गुज़रे हुए लम्हे -अध्याय 11

 

आत्मकथा लेखन में ईमानदारी की बहुत जरूरत होती है क्योंकि खुद के सत्य को उजागर करने के लिए साहस चाहिए साथ ही इसमें लेखक को कल्पना को विस्तार नहीं मिल पाता | उसे कहना सहज नहीं होता | बहुत कम लोग अपनी आत्मकथा लिखते हैं | बीनू दी ने यह साहसिक कदम उठाया है | बीनू भटनागर जी की आत्मकथा “गुज़रे हुए लम्हे “को आप अटूट बंधन.कॉम पर एक श्रृंखला के रूप में पढ़ पायेंगे |

गुज़रे हुए लम्हे -परिचय

गुजरे हुए लम्हे -अध्याय 1

गुज़रे हुए लम्हे -अध्याय 2

गुज़रे हुए लम्हे -अध्याय 3

गुज़रे हुए लम्हे -अध्याय चार

गुज़रे हुए लम्हे अध्याय -5

गुज़रे हुए लम्हे -अध्याय 6

गुज़रे हुए लम्हे -अध्याय 7

गुजरे हुए लम्हे -अध्याय-8

गुज़रे हुए लम्हे -अध्याय 9

गुज़रे हुए लम्हे -अध्याय -10

अब आगे ….

 

गुज़रे हुए लम्हे -अध्याय 11-अमरीका यात्रा और सेवानिवृत्त

(दिल्ली 2000 से 06)

इन्हें सेवानिवृत्त होने में अधिक समय नहीं था, बच्चे एक बार फिर रेलवे की शान के साथ शिमला जाना चाहते थे। बहुत पहले जब ये दोनों छोटे थे तब इनके काम के सिलसिले में साथ हो लिये थे, वही अनुभव दोहराना चाहते थे।हम जाते समय रेल कार से गये जिसे जहाँ चाहें रोक कर इन्होंने लाइन और सिग्नल सिस्टम की जाँच परख की और आगे बढ़ गये। कुफरी तथा अन्य दर्शनीय स्थल देखे और वापिस कैरिज से आये।

 

शताब्दी के पहले साल में अप्रैल के महीने में अचानक चाची जी की तबीयत ख़राब हुई और  वे 3-4 घंटे में ही चली गईं। जब तक हम अस्पताल पहुँचे  वे जा चुकी थीं।  दिल की बीमारी तो उन्हें थी ही, उच्च रक्त चाप भी रहता था, परन्तु जाने से पहले कोई विशेष बीमार नहीं हुईं थी। बस वक़्त आ गया था और सुकून से चली गईं। उन दिनों अपूर्व और सौम्या के कॉलिज के दूसरे साल की परीक्षा चल रहीं थी। जिस समय उनकी अंत्येष्टि हुई थी उस समय अपूर्व परीक्षा दे रहा था।

 

जैसा कि हमारी मान्यता है ,चाची जी की अंतिम विदाई के बाद सादगी से हवन और शांति पाठ करवा दिया, कोई बहुत बड़ा आयोजन नहीं किया न कोई रस्म अदायगी की।  चाची जी के जाने के बाद चाचा  जी बहुत अकेले हो गये थे। चाचा जी को सुनाई कम देता था, चाची जी हर बात उन्हें ज़ोर ज़ोर से बोलकर सुनाती थीं, ख़ासकर जब किसी से फ़ोन पर बात करती थीं, उसके बाद संवाद का उन्हें पूरा विवरण देती थीं। । आवाज़ चाचा  जी की भी तेज़ थी, पर अब वे इतनी फुर्सत से किससे बातें करते!

 

हमने लखनऊ का मकान जब बनाया था. तब बच्चे छोटे थे पर अब  वे बड़े हो गये थे, दोनों ही लखनऊ नहीं जाना चाहते थे। लखनऊ के मकान के गृह प्रवेश के समय मेरी तबीयत ख़राब हुई फिर एक किराये दार ने बहुत परेशान किया था, इसलिये हमें भी उसकी दरों दीवार से कोई विशेष लगाव नहीं हुआ था, जबकि वह मकान  बहुत बड़ा और अच्छा था और ख़ुद की निगरानी में बना था। ।हमने निश्चय किया कि उसे बेचकर दिल्ली में ही फ्लैट ले लेंगे। अतः वह मकान जिसको बहुत मेहनत से बनाया था, बेच दिया। दिल्ली में वसुंधरा एन्क्वलेव में 3 बैडरूम का फ्लैट ख़रीद लिया, जिसमें हम आज तक रह रहे हैं।

 

अपूर्व ने 2002 में बी.कॉम कर लिया था अब प्रबंधन (मैनेजमैंट) की प्रवेश परीक्षाओं के लिये एक साल उसकी तैयारी करनी थी। तनु अपने काम पर जा ही रही थी।  मेरी सोच में अब परिवर्तन आने लगा था। पहले मुझे लगता था कि मैं एक असफल इंसान हूँ, अब मैं सोचने लगी थी कि मैंने अपने सब कर्तव्य सही तरीके से निभायें हैं, यदि कोई संतुष्ट नहीं है, तो ये मेरी नहीं उसकी समस्या है। मैंने अपने बच्चों की अच्छी परवरिश की है, पर मैं उनकी किस्मत नहीं लिख सकती। 2002 में बीबी आई थी। रात में हम बहनों में बातचीत हुई और सुबह हमने ऐलान कर दिया कि मैं बीबी के साथ अमरीका जा रही हूँ। पासपोर्ट था ही, वीसा भी जल्दी मिल गया। रघुवीर और उसका परिवार आउट हाउस में थे, जो पूरा घर संभाले हुए थे। इन तीनों को कोई दिक़्कत नहीं होने वाली थी।  दिसम्बर में इनकी सेवानिवृत्ति होनी थी, बस साठवें जन्मदिन और सेवानिवृत्ति के समय दूर रहना अखर रहा था,परंतु यह भी लग रहा था कि अब नहीं गयी तो शायद फिर कभी न जा पाऊँ।

