अनमोल है पिता का प्यार

अनमोल था है और रहेगा पिता का प्यार

आज का दिन पिता के नाम है | माँ हो या पिता ये दोनों ही रिश्ते किसी भी व्यक्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं , जो ना सिर्फ जन्म का कारक हैं बल्कि उसको  एक व्यक्तित्व को सही आकार में ढालने में भी सहायक | पिछले एक हफ्ते से अख़बारों मैगजींस में पिता से सम्बंधित ढेरों लेख  पढ़ने को मिले , जिनमें से ज्यादातर के शीर्षक रहे …”बदल रहे हैं आज के पापा’, ‘माँ की जगह ले रहे हैं पापा’ , ‘नया जमाना नये पापा’, ‘पापा और बच्चों का रिश्ता हो गया है बेहतर’  आदि-आदि | ये सच है कि आज के समय की जरूरतों को देखते हुए पिता की भूमिका में परिवर्तन आया है, लेकिन आज के पिता को पुराने पिता से बेहतर सिद्ध करने की जो एक तरफा कोशिश हो रही है वो मुझे कुछ उचित नहीं लगी |

अनमोल था है और रहेगा पिता का प्यार 

 ये सच है की फादर्स  डे मनाना हमने अभी हाल ही में सीखा है …लेकिन संतान और पिता का एक खूबसूरत रिश्ता हमेशा से था | प्रेम तब भी था अभिव्यक्ति के तरीके दूसरे थे …और उनको उसी तरह से समझ भी लिया जाता था | दादी के ज़माने में संयुक्त परिवारों में पिता अपने बच्चों को नहीं खिलाते थे …भाई के बच्चों को खिलाते थे , प्यार दुलार देते थे | इस तरह से हर बच्चे को चाचा ताऊ से पिता का प्यार मिल ही जाता था | अपने बच्चे ही क्या तब गाँव की बेटी भी अपनी बेटी होती थी | कर्तव्य और पारिवारिक एकता के लिए निजी भावनाओं का त्याग आसान नहीं है | छोटे पर बच्चों को समझ भले ही ना आये पर बड़े होते ही उन्हें समझ में आने लगता था कि उनके पिता , चाचा , ताऊ परिवार को बाँधे रखने के लिए ये त्याग कर रहे हैं , तब पिता उनकी आँखों में एक आदर्श के रूप में उभरते थे | लोकगीत तब भी बाबुल के लिए ही बनते थे | बच्चे जानते थे कि उनके पिता उन्हें बहुत प्यार करते थे |

अगर अपने ज़माने के पिताओं की बात करूँ तो उस समय पिता ज्यादातर कठोर दिखा करते थे , जिसका कारण घर में अनुशासन रखना होता था | उस समय माताएं शरारत करते समय बच्चों को डराया करतीं , ” आने दो बाबूजी को  , जब ठुकाई करेंगे तब सुधरोगे ” और बच्चे शैतानी छोड़  कर किताबें उठा लेते | ये डर जानबूझ कर बनाया जाता था | कई बार पिता पसीजते भी तो माँ अकेले में समझा देती, “देखो आप कठोर ही रहना , नहीं तो किसी की बात नहीं सुनेगा ‘, और पिता अनुशासन की लगाम फिर से थाम लेते | पिता के अनुशासन बनाये रखने वाले कठोर रूप में माँ की मिली भगत रहती थी इसका पता बड़े होकर लगता था | माँ के मार्फ़त ही बच्चों समस्याएं पिता तक पहुँच जाती थीं और माँ के मार्फ़त ही पिता की राय बच्चों को मिल जाती थी | आज अक्सर माता -पिता दोनों परेशान  दिखते हैं , ” ये तो किसी से नहीं डरता | “अनुशासन भी जीवन का अहम् अंग है , जिसकी पहली पाठशाला घर ही होती है, ये हम पिता से सीखते थे  |

