बालात्कार का मनोविज्ञान और सामाजिक पहलू

बालात्कार का मनोविज्ञान और सामाजिक पहलू

इज्जत के ऐसा शब्द जो सिर्फ औरतों के हिस्से में आया है …..घर के मर्दों का सबसे बड़ा दायित्व भी अपने घर की औरतों की इज्जत बचाना ही है | महिलाएं और इज्जत के ताने -बाने से बुनी सामाजिक सोच से हम क्या उम्मीद कर सकते हैं कि वो बालात्कार पीड़िता  के साथ खड़ा हो पायेगा | क्या अब समय आ गया है कि हम इस पर पुनर्विचार करें | पढ़िए शिवानी जी का एक विचारणीय आलेख …

बालात्कार का मनोविज्ञान और सामाजिक पहलू 




आगरा की दोनों घटनाओं ने फिर
झिंझोड़ कर रख दिया है!
दोनों ही घटनाओं में परिचित लड़कों
के संलिप्त होने की आंशका निकल रही है।
सांजलि के चचेरे भाई की आत्महत्या
ने घटना पर नये सिरे से
, पर पुराने
अनुभवों के आधार पर सोचने पर मजबूर किया है। सिहर उठते हैं नज़दीकी रिश्ते जब
दाग़दार होते हैं! 

इसमें केवल इंटरनेट या आज के माहौल को दोषी नहीं ठहराया जा
सकता। ये तो हर युग में चलता आया है। पहले और अब में अंतर केवल इतना ही आया है
कि पहले चुपचाप सहन करते हुए अपने स्तर पर निपटना होता था पर अब खुले तौर पर
विरोध करने की हिम्मत जुटी है। पर अगर उस हिम्मत को सामूहिक बलात्कार या जलाकर
, एसिड फेंककर तोड़
दिया जाता रहेगा तो सारी तरक्की
, सारा विकास
बेमानी है। जब तक घरों में पल रहे और छिपे हुए ऐसे मानसिक रोगियों को सामने लाकर
दंडित नहीं किया जाएगा तब तक बच्चियों की हर
नाको यही परिणाम
भुगतने होंगे।

हमें बलात्कार का मनोविज्ञान और
सामाजिक पहलू समझना होगा।

बहुत बुरा चक्रव्यूह है! लड़कियां
डरती हैं बदनामी से इसलिए चुप रहती हैं। वो चुप रहती हैं इसलिए उन पर ज़ुल्म
होते हैं। ज़ुल्म करने वालों को बदनामी से डर नहीं लगता है क्योंकि
…. इस क्योंकि के
आगे ही आपको हमको मिलकर काम करना है!

समाज में लड़कियों की ज़िंदगी,उनकी इज़्ज़त से
जुड़ी हुई है और इज़्ज़त शरीर से जुड़ी हुई है! तो पुरुष की इज़्ज़त शरीर से
क्यों नहीं जुड़ी हुई
?
चूंकि स्त्री को सिर्फ मादा शरीर
माना गया है
, इंसान माना ही नहीं गया है। या तो
शरीर या फिर देवी
,
पूजनीय मानकर इंसान होना उससे वंचित
रखा गया है। और उस शरीर को भी खुद पर मालिकाना हक नहीं। वो भी किसी न किसी पुरुष
के पास है। पिता के साथ है तो वहां पिता किसी वस्तु की तरह दूसरे पुरुष को दान
कर देगा। दान में प्राप्त वस्तु पर वह पति बनकर मालिकाना हक रखता है। कब
?कब इंसान बनकर
जीती है स्त्री
?
ये मालिकाना हक़ की भावना ही है जो
कि बलात्कार की शिकार लड़की को समाज में जीने नहीं देती है। इस्तेमाल की हुई
चीज़ को कोई पुरुष स्वीकार नहीं करेगा तो माता पिता के लिए कन्या ऐसा बोझ हो
जाएगी जिसे किसी को दान देकर वो मुक्त नहीं हो सकते! इसलिए अपने शरीर को
सुरक्षित रखने के लिए स्त्री पर दबाव होता है। और सबसे निकृष्ट बात ये कि शरीर
को दूसरों की सेवा करने में गला सकती है
, छिजा सकती है पर
अपने आनंद के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकती। यहां मैं प्रेम की बात कर रही हूं। आप
देखिए कि प्रेम प्रसंगों में भी अगर कोई स्त्री शारीरिक संबंध स्थापित करती है
तो समाज उसे स्वीकारता नहीं! उसके पीछे भी मानसिकता यही है कि अपने शरीर का
इस्तेमाल अपने सुख
,
अपनी खुशी के लिए नहीं कर सकती है
क्योंकि शरीर पर हक़ किसी और का
, किसी पुरुष का
है।