 

ये मेरी पहली विदेश यात्रा ही नहीं, पहली हवाई यात्रा भी थी।ये भी संयोग की बात है हम दोनों की पहली हवाई यात्रा सीधे अमरीका यात्रा ही थी, भले समय का अंतराल बहुत लम्बा …… कुछ दशकों का था। इनकी रेलवे की सर्विस की वजह से लम्बे लम्बे सफ़र ट्रेन से ही करे थे। रेलवे  साल में व्यक्तिगत यात्रा के लिये भी 6 पास रेलवे देती थी। उस समय तक भी हवाई सफर जनसाधारण के लिये मंहगा ही होता था। हमें उड़ान पैरिस में बदलनी थी, पर बीबी साथ में थी इसलिये कोई परेशानी या घबराहट नहीं थी।  इतनी लम्बी हवाई यात्रा में मैं बहुत थक गई थी पर बीबी उतना थकी हुई नहीं लग रही थीं। डलस एयरपोर्ट पर भाई साहब मिल गये थे। घर पहुँच कर जब घर के सामने खड़े थे तब वहाँ भयंकर सा सन्नाटा महसूस हुआ।  भारत में रहते हुए ऐसा सन्नाटा कभी पहले नहीं महसूस हुआ था। ये सन्नाटा और ठंड जान लेवा सी लगी थी।

 

मैं जितनी थकान महसूस कर रही थी उतनी ही ताज़गी बीबी के चेहरे पर थी। मुझे विदेश में आकर ऐसा लग रहा था कि मैं अपने माहौल को डेढ दो महीने के लिये बहुत पीछे छोड़ आयी हूँ और वे अपने माहौल, अपने घर लौटीं थी। आते ही उन्होंने झटपट खिचड़ी बना ली। कुछ देर बाद उन्होंने डीप फ्रीज़र में देखा, जाने से पहले( 3-4 सप्ताह) वे बैंगन और कुछ अन्य सब्जियाँ बना गईं थी जो भाईसाहब खा नहीं पाये थे, बची हुईं थी। अब हुआ ये कि ताजी खिचड़ी फ्रीज़र में और पुरानी दाल सब्जी बाहर! धीरे धीरे पता चला कि ये वहाँ लगभग हर घर की कहानी है।मैं इतनी थकान महसूस कर रही थी कि उस रात दिल्ली घर पर फोन लगाया तो बात ही नहीं कर पाई।  मेरा कमरा प्रथम तल पर था बीबी भाई साहब का नीचे। मैं कब सोई कब जागी मुझे पता ही नहीं चला। बीबी ने रात में ही मेरा सूटकेस खाली करके अलमारी सजा दी थी, कुछ शर्ट ट्राउज़र जो उन्हें ढीले थे वे भी लाकर रख दिये ।दोनों ने मुझे भरपूर स्नेह और आराम दिया।

 

अभी वहाँ पहुँचे हुए दो एक दिन ही हुए थे, कि वहाँ कि भाई साहब के एक मित्र की बेटी की शादी में उन्हें शॉरलेट जाना था, जाहिर है कि मुझे उनके साथ जाना ही था।  अभी मैं उनके घर में ही अपनी दिनचर्या भी नहीं बना पायी थी,  नये माहौल में समन्वय नहीं बना था  और सफ़र पर निकलना पड़ा था। क़रीब दस घंटे का सड़क मार्ग का रास्ता था। वहाँ शादी में दूसरे शहरों से आये मेहमानों  के ठहरने की व्यवस्था  करना मेज़बान की जिम्मेदारी नहीं होती है।  जिस होटल से शादी होती है  आने वाले मेहमान अधिकतर उसी होटल में  अपने ख़र्च पर ठहरते हैं और होटल वाले शादी में आये लोगों को किराये में कुछ छूट दे देते हैं। बीबी भाई साहब  शॉरलेट में पहले काफ़ी साल रह चुके थे इसलिये उनके कई घनिष्ठ मित्र वहाँ थे,  उन्होंने एक और मित्र के घर ठहरने का निर्णय  लिया,  यानी शादी एक मित्र के घर और मेहमानदारी  दूसरे मित्र के घर।  जिन मित्र के घर हम ठहरे थे उनके घर में पहले से ही इसी शादी के लिये आये कुछ और मेहमान भी ठहरे हुए थे। ये सब लोग मित्र  ही थे पर मेरे लिये तो सब अजनबी थे।

 

जिस दिन हम शाम को पहुँचने वाले थे उसी शाम वहाँ संगीत था, कुछ देर हो रही थी तो रास्ते में जहाँ जनसुविधायें थीं हम वहीं तैयार हो गये क्योंकि हमें सीधे शादी वाले घर में जाना था। मुझे भारत की हाई वे की जनसुविधायें याद आ गईं जिन्हें इस्तेमाल न करना पड़े इसलिये सड़क यात्रा से कुछ घंटे पहले हम लोग खासकर महिलायें पानी, चाय या कोई भी पेय पीना छोड़ देते हैं।

 

