गईया-मईया- पी. शंभू सिंह जी की कहानी

  गाय    की तुलना अक्सर स्त्री से की जाती है | साम्यता भी तो कितनी है दोनों में गईया हो या स्त्री ..  जिस खूँटे से बाँध दी जाती है आजन्म उसी से बँधी    रहती है | चाहे सूखा घास -फूस ही खाने को मिलता रहे पर पूरे घर की सेवा करने में जी जान से करती रहती हैं |  पर पितृसत्ता दोनों का ही दोहन करने में कोई कसर नहीं रख छोड़ती | वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय शंभू पी सिंह जी भी अपनी कहानी में गईया मैया और स्त्री के एक ऐसे दर्द की तुलना करते हैं ..अपनी प्रकृति में भिन्न होते हुए भी जिनमें साम्य  है, वो है एक माँ का दर्द |पितृसत्ता अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए जहँ गईया से बछिया चाहती है वहीं स्त्री से पुत्र | और अनचाही संतान का एक ही हश्र , चाहें वो जन्म से पहले हो या बाद में |  पढ़ते हैं .. दो माओं के दर्द को एक तन्तु में पिरोती मार्मिक कहानी ..
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गईया मैया 

“रामायणी मैं जा रहा हूं खेत पर। आने में लेट होगी, तो गईया को सानी-पानी दे देना। उसका अंतिम महीना चल रहा है, इस बार बाछी हो जाए तो एक और गाय तैयार हो जायगी। अब ये बूढ़ी भी हो गई, समझो अंतिमें बियान है।” रामायणी को हिदायत करते, कंधे पर गमछा रख, गनौरी चला गया खेत पर। रामायणी मुंह में आंचल दबाए चुपचाप सुनती रही। गाय की इतनी चिंता है। दो दिन से कह रही हूं, एक बार डॉक्टर को दिखा दो, लेकिन मेरी बात का कोई असर नहीं। रामायणी ने टेलीविजन पर देखा है, डॉक्टर बोल रही थी कि गर्भ के बाद हर महीने जांच करानी चाहिए, सास उसे लेकर अस्पताल जाती नहीं, अकेले जाने देती नहीं और रोपनी का टाइम है, तो गनौरी को फुर्सत ही नहीं है। कुछ भी हो इस बार वह लिंग जांच तो नहीं करवाएगी। सास के दबाव में आकर तो दो बच्चे की हत्या कर चुकी है। इस बार जो भी हो, उसका भी अंतिमें होगा। रामायणी का यह तीसरा महीना चल रहा है। चार बच्चे तो जन चुकी, चारों बेटी। दो जिंदा है, दो को आने ही नहीं दिया। गर्भ में ही पता लग गया। अल्ट्रासाउंड की जांच में, दोनों बार लड़की ही थी। उसे तो कुछ भी नहीं पता, कब, क्या, क्यों किया, ये सब।जिसे आना है उसे आने दे, नहीं तो हमेशा के लिए टांका लगवा दे। अब बार-बार की जांच-पड़ताल। कहीं लड़की निकल गई तो दवा देकर अंदर ही मार देना कोई अच्छी बात थोड़े ही न है। मर कर बची थी रामायणी पिछले साल। इतना खून निकला कि लगता था अब दम ही निकल जाएगा। गनीमत ये हुई बड़े भैया आ गए। स्थिति देख तुरत एम्बुलेंस मंगाया गया और शहर के अस्पताल में भर्ती करा दिए, तो जान बची। मरद तो कुछ सुनता ही नहीं। बस रात में शरीर नोचने आ जाता है। उसकी किस्मत खोटी थी कि इस घर ब्याही गई। भैया चाहते तो किसी नौकरी वाले घर भी भेज सकते थे। पिता जिंदा होते तो यहां कभी नहीं ब्याहते। कितना प्यार करते थे। रोज बाबूजी को रामायण की चौपाई पढ़ते सुनाती थी।

पांच साल की उम्र में ही वह रामायण की चौपाई पढ़ने लग गई थी। तभी उन्होंने मेरा नाम रामायणी रख दिया। जहां भी जाते मुझे साथ ले जाते। लोगों को बैठाकर चौपाई सुनवाते थे। गर्व करते थे मुझपर। भैया तो सात साल बड़े हैं। पिता जैसा सम्मान देती रही है। भैया तो चाहते भी थे कि थोड़ा अधिक दहेज दे देने से नौकरी वाला लड़का मिल जाएगा, लेकिन भाभी ने एक न सुनी। बस एक ही रट लगाती रही, तीन बहन है तेरी। एक का ब्याह नौकरी वाले के घर करोगे, तो बाकी का भी सोच लो। अकेले कमाने वाले, सात खाने वाले हैं। एक अदना क्लर्क की नौकरी से क्या कर सकते हो। जो भी करो सोच समझकर करो। बाबूजी के गुजरने से पहले भाई की नौकरी हो गई थी। खेती-पथारी से तो साल भर खाने का अनाज भी नहीं हो पाता था। भाभी भैया को हमेशा घर की बाकी जिम्मेदारियों का एहसास कराती रहती। कुछ नहीं तो अपने बच्चों के भविष्य संवारने की बात करना नहीं भूलती। यह सुन भैया चुप हो जाते।

