हिंदी की कीमत पर अंग्रेजी नहीं



हिंदी की कीमत पर ना सीखें अंग्रेजी







                         हिंदी दिवस आने वाला है | अपनी अन्य  पूजाओं की तरह एक बार फिर हम हमारी प्यारी हिंदी को फूल मालाएं चढ़ा कर पूजेंगे और उसके बाद विसर्जित कर देंगे | आखिर क्यों हम साल भर इसके विकास का प्रयास नहीं करते | एक पड़ताल ….


हिंदी की कीमत पर अंग्रेजी नहीं 

हिन्दी पखवारा चल रहा है । कुछ भाषण , कवि सम्मेलन , लेखकों और कवियों का सम्मान।अच्छी बात है । लेकिन हमें इससे कुछ अधिक करने की आवश्कता है । पौधों के बढ़ने और उन्हे स्वस्थ रखने के लिए पौधों की जड़ में पानी डालना पड़ता है , फल- फूलों में नहीं। वे तो जड़ों की मजबूती से स्वत: ही स्वस्थ होने लगते हैं।हमें जानना होगा कि हमारी भाषा की जड़ों में किस खाद – पानी की आवश्यकता है ? निश्चघय ही यह जड़ हमारे बच्चे हैं , जिन्हे सही अर्थ , सही उच्चारण सिखाना हमारी जिम्मेदारी है ।


केरल की एक अध्यापिका बच्चों को श्रुतिलेख बोल रही थीं ।उन्होंने ‘ बाघ ‘ शब्द बोला । बच्चे ने बाघ लिख दिया । काॅपी जाँचने पर उन्होने उस शब्द के नम्बर काट लिए । कारण पूछने पर उन्होने बताया कि ‘ बाग ‘ शब्द है ।जब कि उन्होंने बाघ ही बोला था । बच्चा रोकर रह गया । वह हिन्दी भाषी था। हमने उसे समझाया कि तुम्हारे लिखने में कोई गलती नहीं है । उनके उच्चारण का तरीका फर्क है । जैसे- जेसे बच्चे को मलयाली भाषा समझ में आने लगी , वह यह बात समझ गया ।


एक मराठी अध्यापिका ने बच्चे को संतान का अर्थ औलाद और बच्चा बताया । मैंने बच्चे से कहा कि औलाद तो सही है किन्तु संतान का अर्थ ‘ बच्चा ‘ गलत है । उसकी जगह संतति कहना सही होगा ।


आजकल की अंग्रेजी बोलने वाली माँएं बच्चों को सही शब्द सिखाना ही नहीं चाहतीं । उनको लगता है कि जो टीचर ने बताया है , अगर  बच्चे वह नहीं लिखेगें तो उनके नम्बर कट जाएगें ।  यह कैसी मानसिकता है ? कैसी स्पर्धा है ?  केवल ‘एक’ नम्बर के लिए  हम बच्चों को सही गलत का फर्क नहीं मालूम होने देना चाहते । एक मानसिकता यह भी है कि कुछ ही दिनों की तो बात है । आगे चलकर इसे इगंलिश ही बोलनी है । अंग्रेजी भाषा में ही कार्य करना है तो क्या फर्क पड़ता है ? किसी भाषा को सीखना गलत नहीं है किन्तु अपनी भाषा को भूल जाने की कीमत पर नहीं । यह कार्य तो हमे मिलजुल कर ही करना पड़ेगा , तभी कुछ बात बनेगी अन्यथा केवल झूठे आँकड़ों पर ही संतोष करना पड़ेगा । सच्चाई कभी सामने नहीं आ पाएगी और वास्तव मे हिन्दी को राष्ट्रभाषा तथा अंन्तर्राष्ट्रीय स्तर की भाषा बनाने की हकीकत स्वप्न बनकर रह जाएगी ।


उषा अवस्थी 


लेखिका -उषा अवस्थी





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