संगीत के वक्त हम पहुँचे तो एक के बाद एक नए लोगों से परिचय हो रहा था वही सवाल कब आईं कब तक हैं कहाँ कहाँ जायेंगी……….. अभी मुझे ये ही नहीं पता था कि मैं कहाँ हूँ जैट लैग फिर इतना लम्बा सफ़र……… मैं बहुत थक गई थी शरीर और मन दोनों एकांत चाह रहे थे। मैंने तबीयत ख़राब होने का बहाना किया और उनके मेहमान कक्ष में जाकर आराम किया। उस  वक्त तक हमारे पास स्मार्ट फोन तो क्या मोबाइल भी नहीं था और ये हम आ गये स्मार्ट रूम में। हमें तो लगाये भूतिया सा मकान है। कमरे में प्रवेश करते ही बत्ती जल गई, टायलट  तक जाने के लिये छोटी सी गैलरी थी जैसे ही उधर का रुख़ किया एक एक बत्ती जलती गई, निवृत्त होकर सीट से उठते ही फ्लश चल गया, मैं सच में काँप गई थी। हाथ धोने के लिये नल में हाथ नीचे करते ही पानी आ जाता है ये सुना था भारत में भी, पर देखा नहीं था। वहाँ भी स्मार्ट होम नयी  और महँगी चीज़ थी केवल इस परिवार का घर ही स्मार्ट था वे दूसरों से ज़्यादा अमीर होंगे । कमरे में वापिस जाते समय एक एक बत्ती बुझती गई। कुछ देर आराम करने के बाद कानों में एक सुरीली आवाज़ आई  मेंहंदी है रचने वाली….ये गाना पसंद भी था तो हम उठकर संगीत की महफ़िल में जा बैठे जहाँ कुछ भारतीय व्यावसायिक कलाकारों और परिवार के लोगों ने अच्छा प्रस्तुतीकरण दिया।

 

भाई साहब के जिन मित्र के यहाँ हम ठहरे थे वे बहुत सहज थे। भारत में यदि किसी के घर 8-12 मेहमान एक ही समय आ जायें तो मेज़बान उनके खाने पीने के प्रबंध में ही व्यस्त हो जाता है। गृहिणी सुबह से रात तक खाने में क्या बनेगा सोचती रहेगी जबकि यहाँ घरेलू सहायक हैं। वहाँ पर चाय के लिये कैटल टी बैग और दूध रखा था फ्रिज में जूस अंडे जैम  मक्खन रखे थे। जो जब चाहें जो नाश्ता कर ले फिर बर्तन डिश वाशर में लगा दे। डिश वाशर भर जाये तो चला दे। खाने में दाल सब्जी या तो पहले की बनी होगी या बाहर से आ जायेगी, बाज़ार की रोटियों के पैकेट रखें हैं माइक्रोवेव मे गर्म करो और खा  लो। कोई मेहमानदारी या मेहमाननवाजी नहीं ‘सैल्फ़ हैल्प’।

 

अगले दिन शादी थी सभी लोग भारतीय शादियों की तरह सजे धजे थे पर यहाँ फेरो के लिये अग्नि-कुण्ड की जगह मोमबत्ती जलायी गईं थी क्योंकि आग जले से फायर का सायरन बज जाता है। भोजन के समय हर मेहमान के बैठने की सीट उसके नाम की पट्टिका के साथ सुरक्षित थी। निमंत्रण पत्र यहाँ जवाबी भेजे जाते हैं, जवाब में  कितने जने आ हैं,उनके नाम के साथ बताना पड़ता है। मेज़बान को आने वाले लोगों संख्या के बारे अनुमान नहीं लगाना पडता उन्हें मेहमानों की संख्या नाम पहले से मालूम होते  हैं। बाद में किसी नाम को घटाया जाये तो मेहमान से अपेक्षा की जाती है कि वह इसकी सूचना मेज़बान को दे, कितना अच्छा रिवाज है! भारत में तो सब अनुमान पर चलता है। भारत में  सब बैठें ये ज़रूरी नहीं काफ़ी  लोग खडे ही रहते हैं। खाने की कतारें लम्बी लम्बी होती ही हैं। वहाँ बुफ़े होने पर  भी खाना लेने के लिये एक एक मेज़ से लोगों को आमंत्रित किया गया था, यही रिवाज है।

 

अगले दिन शादी थी सभी लोग भारतीय शादियों की तरह सजे धजे थे पर यहाँ फेरो के लिये अग्नि-कुण्ड की जगह मोमबत्ती जलायी गईं थी क्योंकि आग जले से फायर का सायरन बज जाता है। भोजन के समय हर मेहमान के बैठने की सीट उसके नाम की पट्टिका के साथ सुरक्षित थी। निमंत्रण पत्र यहाँ जवाबी भेजे जाते हैं, जवाब में  कितने जने आ हैं,उनके नाम के साथ बताना पड़ता है। मेज़बान को आने वाले लोगों संख्या के बारे अनुमान नहीं लगाना पडता उन्हें मेहमानों की संख्या नाम पहले से मालूम होते  हैं। बाद में किसी नाम को घटाया जाये तो मेहमान से अपेक्षा की जाती है कि वह इसकी सूचना मेज़बान को दे, कितना अच्छा रिवाज है! भारत में तो सब अनुमान पर चलता है। भारत में  सब बैठें ये ज़रूरी नहीं काफ़ी  लोग खडे ही रहते हैं। खाने की कतारें लम्बी लम्बी होती ही हैं। वहाँ बुफ़े होने पर  भी खाना लेने के लिये एक एक मेज़ से लोगों को आमंत्रित किया गया था, यही रिवाज है।शादी के स्वागत समारोह में सगे रिश्तेदार दोनों तरफ़ के मामा मामी, चाचा चाची तथा अन्य नाम बुलाने से हाथ में हाथ डाले आये और परिचय के साथ अपना स्थान ग्रहण किया। सब का तालियों के साथ स्वागत हुआ। कुछ मित्रों और रिश्तेदारों ने वर वधु के साथ बीते अपने दिनों के संस्मरण सुनाये। ये भी नई बात थी। संस्कृतियों का समागम इसी तरह होता है। उपहार देने का भी एक तरीक़ा वहाँ नया था। वर वधु कुछ सामान किसी बड़े स्टोर की चेन पर पसंद कर लेते हैं वहाँ रजिस्टर करके। कार्ड में उस स्टोर का नाम रजिस्ट्रेशन नम्बर होता है। उपहार देने वाले लोग जितने चाहें पैसे वहाँ जमा करा सकते हैं। वह स्टोर पूरा सामान वर वधु तक पहुँचा देता है। पैसे बचें तो पैस वापिस हो जाते हैं या कुछ और सामान और ख़रीद सकते हैं। पैसे कम हों तो वर वधु भुगतान कर देते हैं।

