कड़वा सच

कड़वा सच
कहने वाले कहते हैं कि जब शेक्सपीयर ने लिखा था कि नाम में क्या रखा है तो उसने इस पंक्ति के नीचे अपना नाम लिख दिया था | वैसे नाम नें कुछ रखा हो या ना रखा हो नाम हमारे व्यक्तित्व का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है | इतना की कि इसके आधार पर नाम ज्योतिष नामक ज्योतिष की की शाखा भी है | कई माता -पिता कुंडली से अक्षर विचारवा कर ही बच्चे का नाम रखते हैं | लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो फैशन के चलन का नाम रख देते हैं तो कुछ लीक से अलग रखने की | ऐसा ही एक नाम मैंने एक बार सुना था ‘विधुत’ सुन कर अजीब सा लगा था | खैर नाम रखना अलग बात है और नाम का अर्थ जानकार नाम  रखना अलग बात |  इस विषय पर काका हाथरसी की कविता नाम -रूपक भेद की कुछ कुछ पंक्तियाँ  पढने के बाद ही पढ़िए , नाम के बारे में एक कडवा सच …


मुंशी चंदालाल का तारकोल सा रूप 
श्यामलाल का रंग है जैसे खिलती धूप 
जैसे खिलती धूप , सजे बुशर्ट पैंट में 
ज्ञानचंद छ: बार फेल हो गए टेंथ में 
कह काका ज्वालाप्रसाद जी बिलकुल ठंडे 
पंडित शान्तिरूप चलाते देखे डंडे 

कड़वा सच 

शुक्रवार ,1 नवम्बर 2019  को अपने कार्य से मैं एस बी आई बैंक के मैनेजर से जब मिली,उस समय एक नौजवान , जिसकी उम्र मेरे अनुमान से करीब चौबीस वर्ष के आस – पास रही होगी ,मैनेजर से कह रहा था कि उसै बैंक के लिए आवास बनाने हैं ,अतः उसे लोन चाहिए। मैनेजर उसे उस आॅफीसर का पता एवं फोन नम्बर बता रहीं थीं जिनके द्बारा उसे लोन मिल सकता था। इसी संदर्भ में उन्होने उससे उसका नाम पूछा।उसने अपना नाम मीनाशुं बताया। जब मैनेजर ने उससे उसके नाम का अर्थ जानना चाहा तो उसका उत्तर सुनकर मैं चौंक गई । उसने कहा उसे इस नाम का अर्थ नहीं मालूम। उसे इतना पता है कि उसके नाम का सम्बन्ध उसकी माँ से है ।यह सुनकर मुझसे रहा नहीं गया। मैंने उससे पूँछ ही लिया ‘तुम्हारी माँ का क्या नाम है?’ उसने कहा ,’मीना।’ मैंने कहा मीना + अंशु = मीनांशु । अंशु मायने सूर्य होता है। यानी तुम अपनी माँ के लिए सूर्य के समान हो। फिर मैंने उससे कहा कि हम हिन्दुस्तानी हैं , हिन्दी भाषी हैं ,हमें अपने नाम का अर्थ तो पता होना ही चाहिए । अब किसी से यह मत कहना कि तुम्हे अपने नाम का अर्थ नहीं मालूम? वह मुस्करा दिया।


                        किन्तु इस घटना ने मुझे कितना कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया। हमारे यहाँ ऐसे भी नौजवान हैं ,जिन्हे अपने नाम का अर्थ नहीं मालूम?यह मेरे लिए किसी अचरज से कम नहीं था । कभी घर के लोगों ने या कभी किसी शिक्षक ने भी नहीं पूछा ? निश्चय ही नहीं। हमें याद आया हमारी शिक्षिकाओं ने भी तो कभी हमसे हमारे नाम का अर्थ नहीं पूछा। सब यह मान कर ही चलते होगें कि यह तो बच्चे जानते ही होगें या फिर इस ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया।और तो और मैनेजर साहिबा ने भी इस बात पर कोई आश्चर्य व्यक्त नहीं किया। उन्हे इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ा ,जब कि कुछ दिनों पहले ही हिन्दी दिवस मनाया गया है। शायद उन्हे भी इसका अर्थ मालूम न हो अथवा यह उनके कार्य का हिस्सा नहीं।

        मुझे अभिभावकों से  यह कहना है कि वह ही बच्चे का नाम रखते हैं ,अतः उनकी जिम्मेदारी बनती है कि वह जानें कि बच्चे को उसके नाम का अर्थ मालूम है कि नहीं ? शिक्षकों से भी मैं कहना चाहूँगी कि वह इस बात पर गौर करें।

उषा अवस्थी 
                                     
लेखिका -उषा अवस्थी


                                  
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