एक डॉक्टर की डायरी – उसकी मर्जी

एक डॉक्टर की डायरी - उसकी मर्जी

ये एक डॉक्टर का सत्य अनुभव है | आमतौर पर डॉक्टर संवेदनहीन माने जाते हैं पर एक डॉक्टर को अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना सीखना होता है …. खास कर तब जब मरीज के नाम ऊपर से मौत का फरमान जारी हो चुका हो |

एक डॉक्टर की डायरी – उसकी मर्जी

वार्ड के बाहर बहुत शोर था | ये सारे डॉक्टर बहुत चोर होते हैं | मरीज की जान चली जाए पर इनकी जेबें भरी रहे | अपने ही केबिन में बैठे -बैठे मैं समझ गयी की शायद मीता का केस बिगड़ गया है | एक ठंडी आह भर कर “उसकी मर्जी “कह , मैंने सामने बैठे मरीज को देखना शुरू किया |

पर फिर से एक प्रश्न मन में उमड़ आया ,क्या डॉक्टर सच में संवेदना शून्य होते हैं ? मैं … मैं भी तो ऐसी नहीं थी | जब मेडिकल की परीक्षा पास करी थी तब कितने सपने थे की मरीजों की सेवा करने के | सोचती थी हर मरीज को अपने परिवार का सदस्य मानूँगी , पूरी जी जान से सेवा करुँगी | 
जूनियर डॉक्टर बनते ही वार्ड में ड्यूटी  भी लगने लगी | उस समय कोई खास काम नहीं करना होता था | बस मरीजों को चेक कर ये देखना होता था कि वो ठीक से दवा वैगैरह ले रहे हैं या नहीं , उनसे बातें करना और खिलखिला कर उनके दर्द कम करना | 
उसी समय हॉस्पिटल में एडमिट हुई थी श्रेया | फर्स्ट डिलीवरी थी उसकी |  थोडा कोम्प्लिकेशन था ,इसीलिये एडमिट किया गया था | श्रेया का प्रेम विवाह था | घर वालों के खिलाफ जा जा कर उसने श्रेयस से शादी की थी , पर साथ ज्यादा ना चल सका | एक कार एक्सीडेंट ने श्रेयस को उससे उस समय छीन लिया जब वो तीन माह की गर्भवती थी | श्रेयस की अंतिम निशानी को वो दुनिया भर की सारी  खुशियाँ देना चाहती थी | तभी तो इतने बड़े आघात के बाद भी उसने आशा का दीप अपने अंदर संजोये रखा था |  उसका पूरा परिवार भी इसी कोशिश में लगा रहता कि वो हरदम खिलखिलाती रहे | पूरा जच्चा -बच्चा वार्ड उनकी हंसी से खिलखिलाता | मैं भी अक्सर वहीँ जा कर बैठ जाती | श्रेया से मेरी दोस्ती होने लगी थी |

श्रेया अक्सर मुझे अपने होने वाले बच्चे के लिए खुद बनाए हुए कपडे दिखाती | कभी वो  अपने उन सपनों को साझा करती जो उसने बच्चे के लिए देखे थे | कभी -कभी श्रेयस की याद में जब उसकी आँखें भर जातीं तो अपना दुःख झटक कर कहती , मुझे रोना नहीं है , मुझे हँसना है श्रेयस की निशानी के लिए , तभी तो वो मेरे पास छोड़ कर गए हैं |

उस दिन मैं श्रेया के साथ बैठी ताश खेल रही थी कि डॉक्टर आहूजा राउंड पर आयीं | उन्होंने  श्रेया की खांसी पर गौर करते हुए कहा , श्रेया तुम ये टेस्ट करवा लो |” मैंने भी ध्यान दिया जब से श्रेया आई है उसे लगातार खाँसी आ रही है | हालांकि खाँसी इतनी नहीं थी कि चिंता की जाए | श्रेया ने मेरा हाथ पकड़ कर पूछा ,” सब ठीक तो है ना | मैंने भी हाँ में गर्दन हिला दी | वो मुस्कुरा दी |