 

शादी से वापसी में हमने ड्यूक यूनिवर्सिटी का प्रांगण देखा और एक दिन भाई साहब के एक मित्र के यहाँ रुके। रास्ता तो बहुत अच्छा था। सड़क के दोनों तरफ़ पूरे रास्ते में घने जंगल थे। वैसे घने जंगल तो बीबी के घर में मेरे कमरे से भी दिखते है, पूरी दीवार में काँच ही लगा था।

 

भाई साहब के एक भाई रज्जू भैया जिन्होंने मेरी कॉलिज  की दोस्त ललिता से शादी की थी और उनकी एक बहन तारा भी आसपास के शहरों में वर्जीनिया और मैरीलैंड राज्यों में 50 मील के दायरे में रहते थे !  बीबी का छोटा बेटा और तारा जी और ललिता के कुछ बच्चे आसपास थे, कुछ दूर दराज़ शहरों से आये थे। हमारे यहाँ परिवार जैसे दीवाली पर इकट्ठे होते हैं वहाँ थैंक्स-गिविंग पर इकट्ठे होते है। उस  वर्ष ये त्योहार जो अमैरिका का त्योहार है, किसी धर्म का नहीं, तारा जी के घर मनाया जाना था। इस त्योहार पर टर्की यानी तीतर को लगभग साबुत सा ही बनाया जाता है। मैं तो देख भी नहीं सकती थी इसलिये अलग कमरे में बैठी रही। इसके अलावा अलावा मैश्ड पोटेटो विद सॉर क्रीम (उबाल कर मसले हुए आलू में खट्टी मलाई) कार्न उबले हुए और पंपकिन पाई( कद्दू का हलवा)का भोजन पारम्परिक होता है। मैं ठेठ देसी खाना खाने वाली ! घर आकर बीबी ने टोस्ट सेंक कर खिलाये जबकि कुछ तो वहाँ खा ही लिया था । भाई साहब के भाई बहनों की तीन पीढ़ियाँ थी पर मैं तो पहली पीढी को ही जानती थी, बाकी सब से पहली बार ही मिली थी। ये पारिवारिक मिलन अमरीकी शैली में देखना एक अलग अनुभव था।

 

बीबी के पास रहते हुए पर्यटन के लिये भी कुछ जगह गये परन्तु अब कई साल बाद यादें धुंधली होने लगी हैं कुछ जगहों के शायद नाम भी याद न रहें हों। बचपन और युवावस्था की यादें जितनी पक्की होती हैं, बुढ़ापे की तरफ़ बढ़ते बढ़ते हाल की घटनायें याद नहीं रहती। पंद्रह सोलह साल पुरानी यादों को ताज़ा करने के लिये दिमाग़ पर ज़्यादा ज़ोर डालना पड़ रहा है।

 

सबसे पहले तो हम वाशिंगटन डी. सी. स्थित स्मिथ सोनिअन गये जहाँ एक ही सड़क के दोनों तरफ़ बड़े बड़े कई म्यूज़ियम हैं जिन्हें अच्छी तरह से देखने के लिये  कई दिन लग सकते हैं ।हम वहाँ दो बार गये, घर से एक निश्चित स्थान तक कार से और वहाँ से मैट्रो से,दूसरी बार बस से। मैट्रो भी खाली खाली थी और बस तो ऐसा लग रहा था हमारे ही लिये चलाई गई थी। यू.एस. में भीड़ देखी तो इन म्यूजियम्स में देखी। भारतीय भी दिखे और भारत में होने का अहसास हुआ। म्यूज़ियम में इतनी चीज़े देखीं किसी को याद रख पाना संभव नहीं हुआ। 9-11 उस समय हाल ही घटना थी, जिसके अवशेष प्रदर्शन के लिये एक म्यूज़ियम में रखे थे, यहाँ सबसे अधिक भीड़ थी। एक म्यूज़ियम में भारत की पुरातन मूर्तियाँ थी पता नहीं वहाँ कैसे पहुँची। ऐतिहासिक लुटेरों ने वहाँ पहुंचाईं या समकालीन तस्करों ने, पता नहीं। भारत की सरकारें चाहें जैसी रही हों खुले आम भारत की पुरातत्व धरोहरों को किसी और देश को नहीं भेज सकती। ये मेरा निजी विचार है, जो ग़लत भी हो सकता है। ये इकलौता स्थान था जहाँ जूते उतारकर जाना था, इसलिये प्रवेश और निकास द्वार पास पास ही थे।

 

