कोई शॉर्टकट नहीं दीर्घकालीन साधना है बाल साहित्य लेखन -भगवती प्रसाद द्विवेदी

 

यूँ तो साहित्य लेखन ही जिम्मेदारी का काम है पर बाल साहित्य के कंधे पर यह जिम्मेदारी कहीं ज्यादा महती है क्योंकि यहाँ पाठक वर्ग एक कच्ची स्लेट की तरह है, उसके मन पर जो अंकित कर दिया जाएगा उसकी छाप से वो जीवन भर मुक्त नहीं हो सकता l आज इंटरनेट पीढ़ी में जब दो ढाई महीने के बच्चे को चुप कराने  के लिए माँ मोबाइल दे देती है तो उसे संस्कार माता-पिता से नहीं तमाम बेहूदा, ऊल-जलूल रील्स या सामग्री से मिलने लगते हैं l ऐसे में बाल साहित्य से बच्चों को जोड़ना एक कड़ी चुनौती है l  जहाँ उन्हें मनोरंजन और ज्ञान दोनों मिले और बाल साहित्य को दिशा कैसे मिले ? आइए जानते हैं ऐसे तमाम प्रश्नों के उत्तर सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी जी से, जिनसे बातचीत कर रही हैं कवि-कथाकार वंदना बाजपेयी l

सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी जी से कवि -कथाकार वंदना बाजपेयी की बातचीत

कोई शॉर्टकट नहीं गंभीर साधन है बाल साहित्य लेखन 

प्रश्न- नमस्कार सर ! मेरा आपसे पहला प्रश्न है कि आप रसायन विज्ञान के छात्र रहे हैं, फिर साहित्य में आपका आना कैसे हुआ ? कहाँ और क्षार की शुष्कता और कहाँ साहित्यिक भावुकता की अनवरत बहती धारा l सुमित्रानंदन पंत की पंक्तियों “आह से उपजा होगा ज्ञान” का आश्रय लेते हुए मेरी सहज जिज्ञासा है कि वो कौन सी घटना थी जिससे आपके मन में साहित्य सृजन का भाव जागा?

भगवती प्रसाद द्विवेदी जी – वंदना जी! मैं विज्ञान का विध्यार्थी  जरूर रहा, क्योंकि वो दौर ही ऐसा था कि शिक्षा के क्षेत्र में मेधावी व प्रतिभाशाली छात्रों को अमूमन अभिवावक विज्ञान ही पढ़ाना चाहते थे l मेरे साथ भी वही हुआ l हालांकि साहित्य और संस्कृति में मेरी बचपन से ही अभिरुचि रही l महज़ डेढ़ साल की उमर में ही मैं अपनी माँ को खो चुका था l दादी मुझे एक पल को भी खुद से दूर नहीं करना चाहती थीं और उन्होंने ही मेरी परवरिश की थी l फिर भी होश संभालने पर मैं आहिस्ता-आहिस्ता अंतर्मुखी होता चला गया था और शिशु सुलभ चंचलता खेलकूद आदि से मैं प्रायः दूर ही रहता था l रात को जब मैं दादी के साथ सोता, वे रोज बिना नागा लोककथाएँ, पौराणिक कथाएँ आदि सुनाया करती थीं और मैं उन कथाओं के अनुरूप जार-जार आँसू बहाने लगता तो कभी प्रसंगानुरूप आल्हादित भी हो उठता l उन कथा- कहानियों से जुड़कर मैं तरह-तरह की कल्पनाएँ किया करता था l संभवतः दादी की इन वाचिक कथाओं से ही मेरे भीतर सृजन का बीजारोपण  हुआ  होगा l

 

प्रश्न- आज आप साहित्य जगत के स्थापित नाम हैं l जबकि आपने विज्ञान से साहित्य की दिशा में प्रवेश किया है तो जाहिर है कि आपकी यहाँ तक की यात्रा सरल नहीं रही होगी l कृपया अपने संघर्षों से हमें अवगत कराएँ ?

भगवती प्रसाद द्विवेदी जी मैं तो खुद को आज़ भी विद्यार्थी ही मानता हूँ और बच्चों और बड़ों से कुछ न कुछ नया सीखने की कोशिश करता हूँ l मगर मैंने विज्ञान से साहित्य में प्रवेश नहीं किया l बचपन से ही मैंने साहित्य रचते हुए विज्ञान की पढ़ाई की l छठी कक्षा से ही लेखन और प्रकाशन का सिलसिला प्रारंभ हो गया था l उसी का परिणाम था कि हिन्दी संकाय के छात्र- छात्राओं के बावजूद स्कूल कॉलेज कि पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादन में बतौर छात्र संपादक मेरी ही सेवाएँ ली जाती थीं l विज्ञान ने ही प्रगतिशील सोच के साथ ही रूढ़ियों और अंधविश्वास से मुक्त होने की दृष्टि दी l साथ ही लेखन, व्याख्यान में मुझे अनावश्यक विस्तार के स्थान पर “टू द पॉइंट” में विश्वास दृण हुआ l मेरी आस्था स्वाध्याय व सृजन में रही, किसी वाद-विवाद में नहीं l जहाँ तक संघर्ष का सवाल है वो बाल्यकाल से लेकर आज तक अनवरत जारी है l अनेक व्यवधानों के बावजूद अध्ययन और सरकारी सेवा के दौरान भी मैंने इस लौ को मद्धिम नहीं होना दिया l

 

प्रश्न- आपने लगभग हर विधा में अपनी कलम का योगदान देकर उसे समृद्ध किया है l बच्चों के लिए लिखने यानि बाल साहित्य की ओर आपका रुझान कब और कैसे हुआ ?

