सुनो घर छोड़ कर भागी हुई लड़कियों

मैं एक कहानी लिखने की कोशिश में हूँ l घरेलू सहायिका किचन में बर्तन साफ कर रही है l  मैं एक सशक्त नायिका गढ़ना चाहती हूँ पर घरेलू सहायिका के बर्तनों की टनटनाहट मेरे सोचने में बाधा डाल रही है l तभी घंटी बजती है l सहायिका की भाभी आई हैl जोर-जोर से बता रही है, “देखो करछी से कैसे मारा है, तुम्हारे भैया नेl”

मेरी नायिका की-बोर्ड पर ठिठक कर खड़ी हो जाती है l

सहायिका अपने भाई के लिए दो गालियां उछालती है हवा में, उसकी भाभी भी अनुसरण कर दो गालियां उछालती है | फिर दोनों हँस देती है l

उनका हँसना मेरी नायिका की तरह अपनी किसी उपलबद्धि पर होने वाली प्रसन्नता नहीं है, ना ही नायक के प्रति प्रेम का कोई सूचक, ना ही जीवन के प्रति अनुराग l

उसका हँसना चट्टान फाड़ पर निकले किसी नन्हें अंकुर की सी जिजीविषा है l

जीवन के तमाम संघर्षों में उसने हँसने की आदत डाल रखी है…  आखिर कोई कितना रोए?

पता नहीं क्यों मैं टोंकती हूँ उसे, “क्यों पिटती हो तुम लोग, क्यों नहीं करती विद्रोह?”

जवाब में वो हँसती है, “हम लोगों में ऐसा ही होता है दीदीl मेरे घर से चार घर छोड़ कर रहती है सुनयना, पहला पति पीटता थाl  फिर उसने वो ले लिया… वही, क्या कहते हैं आप लोग…  हाँ! वही डिफोर्स l फिर दूसरी शादी कर ली, अब वो भी पीटता है| अब बताओ कितने लेगी डिफोर्स l

मैं बताती हूँ उसे कि मेरी नायिका बढ़ चुकी है विद्रोह के लिए आगे l

वो फिर हँसती है, “वो कर सकती है… क्योंकि आप उसके लौटने के दरवाजे खोल देती है l एक ठोस जमीन दिखती है उसे, पर हकीकत में… जो जहाँ जैसे फँस गया है उसे लौटने देते लोग… दूसरी बार तो बिलकुल भी नहीं l हाँ थोड़ा और और खिसक देते हैं पैरों के नीचे से जमीन l

उसकी हकीकत और मेरी कल्पना के बीच थमी हुई हैं, की बोर्ड पर थिरकती मेरी अंगुलियाँ l

मैं सोचती हूँ, बार- बार सोचती हूँ, फिर टाइप करती हूँ…

“ये जमीन हमें ही तैयार करनी होगी हकीकत में”

वंदना बाजपेयी

 

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