दूसरा आकर्षण वर्जीनियाँ स्थित की गुफ़ाये लूरे कैवर्नस हैं। इनकी खोज 1887 में हुई थी जिसका एक बड़ा हिस्सा अब पर्यटकों के लिये बड़ा आकर्षण है। ज़मीन के बहुत नीचे उतर के वहाँ पक्का रास्ता बना हुआ है जिसके  दोनों ओर से बर्फ पिघलकर विभिन्न सुंदर आकृतियों में दिखती है। पानी में विभिन्न रसायन घुले होने के कारण ये सब आकृतियाँ रंग-बिरंगी दिखती है।बादलों में जिस तरह हम अनेक आकृतियाँ ढूँढते हैं, उसी तरह ये पिघलती हुई बर्फ आपकी कल्पना को इतनी उड़ान देती है कि आपको बहुत सी आकृतियाँ दिख जाती हैं। यह आकृतियाँ लगातार आकार बदलती रहती हैं। लूरे कैवर्न के बाहर भी कुछ म्यूज़ियम हैं। एक में पुरानी कारें तथा अन्य यातायात के साधन प्रदर्शित हैं।

 

तीसरा स्थान जो बीबी भाई साहब के साथ देखा वह था विलियम्सबर्ग यह एक पुराना शहर है जब यूरोप के लोग यहाँ आकर बसे थे। उस समय की हर चीज़ को अपने मूल रूप में सुरक्षित रखा गया है। उनके छोटे छोटे मकान कुएँ सड़कें सब सुरक्षित हैं। यहाँ बहुत सी पुरानी इमारतों  को बहाल किया गया है पर उनके मूल रूप को बरकरार रखा गया है। यह एक ऐतिहासिक शहर है। अन्य पर्यटन स्थलों की तरह यहाँ भी कई म्यूज़ियम हैं।

 

अमैरिका में रहते हुए परिवार की याद आती थी तो वहीं पर पहली बार भाई साहब के डैस्क टॉप को हाथ लगाया वे निश्चित समय पर जी मेल चैट लगा देते थे। टाइप भी गलत सलत रोमन में होता था। एक बार भाई साहब के घर की छत टपकने लगी। वहाँ लकड़ी के मकान होते हैं वे ख़ुद नहीं चढ़ सकते थे, किसी को बुलाया लकड़ी का जोड़ फटा फट ठीक हो गया। मुझे याद है कि मैंने तनु को संदेश दिया CHHAT TAPAK RAHI HAI उसने पढ़ा ‘’ चाट टपक रही है ’’! रोमन में हिंदी लिखने से अर्थ का अनर्थ तो होही जाता है। मेरी तनु से वहाँ के सुबह दस बजे रोज़ चैट होती थी। की बोर्ड पर हाथ कुछ कुछ चलने लगा था।

 

मेरे वहाँ रहते हुए ही बीबी भाई साहब की शादी की 50  वीं सालगिरह पड़ी थी या ये कहूँ इस समय अमरीका जाने का यह भी एक कारण था। शादी की सालगिरह पर उनके तीनों बच्चों ने आयोजन किया था। छोटा बेटा आस पास ही था नीरू और अशोक को आना था। कैनेडा से पूजा भी सपरिवार आई थी। मेरे लिये एक साथ सबसे मिलने का बढ़िया मौका था। आयोजन तो होटल में ही था , वहाँ नजदीकी रिश्तेदारों के रात भर ठहरने की व्यवस्था थी। जैसा कि शॉरलैट की शादी के संदर्भ में मैं लिख चुकी यहाँ भी बैठने की व्यवस्था पूर्व निर्धारित थी। बच्चे अपनी माँओं के साथ बैठें या बच्चों को अलग मेज़ पर रखा जाये, सब हम उम्र कज़िन साथ साथ हो, जैसी चर्चायें फोन पर बहुत देर तक होती थीं। मुझे बीबी अपने साथ रखना चाहती थी पर नीरू ने कहा मौसी उसके पास बैठेंगी तो मैं नीरू और पूजा के परिवार के साथ बैठी। हमारे यहाँ तो लोग आते जाते हैं जगह अपने आप बन जाती है बल्कि सीरियल और फिल्मों की पार्टियाँ तो खड़े ख़डे निबट जाती हैं।

 

यहाँ भी कुछ लोगों ने बीबी भाई साहब से जुड़े संस्मरण सुनायें मैंने एक  कविता लिखी थी इस अवसर के लिये जिसका इंगलिश अनुवाद भाई साहब ने किया था और उसे ललिता की बेटी दीपिका ने पढ़ा था।  रात को मैं और पूजा का परिवार होटल के एक स्यूट में रहे। सुबह का नाश्ता भाई साहब और बीबी की तरफ़ से था। नाश्ते के बाद सब लोग गये।

 

नीरू के साथ मुझे रौचेस्टर जाना था, वहाँ से नियाग्रा फॉल नजदीक है ।नीरू के साथ उसके पति विल और बेटी टैरन थे जो उस वक्त 12-13 साल की थी। नीरू ने रॉचैस्टर शहर बहुत अच्छी तरह घुमाया म्यूज़ियम देख देख कर मैं थक गई थी तो वह देखने से मैंने मना कर दिया था। वहाँ मैंने बहुत बड़ी झील पूरी तरह जमी हुई देखी। एक बहुत बड़ी और ख़ूबसूरत सिमेट्री देखी, इसका विस्तार इतना था कि चारों और जहाँ तक निगाह जाये कब्र ही कब्र दिखती थीं। मुझ हैरान थी कि कब्रिस्तान भी पर्यटन स्थल हो सकता है।

 