रामायणी किसी को दोष नहीं देती। सब किस्मत की बात है। जिसकी किस्मत जहां ले जाय, जाना ही पड़ेगा। आ गई इस घर में। साथ में भैया ने एक कर्यकी बाछी भी लगा दिया। आज वही कर्यकी बाछी, गाय बन गई है। इस घर में रामायणी और कर्यकी की हालत एक जैसी है। कर्यकी ने भी पिछले छह साल में चार बच्चा दे चुकी है। दुधारू गाय है। साल में नौ महीने दूध देती है। गाभिन होने के अंतिम तीन महीना ही दम मारती है। उसकी भी किस्मत रामायणी जैसी ही है। उसके चार बच्चों में पहली ही बाछी हुई, बाद का तीनों बाछा हुआ। दो को तो एक साल बाद ही कसाई के हवाले कर दिया। तीसरे को भी हटाने की तैयारी हो रही है। पता नहीं उतने छोटे बछड़े का कसाई क्या करता है। बछड़े के जन्म को लेकर भी रामायणी को ही सास का उलाहना सुननी पड़ती है। हर बात पर एक ही रट लगाए रहती है, जैसी कुलछिन अपने है, वैसी ही अपने साथ बाछी भी लेकर आई। अपने खाली बेटिये जनती है, तो नैहर से लाई बछिया खाली बछड़ा ही बियाती है। बाछी होती, तो एक साल के अंदर गाय बन जाती। इतनी दुधारू गाय है कि पचास हजार से कम में नहीं बिकती। बाछा तो अब किसी काम का रहा नहीं। हल से खेत जोतने का समय बीत गया। पहले हल और गाड़ी में बैल की जरूरत होती थी, तो लोग बछड़ा को पालते थे। अब खेत की जोताई ट्रैक्टर से होने लगी और बैलगाड़ी की जगह मोटर गाड़ी ने ले ली, तो भला अब बैल को कोई क्यों खरीदेगा। जब तक गईया दूध देती है, तभी तक बछड़ा दिखता है। जैसे ही उसकी कर्यकी गाय गाभिन होती है,  बेचारा बछड़ा कसाई के हवाले कर दिया जाता है।

पिछ्ली बार भी तो पांच सौ रुपये में ही बछड़ा को कसाई के हवाले कर दिया था। रामायणी को तो ठीक-ठीक नहीं पता, लेकिन लोग कहते हैं कि कसाई बछड़े को मारकर उसका मांस और खाल बेच देता है। बछड़े के खाल की मांग सुनते हैं बहुत होती है। मुलायम चमड़ा का अधिक दाम मिलता है। बड़े-बड़े पैसे वाले मुलायम खाल से बने जूते पहनते हैं। आदमी कितना निर्दयी हो गया है। मासूम बछड़े के बने खाल से बने जूते को शान से पहनते हैं। जबसे ब्याह होकर रामायणी आयी है, उसके दो साल बाद से ही सास के ताने सुन रही है। कभी खुद के बेटी जनने पर, तो कभी गाय के बछड़ा बियाने पर। हालांकि उसे अपने पति से कोई शिकायत नहीं है। बहुत प्यार करता है उसे। उसी का तो नतीजा है कि अभी सात साल भी नहीं हुआ है शादी को और ये पांचवां बच्चा आने वाला है। अब लड़का नहीं हुआ तो इसमें रामायणी का क्या दोष। डॉक्टर के पास भी तो ले गई थी उसकी सास। डॉक्टर ने तो दो टूक कह दिया, डॉक्टर के पास बेटा पैदा करने की कोई दवा नहीं है। ये सब ऊपर वाले की मर्जी है। फिर भी उसकी सास यह मानने को तैयार नहीं कि इसमें रामायणी का कोई दोष नहीं है। बेटा नहीं होने को रामायणी भी अपना ही दुर्भाग्य मानती है। उसी के साथ तो उसकी सहेली सरीतिया का ब्याह हुआ था। अभी उसको दो बेटा, एक बेटी है। टांका भी लगवाकर निश्चिंत हो गई, एक है मेरी किस्मत। जो होना है इस बार होने देगी, इसके बाद अब बच्चा आने भी नहीं देगी। हर बार मौत के मुंह से ही बाहर निकलती है।