दूसरे दिन पता चला कि उसने उसने फूल सी बेटी को जन्म दिया है | नन्ही फूल सी बच्ची पा  श्रेया बहुत खुश थी … बहुत खुश | पूरा परिवार जैसे जीवंत हो उठा | सपनों ने फिर आकर लेना शुरू कर दिया | बच्ची कमजोर थी इसलिए डॉक्टर आहूजा ने उसे कुछ दिन और हॉस्पिटल में रुकने को कहा |

एक हफ्ते बाद डॉक्टर आहूजा ने मुझे अपने केबिन में बुला कर कहा , ” मेघा , ये श्रेया की रिपोर्ट हैं …. इसके बारे में तुम्हे उसे बताना है | मैंने रिपोर्ट पलट कर देखी | ओह … ओरल कैंसर जो  मेटा स्टैसिस कंडीशन में आ कर दोनों फेफड़ों को घेर चुका  था | मुझे चक्कर सा आ गया | मैंने डॉक्टर आहूजा की तरफ देख कर पूंछा , ” कितना समय है ? बस डेढ़ , दो महीने |

मेरी आँखें  बाँध तोड़ कर बहने लगीं | मैंने डॉक्टर आहूजा से कहा , ” मैम , मैं नहीं बता पाऊँगी , कृपया  ये काम किसी और को दें | कितनी उम्मीदें है उसे अपनी बच्ची को लेकर | मैं कैसे बता पाऊँगी |

डॉक्टर आहूजा ने सख्त आवाज में कहा , ” तुम ही जाओगी , ये भी तुम्हारे प्रोफेशन का हिस्सा है | ऐसे मरीजों को बताना कि उनकी जिन्दगी अब ज्यादा बाकी नहीं है , ऐसे में भी उन्हें आशा देना जब ‘उसकी मर्जी’ के आगे हम सब डॉक्टर हारते हैं |

मैं रोती जा रही थी पर डॉक्टर आहूजा ने मेरी एक ना सुनी |

मेरे हाथों में फ़ाइल और मेरे चेहरे को देख कर उन सब ने किसी अनहोनी को भांप लिया | श्रेया ने मेरा हाथ पकड कर पूंछा , ” सब ठीक तो है ना | मैंने रुलाई रोकते हुए कहा , रिपोर्ट ठीक नहीं है , कुछ और टेस्ट करने होगे |

“रिपोर्ट में क्या निकला है ?” श्रेया के पिता ने अधीरता से पूंछा

अभी की रिपोर्ट के अनुसार कैंसर है ,अडवांस स्टेज है ,  हम कल से ही ट्रीटमेंट शुरू कर देंगे |बहुत से मरीज ठीक होते हैं |

पर कैंसर शब्द के बाद उन्होंने कुछ भी नहीं सुना | श्रेया , मेरी बेटी , मेरे श्रेयस की निशानी मुझे तुझे पालना है , खूब बड़ा करना है , कह -कह कर रोने लगी | पूरा परिवार अपने आंसू पोंछते  हुए उसे संभालने की कोशिश करने लगा |

मैं अपने आँसू पीये वहीँ खड़ी रह गयी …. धीर गंभीर बने रह कर उस दिन मैंने पहली बार अभिनय करना सीखा |

उन दो महीनों के समय में पल -पल श्रेया टूटती रही और एक दिन सारे दर्द , सारे भय , सारी  चिंताएं छोड़ कर उस लोक चली गयी |

उन दो महीनों के दौरान मैं कितना विवश थी , कितनी असहाय थी , कितना टूट रही थी …. ये मेरे आलावा कोई नहीं जानता था |

संवेदनहीन नहीं उसकी मर्जी के आगे डॉक्टर भी लाचार हैं |

नीलम गुप्ता
एक डॉक्टर से बातचीत पर आधारित

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