नीरू मुझे नियाग्रा फॉल दिखाने ले गई। रास्ता भी बहुत सुंदर था। नियाग्रा  फॉल से गिरते हुए पानी की मात्रा और ऊँचाई से गिरने से उत्पन्न नाद भी अनोखा था। सर्दी बहुत थी चारों तरफ़ बर्फ जमी हुई थी। सफेद चादर से प्रकृति का ज़र्रा ज़र्रा ढका था। इतनी ठंड में लंच में हमने एक बहुत बड़ी आइस  क्रीम खाई। पूरा दिन बिता के हम रौचेस्टर वापिस आ गये। नीरू के घर में भारतीय खाना तो बनता नहीं था जिसके जब जो मन में आता फ्रिज से निकालकर माइक्रोवेव में गर्म करके खा लेता था।  वे अपना घर भी इतना गर्म रखते थे कि मामूली से सूती कपड़ों में रहा जा सकता था। नीरू ने मेरे लिये फ्रोज़न मटर आलू पालक तथा और चीज़ें लाकर रख दी थीं मैं ख़ुद के लिये बना लेती थी।

 

जब मैं रौचेस्टर में थी तब क्रिसमस भी पड़ा था और वह हमें नीरू की  ससुराल में मनाना था। विल के पिता तो बीमार थे, माँ थी और विल की बहन आई हुई थी। नीरू ने उन्हें पहले ही बता दिया था कि उसकी बीनू मौसी शाकाहारी हैं और भारतीय खाने के अलावा और कुछ नहीं खा पाती हैं, इसलिये अपना खाना वे ख़ुद बनाकर ले आयेंगी। वहाँ चकला बेलन तवा परात तो था नहीं, मैंने अपने लिये पालक आलू और मटर बना लिये । वहाँ जब खाना खाने बैठे तो मेरे दोनों तरफ़ और सामने सब की प्लेटों में बड़े बड़े बीफ़ के टुकड़े रखे थे। उनका घर था वे जो चाहें बनायें पर मेरी हालत ऐसी हो गई कि अपना देसी खाना ,अपने हाथ का बना हुआ भी अंदर नहीं जा रहा था। इसका कोई धार्मिक कारण नहीं था बस बीफ़ की गंध ही ऐसी होती है।

 

रौचेस्टर से लौटते समय एयरपोर्ट मेरे नाम ने एक बार फिर मुझे बड़ी परेशानी में डाल दिया था । बहुत बाद में एक व्यंग्यात्मक लेख लिखा था तुम्हारा नाम क्या है जो बहुत बड़ा हो गया था प्रवक्ता. कॉम  में तीन किश्तों में आया था। बाद में इसी लेख का संपादित रूप एक पत्रिका ने प्रकाशित किया था नाम में क्या रखा है शीर्षक से । ये वाकया इस लेख का अंश था तो वहीं से वह अंश उद्धरित कर रही हूँ-

 

नाम में क्या रखा है(अंश)

(संस्मरण 13)

 

 मैने देवनागरी लिपी मे अपना नाम हमेशा ‘बीनू’ लिखा और रोमन लिपि मे ‘Binu’ मुझे यही पसन्द था जबकि आमतौर पर ‘ि’ के लियें ‘i ‘और ी के लियें ‘ee’ ही ध्वनि के अनुसार प्रयोग किया जाता है, इसी तरह ‘ ू ‘के लिये भी ‘oo ‘प्रयोग होता है। ‘B’ और ‘V’ मे उच्चारण की समानता है अतः जिसे जो सही लगता लिख दिया जाता था जैसे Beenu, Veenu, Beenoo Veenoo, Beena, Veena वगैरह। मुझे नाम के स्पैलिंग मे बदलाव पसन्द नहीं था इसलियें जगह जगह स्पैलिंग ठीक कराने की कवायत करनी पड़ती थी। एक ही बार यह कवायत नहीं की तो आप ताज्जुब करेंगे अमरीका मे 50 डालर का जुर्माना भरना पड़ा। अपने हिन्दी से लगाव के कारण पासपोर्ट बनवाने के लियें जब फार्म भरा तो हिन्दी मे ही भर दिया और अपना सही नाम ‘बीनू’ ही लिखा पर पसपोर्ट तो इंगलिश मे ही बनना था सो उसमे नाम लिखा था ‘Beenu’, बदलवाने के लियें बहुत लम्बी कारवाही करनी पड़ती इसलिये सोचा चलने देते हैं। 2002 मे मै अमरीका गई थी। टिकिट ‘Binu’ नाम से ख़रीदे गये, अमरीका पंहुच भी गये, वहाँ बिना किसी कठिनाई के कुछ यात्रायें करली परन्तु रौचेस्टर से वाशिंगटन आते समय मुझे रोक लिया गया। यह यात्रा मुझे अकेले ही करनी थी इसलियें बड़ी घबराहट हुई। मैने काफ़ी बहस करी कि जब इतनी यात्रायें करने मे किसी ने आपत्ति नहीं की तो आपको क्या परेशानी है । वह काँउटर पर बैठी लड़की कुछ सुनने को ही तैयार नहीं थी, उसे लगा कि ‘Binu’ और ‘Beenu’ दो अलग व्यक्ति हैं। मुझसे कोई दूसरा पहचान का सबूत माँगा गया जिसमे मेरा नाम Binu हो। अब मै अपना राशन कार्ड और ड्राइविंग लाइसैंस लेकर तो अमरीका गई नहीं थी। अंत मे उस लड़की ने कहा कि मै यात्रा कर सकती हूँ पर 50 डालर जुर्माना भरना पड़ेगा। मरता क्या न करता जुर्माना दिया घबराट मे उसकी रसीद भी नहीं मागी, पता नहीं वह जुर्माना था या कुछ और..