सोचते हुए अचानक रामायणी को याद आया, गाय को सानी-पानी तो दी नहीं। गनौरी हिदायत कर गया था। बाल्टी उठाई और घर के पीछे बथान पर चली गई। कुआं भी पास ही था। बाल्टी कुएं में डाली ही थी कि भाभी-भाभी पुकारते चचेरी ननद ललिता आ गई।

“क्या कर रही हैं भाभी। पानी भर रही हैं। लाइये मैं भर देती हूं।” कहते हुए कुएं में डाली बाल्टी की रस्सी हाथ से छीन ली।

“क्या कीजिएगा पानी। रसोई में पहुंचा दूं।” ललिता को लगा शायद रसोई के लिए पानी चाहिए।

“अरे नहीं। गईया को सानी-पानी देना है। आपके भैया सुबह ही खेत पर चले गए। आज रोपनी लगी है। खेत में पानी का अकाल है, तो जैसे-तैसे सब जल्दी-जल्दी बीहन गांथ(रोप) दे रहा है। रोपनी हो जाएगा तो थोड़ी-बहुत बर्षा से भी कुछ न कुछ धान हो ही जाएगा। बोलकर गए थे कि लेट होगा तो सानी दे देना। हम तो भुलिए गए थे। अभी गईया की आवाज कान में आई, तो याद आया, बेचारी को भूख लगी होगी। नौंवा महीना है। गाय, माय तो एक जैसी होती है न। दो जान है, खाना नहीं मिलेगा, तो बच्चा तंदुरुस्त कैसे होगा।”

“अरे! वाह भाभी, गईया की तो बड़ी चिंता है। थोड़ी अपनी भी किया करिए। लाइये मैं सीधे नाद(सीमेंट का बना कड़ाही नुमा) में ही पानी डाल देती हूं।” कहते हुए ललिता खूंटे से बंधे पास के नाद में पानी डाल दी।

“कितना पानी देती हैं भाभी ?”

“एक और डाल दो लाली।”

“कब बच्चा देगी गईया भाभी।” ललिता कुएं की ओर बढ़ गई।
रामायणी भुसखार से थोड़ा चना, थोड़ा गेहूं का भूसा टोकड़ी से नाद में डाल, पानी में मिलाने लगी।

“देखो न इसका आजकल ही चल रहा है। बाछा देगी कि बाछी पता नहीं। ऊपर वाला जाने। पिछला तो दोनों बाछा था। सिर्फ पहली बार बाछी दी थी। छोटी में ही पांच हजार में बिकी थी। इस बार एक बाछी दे देती न, तो समझो एक और गाय तैयार हो जाती।”

“एक तो बाछा दिख रहा है, मां के बगल में। वो दोनों बाछा कहां है भाभी? दिखता नहीं है।” ललिता कुएं से बाल्टी भरा पानी नाद में डाल दी।

“कहां रहेगा। भगवान के घर गया और कहां जाएगा।” “मतलब?” ललिता रामायणी की बात समझ नहीं पाई।

“कसाई ले गया। मारकर खाल और मांस बेच दिया होगा और क्या करेगा उसका।” नारायणी सानी लगाते हुए बिना ललिता से नजर मिलाए बक दी।

“क्या भाभी! इतने छोटे बच्चे को कैसे कोई मार सकता है। कितना प्यारा था। हम देखे हैं, एक को। कसाई तो हमी हुए न भाभी।”

“हां कसाई तो हम हइये हैं। खरीदने वाला थोड़े न दोषी है। दोष तो बेचने वाले का है। जो काम का न हो, उसको जल्लाद के हवाले कर दो। यही रिवाज है दुनिया का। क्या करोगी, हम औरत भी तो गाय जैसी ही हैं। हमारी बेटी को लोग पेट में ही मार देते हैं। गाय के बछड़े की जिंदगी तभी तक है, जबतक उसकी मां दूध देती है। गाभिन होते ही बछड़ा कसाई के हवाले। अब खेत में हल नहीं चलता है न, न ही बैलगाड़ी चलती है। तो अब बछड़ा बेचारा जिंदा कैसे रहेगा। सब कहता है कि बछड़ा को नहीं बेचेंगे तो सांड़ हो जाएगा। अब सोचो न सांड़ नहीं रहेगा, तो गईया बच्चा कैसे देगी। बेटी को पेट में ही मार देता है। सोचो बेटी नहीं रहेगी, तो बेटा कहां से आएगा। अरे लाली बड़ी उलट-पुलट है ये दुनिया रे।”