किसी भी नर-मादा संबंध में केवल एक
की ही इज़्ज़त खराब कैसे हो जाती है
? चाहे प्रेम संबंध
हों या बलात्कार
,
शरीर दोनों का इस्तेमाल हुआ है तो
दोष दोनों को लगना चाहिए। पर नहीं! कलंक स्त्री के माथे पर ही लगता है! कारण वही
है
जिसके बारे में सोचना हमने वर्जित
किया हुआ है। जिस दिन बलात्कार की शिकार लड़की बिना झिझके घर से बाहर निकल सकेगी
, लोगों के लिए दया
की या घृणा की पात्र नहीं रहेगी
, त्यजात्य नहीं
रहेगी बल्कि वो इंसान जिसने बलात्कार किया है
, समाज द्वारा
दंडित किया जाएगा
,
बहिष्कृत किया जाएगा और घरों से
बाहर फेंक दिया जाएगा
,
उस दिन कहिएगा कि हां
लड़कियों-महिलाओं को भी शरीर से अलग इन्सान समझा जा रहा है।


जब तक समाज में लड़कियों को एक मादा
शरीर के रूप में ही मान्यता मिली हुई है तब तक उनका शोषण  (अलग से
शारीरिक शोषणकहना आवश्यक नहीं
है) होता रहेगा।
जितनी भी महिलाओं को मेरी बात से
सहमति नहीं है वे अपने मन में झांकें
, टटोलें कि अपने
बचपन से अपनी बेटी के जवान होने तक
, उन्होंने कितनी
बार चाहे-अनचाहे स्पर्शों के लिए खुद को परेशान न किया होगा! आक्रोश के साथ साथ
अपराध बोध न रहा होगा!

काश कि स्त्री का जीवन ,उसका चरित्र केवल
और केवल उसका शारीरिक मसला नहीं होता! और साथ ही पुरुष का जीवन
, उसका चरित्र भी
शारीरिक मसला होता तो समाज में न बलात्कार होता न उसका ख़ौफ़ होता!
जैसे राह चलते दुर्घटना हो जाती है
वैसे ही शारीरिक संबंध का मामला भी होता। यकीन मानिए इससे कोई अराजकता नहीं
फैलती और ना ही दुनिया इसी में लिप्त रहती!  कौन चाहता है दुर्घटनाग्रस्त
होना
? तो ऐसे ही कोई नहीं चाहेगा अनावश्यक
रूप से शारीरिक संबंध बनाना। पर बन जाए तो दुर्घटना में घायल की तरह ही इलाज
कराते और ठीक हो जाते।

काल्पनिक बात लगती है। हमारे समाज
में लड़के-लड़कियों के लिए शारीरिक पवित्रता के मापदंड युगों-युगों से अलग अलग
बने हुए हैं कि उनको समान करने के लिए और कई युग लग जाएंगे।
मालिकाना हक़ की भावना पुरुष में
इतनी गहरे पैठी हुई है कि उसको उखाड़ कर अलग करने के लिए खुरचना होगा। उस खुरचने
में वो घायल भी होगा । अब भला कोई खुद को घायल कैसे कर सकता है! इसलिए उसके
आसपास की महिलाएं ही ये कर सकती हैं। बुजुर्ग महिलाओं को शुरुआत करनी चाहिए।
अपने नाती पोतों को बदलाव के लिए तैयार करें। हमारी पीढ़ी की महिलाओं को अपने
बच्चों को इस बदलाव के लिए तैयार करना चाहिए। असंभव कुछ भी नहीं है!
शरीर के मामले लड़के-लड़कियों के
लिए समान रूप से महत्वपूर्ण होने चाहिए। इंसान के रूप में दोनों को समान महत्व
प्राप्त हो।
ज़िम्मेदारियों के बंटवारे पर पुनः
विचार किया जाए।

दोषी पुरुष नहीं है। दोषी है हमारी
व्यवस्थाएं! जब जिस युग में वो बनीं थीं उस युग के बदलने के साथ ही बदलती रहनी
चाहिए थीं। और चूंकि व्यवस्थाओं के संवहन में महिलाओं की बड़ी भूमिका है इसलिए
बदलाव की बड़ी ज़िम्मेदारी भी उन्हीं की है।
मैं मेरे हिस्से की कोशिश कर रही
हूं। आप सब देखने की कोशिश करिएगा कि बेहतर कल के लिए क्या किया जा रहा है और
किया जा सकता है।
शिवानी ,जयपुर

लेखिका शिवानी जयपुर



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