 

रौचैस्टर वापिस आने के कुछ दिन बाद जनवरी 2003 के पहले सप्ताह में मैं भारत वापिस आ गई, अकेले ही आना था पैरिस से दूसरी फ्लाइट लेनी थी पर अब कोई घबराहट नहीं थी, सकुशल दिल्ली

पहुँच गई। आने के बाद मुझे  हर आवाज़ शोर लग रही थी…… कार बहुत आवाज़ कर रही है………. सड़क में बहुत गड्ढे हैं.. लगा…… पर दो महीने बाद घर लौटकर बहुत अच्छा भी लगा।

 

अब तक ये सेवानिवृत्त हो चुके थे इनकी विदाई के कार्यक्रमों में मैंने तो नहीं पर बच्चों ने शिरकत की। ये हमेशा ही जल्दी उठते थे अब बच्चों का वक़्त बेवक्त सोना इन्हें अखरने लगा था। धीरे धीरे दिन भर घर में रहने की दिनचर्या में ये ख़ुद को ढाल रहे थे और पापा की दिन भर मौजूदगी के बच्चे अभ्यस्त हो रहे थे। हमें अप्रैल तक सरकारी मकान छोड़ना था । अब पूरा ध्यान वसुंधरा ऐन्क्लेव के फ्लैट में काम कराने पर था।

 

दिल्ली वापिस आने पर पता चला कि चाचा जी की तबीयत ठीक नहीं है। उन्हें  प्रौस्टेड का कैंसर था, सर्जरी हुई पर 93 की उम्र थी, अप्रैल के महीने में उन्होंने अंतिम साँस ली और चले गये। चाचा  जी क़रीब एक सप्ताह अस्पताल में रहे और उनका शव हमारे घर लाया गया क्योंकि दिनेश भैया के बेटे की परीक्षा चल रही थी और उसे देख रेख की ज़रूरत थी, ऐसे में पढ़ाई करना मुश्किल तो होता ही है। ज़ाहिर है कि सभी बहने आईं और चौथे दिन शांति पाठ तक रुकी रही। दिनेश भैया जयश्री आते जाते रहे। संयोग से उस समय मेरे भैया भाभी भी मेरे पास थे।  नन्दों की तरफ़ से एक प्रस्ताव आया कि ख़ाना दो दिन बाज़ार से आयेगा। एस. पी. मार्ग कॉलौनी के पास ऐसा कोई ढाबा या हलवाई नहीं था जहाँ से तीनों समय का खाना मंगवाया जा सके। हमारे पास उस समय रघुवीर जैसा घरेलू सहायक था जो बिना किसी की मदद के सब संभाल सकता था इसलिये  वह प्रस्ताव मानना संभव नहीं हुआ, खाना घर पर ही बना। रघुवीर जो चाहें वह बनता रहा यहाँ तक कि शांति पाठ के दिन कुछ अधिक लोग थे तब भी उस ने संभाला लिया । ऐसे समय में दिखावे और आडंबर से  मैं सदा दूर रही हूँ इसलिये भैया भाभी को भी कोई रस्म प्रतीकात्मक रूप में भी नहीं करने दी। सारी ज़िम्मेदारी दोनों भाइयों की थी और उन्होंने अपने हिसाब से सही तरीके से निभाई।

 

अपूर्व का दाख़िला में ऐम.बी.ए. में हो गया था उसे हमने बाइक दिलवा दी थी, दूसरी कार ख़रीदना और इतनी दूर आना जाना बजट से बाहर हो रहा था, अपूर्व को बाइक का शौक भी था। वसुंधरा ऐन्क्लेव का फ्लैट ऐस.पी. मार्ग के घर से छोटा था इसलिये सामान कम करना शुरू कर दिया था। पुराना सामान चाहें जितना अच्छा हो कौड़ियों के मोल ही जाता है। वसुंधरा ऐन्क्लेव में हमारी सोसायटी नयी बनी थी, सब घरों में काम चल रहा  था तब हमें एक बढ़ई मिला शेखर शर्मा जिसने सब काम बहुत अच्छे किये उसी के ज़रिये अन्य कारीगर भी मिले। शेखर आज भी हमारे घर के छोटे बड़े सब काम करवाते हैं।2003 में अप्रैल के अंतिम दिनों में हम पूरे सामान के साथ यहाँ गये, कोई गृह प्रवेश की पूजा नहीं की बस एक दिया जलाया था। बाद में धीरे एक एक करके नये मकान में सब को खाने पर बुलाया था।

 

अपूर्व का कालेज यहाँ से बहुत दूर था । 40 कि.मी. बाइक पर आता जाता था। कभी कभी कार ले जाता था। 16 साल बाद हमने अपनी मारुति 800 बेच दी थी और हमारे पास अब सिलवर ग्रे मारुति ज़ैन थी। तनु इस समय नौकरी नहीं कर रही थी केवल आकाशवाणी पर समाचार पढ़ रही थी।तनु ने यहाँ आकर नौएडा में नौकरी ढूँढने की कोशिश की पर हर जगह सुविधाओं की कमी मिली कहीं लिफ्ट नहीं, कहीं जनसुवधायें सही नहीं तो कहीं कुछ और समस्या। हमारी ही सोसायटी में एक सज्जन एकाउंट्स पढ़ाते थे उन्होंने 12वीं  क्लास के 4-5 बच्चे अर्थशास्त्र पढ़ने तनु के पास भेज दिये। साल दर साल और बच्चे आने लगे फिर आकाशवाणी का काम भी छोड़ दिया।

 