“अब गाय को सरकार सुई दिलवाती है भाभी। पूरी जांच किया, हाइब्रिड सांड़ का सीमेन।” रामायणी एकटक ललिता को देखती रह गयी। कितना कुछ जानती है वह।

“आदमी में भी ऐसे ही होता तो शादी करने की जरूरत क्या थी।  हम अपने मन के मालिक होते न। मन होता तो खरीदकर ले आते, हाइब्रिड सी..।”

“वो भी हो गया है भाभी। बड़े-बड़े शहर में मिलता है। पढ़े हैं हम।” ललिता की इस बात पर दोनों ठठाकर हँस पड़े।

“भाभी। ये गाय बेचारी तो बोल नहीं पाती है। अपने सामने ही बच्चे को बिछड़ते देखती रहती है। सच में कितना जुल्म करते हैं हम।”

“हम तो बोल सकते हैं न लाली। लेकिन होता क्या है। मैंने तो विरोध किया। लेकिन मां-बेटा दोनों एक हो गया। जबरदस्ती जांच करवा कर ही माना। झूठ बोलकर ले गया था डॉक्टर के पास। हमको बोला बच्चा का जांच होगा, उसके हालत की, लेकिन जांच कराया लड़का है कि लड़की। हम का जाने औरत जात। हमको तो तब पता चला, जब ख़ूनजारी होने लगा। मर के ही बचे। पेट गिरा दिया मेरा। एक बार नहीं दो-दो बार।”

“इस बार भी तो पेट से हो भाभी। ई! साले-साल बच्चा दोगी, तो जिंदा नहीं रहोगी। अब बन्द कर दो। दो बेटी है न। ऑपरेशन करवा लो भाभी। ये लिंग की जांच कराना गैर कानूनी काम है। सबको जेल हो जाएगा।”

“नहीं रे! अब ये सब नहीं होने देंगे। क्या करें हम औरत के हाथ कुछ है भी नहीं न। सब निर्णय तो मरदे लोग करता है। गाय हो या माय। एक जैसे ही हालत हैं।”

“भाभी वो देखो! गईया की आंखों में आंसू। हमी लोगों को देख रो रही है। खाना भी नहीं खा रही।” दोनों दौड़ पड़े गाय के नाद की तरफ, नजदीक से देखा, गाय की आंखों से ढर-ढर आंसू बह रहा था। रामायणी ने गाय के सर को गले से लगाया।

“मत रो मेरी मां। मत रो। तुम हमारी बातों को सुन रही थी न। मैं भी एक मां हूं पगली। तुम्हारा दर्द समझती हूं। तुम्हारे बेटे को जिंदा नहीं रहने देते और मेरी बेटियों को। हमारा तुम्हारा दर्द तो एक ही है रे। मत रो मेरी कर्यकी..मत..रो।” गाय के गले लग फूट-फूट कर रोने लगी रामायणी। ललिता ने दोनों को अलग किया।
“मत रोइये भाभी। इन इंसानों से अच्छा तो ये जानवर है, जो हम औरतों के दर्द को समझती है।” ललिता बड़ी मुश्किल से रामायणी को गाय से अलग कर पाई। रामायणी की आंसुओं को पोछते हुए ललिता भी रो पड़ी।
गाय के रोने-सिसकने की आवाज तो नहीं आ रही थी, लेकिन लगातार बह रहे आंसू उसके दर्द को बयां करने को काफी थे। जैसे वो कह रही हो –
‘अरे पगली! मैं अपने लिए नहीं रो रही। मेरी आंखों के आंसू तेरे हैं। तेरा मरद मेरे जने बेटों को कसाई के हाथों बेचकर मरवाता है दो पैसों के लिए, लेकिन अपने जने बेटियों को क्यों मारता है? कसाई तो जानवरों की जान लेता है, तेरा मर्द तो अपनी बेटी का ही जल्लाद है। बेटी की जान का ही दुश्मन है।’

             सिसकती रामायणी को ललिता घर के अंदर ले गई, गाय एकटक रामायणी को देखती रह गई, सोचती ये मईया तो गईया से भी कमजोर है। वह तो अभी भी खूंटे को तोड़ भाग सकती है, दूध देती है, कहीं-न-कहीं पनाह मिल ही जाएगी, लेकिन ये कहां जाएगी, बिन खूंटे के भी बंधी है, इज्जत के धागे से।
****
– शम्भु पी सिंह, पूर्व अधिकारी, दूरदर्शन, पटना

shambhu p singh

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