकंजा बढ़ता चला जाता है | सवाल ये
है की जो खुद ड्रग्स के कुप्रभाव अपने शरीर पर झेल रहा है वो दूसरों को क्यों
फँसाता है ? दरअसल उसे फ्री में ड्रग्स का लालच दिया जाता है | जो जितनों को जोड़ लेगा
उनको ड्रग्स फ्री हो जायेगी | एक ड्रग एडिक्ट के लिए ड्रग्स साँसे बन जाती है और
वो अपना जीवन बचाने  के लिए दूसरों का जीवन लीलने से गुरेज नहीं करता | ड्रग्स बनाने
वाली कम्पनियां भी यही तो
 चाहती हैं
इसीलिए वो सदस्य बढ़ाने  के एवज में फ्री ड्रग का ऑफर रखतीं है | पार्कों के आस –पास
आपने भी कुछ ऐसे शातिर आँखें जरूर देखी  होंगी जो शिकार ढूंढ
  रहीं है पर हमें क्या ये सोच कर हम आगे बढ़ जाते
हैं , पर जो चपेट में आता है वो हमारा न सही किसी दूसरे का मासूम बच्चा ही होता है
|
 एक बार चपेट में आने का मतलब ज्यादातर
मामलों में कभी ना निकल सकना ही होता है क्योंकि जितने रीहैब सेंटर हैं वो जितने
ड्रग एडिक्ट हैं की तुलना में ऊँट के मुंह में जीरा ही हैं |

कैसे दूर करें  ड्रग एडिक्शन 


मेरा इस पोस्ट को लिखने
का मकसद किशोर और युवाओं से ये गुजारिश करना है कि कोई कुछ भी कहे एक बार ले लो ,
अरे अभी  तो माँ के आँचल में बैठा है , बच्चा है … बेबी , बेबी … पर अपनी ना
पर अडिग रहे | ये किसी भी हालत में बड़ा बनना नहीं है | बड़ा वो है जो समझदार है ,
जो हित –अनहित जानता है | 

दूसरे समाज  को
ड्रग एडिक्ट के बारे में अपना रवैया बदलना होगा | हम सब ड्रग एडिक्ट पर एक लेबिल
लगा देते हैं कि ये तो ड्रग एडिक्ट है … समाज उसे स्वीकारता नहीं तो वो फिर से
उन्हीं लोगों के पास जाएगा जो ड्रग एडिक्ट हैं , कम से कम उसे वहां अपनापन तो
मिलेगा | 

अपने बच्चों की छोटी सी छोटी गतिविधि पर ध्यान रखें | आपके व्हाट्स एप , मोबाइल या फेसबुक लाइक से कहीं जायदा जरूरी है कि बच्चों समय दिया जाए | 

जरूरी है कि समाज उनके साथ बहुत प्रेमपूर्ण व्यवहार करे जिससे वो निकलने
के लिए प्रयास तो शुरू करें | हममें से किसी को पता नहीं होता कि कल कौन सा बच्चा “बस
एक बार”
 के चक्कर में ड्रग एडिक्ट बन
जाएगा | इसलिए जरूरी है स्कूल , कॉलेज में समुय –समय पर इस विषय में सेमिनार हो ,
झुग्गी –झोपडी वाले इलाकों में संस्थाएं जा कर बच्चों और युवाओं को जागृत करें | 


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