अपूर्व पहले साल में सर्दियों के मौसम में दो महीने कुछ लड़कों के साथ कमरा लेकर कॉलिज के पास ही रहा, पर सर्दियाँ ख़त्म होते ही वापिस आ गया। अभी तक हम अच्छे मकानों में ही रहे थे । ये फ्लैट उनसे छोटा था पर जो अपना घर का भाव मुझे यहाँ मिला सरकारी मकानों में कभी नहीं मिला।मुझे कालोनी छोड़ने का दुख नहीं लगा, शायद हमेशा से पता था कि वहाँ कुछ भी अपना नहीं है।

 

यहाँ अड़ौस पड़ौस सब ठीक ही रहा पर बहुत जुड़ाव किसी परिवार से या व्यक्ति से नहीं हुआ परंतु सद्भाव सबसे रहा। सरकारी कॉलौनी और यहाँ  सबसे बड़ा अंतर यही लगा कि अचानक हम दोनों बहुतों के अंकल आँटी बन गये, कुछ बुज़ुर्गों को छोड़कर अड़ौसी पड़ौसी, कामवाली, सिक्योरिटी गार्ड  सब अंकल आँटी कहने लगे। वहाँ तो सर या मैम अथवा साहब मेम साहब कहने का रिवाज था। बच्चे चाहें जितने बड़े हों नौकर वहाँ बेबी बाबा कहते थे, यहाँ दीदी भैया हो गये। यहाँ जवान मकान मालिक या किरायेदार भी भैया भाभी या दीदी भैया ही से संबोधित होते हैं। चलो साहबियत छूटी और संबोधन के  कच्चे रिश्ते बने ! वसुंधरा ऐन्क्लेव के अभ्यंत अपार्टमैंट की ज़िंदगी, ज़िदंगी का एक अलग अध्याय थी। यहाँ किसी से बहुत गहरी दोस्ती होने की संभावना नहीं थी पर सब भले से लोग यहाँ मिले। कहा जा सकता है कि ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर वाला माहौल हैं। मैंने भी आगे बढ़ कर किसी से दोस्ती नहीं की, ये तो वैसे ही अपने में सिमटे रहना पसंद करते हैं।

 

2004 में दूसरा साल शुरू होने तक दिल्ली मैट्रो की पहली लाइन शुरू हो गई थी तब अपूर्व वैलकम स्टेशन तक बाइक से और फिर वहाँ से मैट्रो पकड़ कर रोहिनी जाता था। यह समय था जब वह कुछ ज़िम्मेदार और मेहनती लगने लगा था। दोस्त यहाँ भी बहुत बने, एस.पी. मार्ग रेलवे क्लब जब भी समय मिलता था चला जाता था।

 

अपूर्व को कभी कभी गुस्सा काफी आता था। बचपन में भी किसी बात पर रूठ कर किसी आउट हाउस में जाकर बैठ गया था। सब दोस्तों के घर फ़ोन किये, नहीं मिला तो चिंता भी हुई। बाद में ख़ुद ही आ गया था।  आधी अधूरी बात सुनकर भड़क जाना भी इसकी आदत है। कालेज में या ऑफिस में किसी से तना तनी हो जाये तो घर वालों को क्या पता! ऐसे मामूली तौर से कही गई बातों को मन पर लगा लेता है। ये बचकानी आदत अभी भी है। एक बार बाइक लेकर निकल पड़ा था और कुछ घंटे बाद आया। अतः इसे कुछ भी कहने से पहले सोचना पड़ता है फिर  भी कभी कभी………

तनु को गुस्सा तो नहीं आता पर कभी कभी बिना बात की बात पर रोने बैठ जाती है, फिर रो कर अपने आप शांत भी हो जाती है। परंतु अब ये सब बहुत कम हो गया है।

 

अपूर्व ने 2005 में ऐम. बी. ए कर लिया था। कुछ समय लगा पर कालेज से ही प्लेसमैंट हुआ और एक इवैंट मैनेजमैंट कंपनी में उसे नौकरी मिल गई। छात्र होने और नौकरी की शुरुआती जिम्मेदारियाँ संभालने में बहुत अंतर होता है जिसके लिये अपूर्व मानसिक रूप से तैयार नहीं था। बहुत रुँआसा रहता, हमें यह चिंता थी कि नौकरी बदल भी ले तो व्यावसायिक दुनिया में क़दम रखने पर ख़ासकर शुरुआती दौर में नयी चुनौती का सामना कैसे करेगा क्योंकि कॉरपोरेट दुनिया में बहुत सहनशीलता की आवश्यकता होती है। हमारे समझाने का, तनु के समझाने का जब कुछ असर नहीं हुआ तो हम फिर एक बार डा़. अरुणा ब्रूटा की शरण में गये। काँउसैलिग के एक ही सैशन ने प्रभाव डाला। शाम को जब घर आता था तो मैं इसके चेहरे के भाव पढ़ने लगती, जिनमें पहले की तरह हताशा नहीं थी। एक दिन मैंने पूछ ही लिया कि ऑफिस में कैसा चल रहा है। इसका जवाब सहज सा था पर प्रभावशाली ‘’वहाँ तो सब वैसे ही हैं, मैंने ही ख़ुद को बदल लिया है।‘’ मनोवैज्ञानिक यही तो करता है, वह परिस्थितियाँ नहीं आपकी सोच बदलता है, आपको बाहरी वातावरण से समन्वय बनाने में सहायता करता है। इस कंपनी में ये ढाई तीन साल रहा और ख़ुश ही रहा, वहाँ बने दोस्तों में से एक से अभी तक बहुत दोस्ती है।

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बीनू भटनागर

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