जब राहुल पर लेबल लगा

प्रेरक कथा -जब राहुल पर लेबल लगा


“यार अपने रंग का कुछ तो करो, थोड़ी फेयर एंड लवली ही लगा लिया करो , ये रंग तो तेरा उलटे तवे जैसा हो रहा है … रात को बच्चों को डराने के काम आएगा “कोई एक किसी महफ़िल में ऐसा कहता है और सब हंस पड़ते हैं, इस बात की चिंता किये बिना कि सुनने वाले को कैसा लगा रहा है | क्या वो अपने ऊपर लगे काले रंग या कम सुंदर होने के लेबल को आसानी से धो पायेगा या सारी जिन्दगी उसका आत्मविश्वास इस लेबल के नीचे दबा हुआ रह जाएगा …रंग का तो नहीं पर एक लेबल राहुल पर भी लगा था …आइये जाने उसने क्या किया …

प्रेरक कथा –जब राहुल पर लेबल लगा


“बेटा राहुल ,राहुल, चलो जल्दी तैयार हो जाओ आज हम सब को तुम्हारे स्कूल जाना है |क्लास फोर में पढने वाले राहुल ने उनींदी आँखें खोली, कहना तो चाहता था कि आज नहीं मम्मी पर कह ना सका ,जानता था जाना तो पड़ेगा ही, इसलिए चुपचाप उठ कर ब्रश करने लगा |

राहुल की स्कूल टीचर ने आज उसके माता -पिता को स्कूल में बुलाया है | वो समझ रहा था कि उसकी कोई कोई शिकायत करने के लिए उसकी टीचर ने उसके माता -पिता को बुलाया है | पर क्या ?

वो तरह -तरह के ख्याल करता रहा कि उसमें कुछ तो कमी है | पता नहीं टीचर माता -पिता को क्या बतायेंगी ? पता नहीं माता -पिता को कैसा लगेगा ? क्या पता आज मेरे -माता -पिता का सर मेरे कारण झुक जाए | सोचते ही वो उदास हो गया |
नियत दिन पर राहुल अपने पेरेंट्स के साथ स्कूल गया | टीचर ने राहुल के मार्क्स दिखाते हुए कहा , “देखिये हर सब्जेक्ट में कम नंबर आये हैं , यहाँ तक की अंग्रेजी में भी , जबकि आज कल इंग्लिश मीडियम स्कूल में बच्चों के इंलिश में बहुत कम पढ़ कर भी इससे ज्यादा मार्क्स आ जाते हैं क्योंकि पूरा एनवायरमेंट इंग्लिश का ही होता है … फिर भी “

टीचर ने उसके पेरेंट्स की आँखों में आँखे डालकर सहानुभूति से कहा , ” माफ़ कीजियेगा, मुझे कहना पढ़ रहा है कि आप का बेटा धीमे सीखता है |”

उफ़ , slow learner, यानि उसका माइंड और बच्चों से कम है , राहुल का सर शर्म से झुक गया | पता नहीं ये सुन कर उसके पेरेंट्स को कैसा लगा होगा ये जानने के लिए उसने पहले ने माँ की तरफ देखा , फिर पिता की तरफ …. उसने सोचा था कि दोनों के सर झुके हुए होंगे पर उसकी आशा के विपरीत दोनों मुस्कुरा रहे थे , |

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रास्ते भर उसके दिमाग में वो शब्द घूमता रहा …. धीमे सीखने का सीधा -सीधा मतलब वो मूर्ख है , वो सीख ही नहीं सकता, वो पढ़ ही नहीं सकता, घर आ कर वो अपने बिस्तर पर लेट कर खुद को कोसने लगा |मम्मी पापा के बुलाने के बाद भी उसने खाना नहीं खाया | पर उन्होंने उस समय उससे कुछ कहा नहीं , ना ही खाना खाने की जबरदस्ती की |

शाम को मम्मी -पापा उसके कमरे में गए | उनके हाथ में एक कागज़ था | उन्होंने कहा , ” राहुल आज हम जानते हैं कि तुम परेशान हो, हमें भी तुम्हारी टीचर के कहे के बारे में तुसे बात करनी है |

वही कि मैं धीमे सीखता हूँ , मैं मूर्ख हूँ , मैं अपनी जिन्दगी में कुछ नहीं कर पाऊंगा , राहुल ने तपाक से कहा |
हाँ , कहकर उन्होंने उस कागज़ पर ‘धीमा सीखना’ लिखा , फिर उसके दो … चार , कई टुकड़े तब तक किये जब तक कागज़ चिंदी -चिंदी नहीं हो गया | राहुल को आश्चर्य में देखते हुए देखकर वे बोले , ” राहुल हम तुम्हारी टीचर की इस बात से सहमत नहीं हैं कि तुम धीमा सीखते हो | हम इस बात को गलत सिद्ध करना चाहते हैं , क्या तुम हमारा साथ दोगे ?
राहुल ने ‘हाँ’कहा |
अब उन्हने राहुल को रोज पढाना शुरू किया
राहुल ने भी मेहनत बढ़ा दी |
अगले रिजल्ट में राहुल पूरी क्लास में सेकंड आया |
राहुल ने टीचर को गलत सिद्ध कर दिया |
ऐसा उसके माता -पिता की समझदारी की वजह से हुआ की वो अपने ऊपर लगे लेबल से बाहर निकल पाया |
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मित्रों , इस कहानी का दूसरा अंत भी हो सकता था … राहुल फेल हो जाता … उसका मन पढने से हट जाता, वो पढाई ही छोड़ देता … या निराश होते होते एक दिन …

जरा सोचिये , हममे से कितने लोग हैं जो दूसरों द्वारा खुद पर लगाए लेबल को सही मान लेते हैं और प्रयास ही छोड़ देते हैं ?

और उनकी बात को सही सिद्ध कर देते हैं |


लोग कहते हैं रंग दबा है … हम असुन्दर मान लेते हैं
लोग कहते हैं ये काम तुमसे नहीं होगा …हम प्रयास छोड़ देते हैं |
लोग कहते हैं तुम तो बोल ही नहीं पाते … हमें दूसरों के सामने बोलने से डर लगने लगता है |

क्या येसही है ?

यकीनन नहीं

फिर भी हम सब लोग दूसरों द्वारा अपने ऊपर लगाए गए लेबल को स्वीकार कर लेते हैं , कोई प्रतिकार नहीं करते … एक युद्ध बिना लड़े हार जाते हैं |

याद रखिये हर समय राहुल के माता -पिता जैसे लोग साथ नहीं होंगे | हमें खुद ही ये लेबल हटाने हैं |

कोई भी हमारे बारे में कुछ भी कहे , उससे ज्यादा जरूरी है कि हम अपने बारे में क्या कहते या सोचते हैं |

नीलम गुप्ता

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