मैंने स्वयं अपने पिता के कठोर और मुलायम दोनों रूप देखे | जिन पिता की एक कड़क आवाज से हम भाई -बहन बिलों में दुबक जाते उन्हें कई बार माँ से ज्यादा भावुक और ममता मयी देखा | तब सोचा करती कि घर में अनुसाशन बनाए रखने के लिए वो कितना मुखौटा ओढ़े रखते थे , आसान तो ये भी नहीं होगा | इस आवरण के बावजूद ऐसा कभी नहीं हुआ कि उनका प्रेम महसूस नहीं हुआ हो | वो ह्म लोगों के साथ खेलते नहीं थे , लोरी भी नहीं गाते थे , शायद पोतड़े भी नहीं बदले होंगें पर मैंने उन्हें कभी अपने लिए कुछ करते नहीं देखा हम सब सब की इच्छाएं पूरी करने के लिए वो सारी कटौती खुद पर करते | कितनी बार मन मार लेते कि बच्चों के लिए जुड़ जाएगा कितने भी बीमार हों हम सब की चिंता फ़िक्र अपने सर ओढ़ कर कहते , ” तुम लोग फ़िक्र ना करो अभी हम हैं | उन्होंने कभी नहीं कहा कि हम तुम लोगों से बहुत प्यार करते हैं पर उनके अव्यक्त प्रेम को समझने की दृष्टि हमारे पास थी |

अब आते हैं आज के पिता पर ….आज एकल परिवारों में , खासकर वहाँ जहाँ पति -पत्नी दोनों काम पर जाते हों , पिता की छवि में स्पष्ट परिवर्तन दिखता है | बच्चों को अकेले सही से पालना है तो माता -पिता दोनों को पचास प्रतिशत माँ और पचास प्रतिशत पिता होना ही होगा | पिताओं ने इस नए दायित्व को बखूबी निभाना शुरू किया है | अनुशासन का मुखौटा उतार कर वो बच्चों के दोस्त बन कर उनके सामने आये हैं | माँ का बच्चों और पिता के बीच सेतु बनने का रोल खत्म हुआ है | बच्चे सीधे पिता से संवाद कर रहे हैं और हल पा रहे हैं | ये रिश्ता बहुत ही खूबसूरत तरीके से अभिव्यक्त हो रहा है |

जैसे पहले पिता और बच्चों के रिश्ते के बीच संवाद की कमी थी आज इस रिश्ते में दोस्ती के इस रिश्ते में बच्चे पिता का आदर करना नहीं सीख रहे हैं | जब पिता का आदर नहीं करते तो किसी बड़े का आदर नहीं करते | हम सब में से कौन ऐसा होगा जिसने ये संवाद अपने आस -पास ना सुना हो , ” चुप बैठिये अंकल , पापा !आपको तो कुछ आता ही नहीं , और सड़क पर , ” ए  बुड्ढे तू  होता कौन है हमरे बीच में बोलने वाला ” |एक कड़वी  सच्चाई ये भी है कि आज जितने माता -पिता बच्चों के मित्र बन रहे हैं उतने ही तेजी से वृद्धाश्रम खुल रहते | दोस्ती का ये रिश्ता दोस्ती में नो सॉरी नो थैंक यू की जगह … “थैंक यू पापा ” और समय आने “सॉरी पापा ‘में बदल रहा है |

जो भी हो पिता और बच्चे का रिश्ता एक महत्वपूर्ण रिश्ता है , जिसमें हमेशा से प्रेम रहा है …समय के साथ अभिव्यक्ति का तरीका बदला है आगे भी बदलेगा | रिश्ता वही सच्चा है जिसमें सामंजस्य प्रेम और एक दूसरे के प्रति त्याग करने की भावना बनी रहे | भले ही ये आज का समय हो , पापा दोस्त बन गए हों पर , आज आप की हर जरूरत पूरी करने वाले पिता की आपसे दरकार  तो अब भी वही पुरानी है , जो इस फ़िल्मी गीत में है …

” आज अंगुली थाम  के तेरी तुझे मैं चलना सिखलाऊं
कल हाथ पकड़ना मेरा जब मैं बुड्ढा हो जाऊ “
                                                  आज मिल रहा है और हम ले रहे हैं , ये फादर्स डे का असली मतलब नहीं है | ना ही गिफ्ट्स , कार्ड्स , और आई लव यू पापा ही इसके सही अर्थ को सिद्ध करते हैं | इसका सही अर्थ तो ये है कि अपने पिता के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त करने के लिए उन्हें वही भावनात्मक , शारीरिक , मानसिक संबल देने का है ….जो वो आपको हमेशा से देते आये हैं |

फादर्स डे  की शुभकामनाएं

वंदना बाजपेयी

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