 

भगवती प्रसाद द्विवेदी जी- मेरा यह मानना है कि बाल साहित्य लेखन की कसौटी हैl अतः हर रचनाकार को बच्चों के लिए जरूर लिखना चाहिए, मगर जैसे -तैसे नहीं, पूरी जिम्मेदारी के साथ l जिन दिनों मेरा दाखिला, जूनियर हाई स्कूल रेवती में हुआ, वहाँ की एक स्वस्थ परिपाटी ने मुझे बहुत प्रभावित किया l प्रत्येक शनिवार को विद्यालय में बाल सभा हुआ करती थी, जिसमें हर बच्चे को कुछ न कुछ सुनाना होता था l कोई चुटकुला सुनाता, तो कोई पाठ्य पुस्तक की कविता सुनाता l रात में मैंने एक बाल कहानी लिख डाली और बाल सभा में उसकी प्रस्तुति कर दी l जब शिक्षक ने पूछा, किसकी कहानी है ये? तो मैंने डरते-डरते कहा, “गुरु जी, मैंने ही कोशिश की है l” तो उन्होंने उठकर मेरी पीठ थपथपाई “अच्छी” है! ऐसी कोशिश लगातार करते रहो l”  फिर तो मेरा हौसला ऐसा बढ़ा कि हर शनिवार को मैं एक कहानी सुनाने लगा और कुछ ही माह में “चित्ताकर्षक कहानियाँ” नाम से एक पांडुलिपि भी तैयार कर दी l मगर गुरुजी ने धैर्य रखने की सलाह दी और पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ भेजने की सलाह दी l आमतौर पर लेखन की शुरुआत कविता से होती है पर मेरी तो शुरुआत ही कहानी से हुई l मेरी पहली कहानी ही प्रकाशन विभाग की पत्रिका ‘बाल भारती’ में प्रकाशित हुई l जब पत्रिका और पारिश्रमिक की प्राप्ति हुई तो मेरी खुशी का पारावार ना रहा l फिर तो समर्पित भाव से लिखने और छपने का सिलसिला कभी थमा ही नहीं l

 

प्रश्न –4 आज का समाज बाजार का समाज है l पैसे और पैसे की दौड़ में मनुष्य भावनाहीन रोबोट बनता जा रहा है l इससे साहित्यकार भी अछूता नहीं रह गया है l बड़ों की कहानियों में विसंगतियों को खोजना और उन पर अपनी कलम चलाना कहीं सहज है पर ऐसे समय और समाज में बाल मन में प्रवेश करना कितना दुष्कर है ?

भगवती प्रसाद द्विवेदी जी-  बहुत ही सही और जरूरी सवाल उठाया है आपने वंदना जी! बाज़ारवाद हर घर में प्रविष्ट कर गया हैl यही वजह है हम अपने बच्चों को एक अच्छा इंसान नहीं, एक कामयाब रोबोट बनाना चाहते हैं l भ्रष्ट तरीके से अधिकाधिक धनोपार्जन ही जीवन का लक्ष्य बनता जा रहा है l ऐसे में जीवन मूल्य की बात ही बेमानी है l लेकिन, यही वह समय जब बच्चों को संस्कारित करने की ज्यादा जरूरत है l यह काम बाल साहित्य से संभव है l मगर यह इतना आसान नहीं है l बच्चों के मनोविज्ञान को परखना टेढ़ी खीर है l इसके लिए हमें खुद बच्चा बनकर मौजूदा दौर के बच्चों से दोस्ती करनी होगी और आहिस्ता -आहिस्ता उनके अंतर्मन में उतरना होगा l हमें बालक-बालिकाओं की मनोदशा और उनकी मूलभूत समस्याओं की गहरी पड़ताल करनी होगी l सच्चा बाल साहित्य उन्हें अपना जिगरी दोस्त बना लेता है और उनके भीतर पसरी कुंठा, निराशा- हताशा, भय को समूल नष्ट करके जीवन मूल्य के साथ हार में भी जीत का एहसास करा देता है l

 

प्रश्न – आज की इंटरनेट पीढ़ी में बच्चों की जिज्ञासाएँ, प्राथमिकताएँ, समस्याएँ पहले से अलग हैं l ऐसे में बच्चों को साहित्य से जोड़ना कितना कठिन है ?

भगवती प्रसाद द्विवेदी जी- लेखकों के लिए ये एक बहुत बड़ी चुनौती है l आम तौर पर बाल साहित्य को रचने वाले अपने बचपन की ओर लौट जाते हैं, मगर वर्तमान इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक के नन्हे-मुन्नों की प्राथमिकताएँ, जिज्ञासाएँ और समस्याएँ बिल्कुल भिन्न हैं l इसके लिए नितांत आवश्यक है वैज्ञानिक समझ, प्रगतिशील सोच और संस्कृति बोध l प्रगतिशीलता का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि हम भारतीय संस्कारों से कट जाएँ l विज्ञान कथाओं और तकनीकी विषय की रचनाओं में भी मानवीय चेहरे और मूल्यबोध को शामिल करना होगा l बालकों की जिज्ञासाओं और कौतूहल को भी तर्कसंगत और विज्ञानसम्मत ढंग से शांत करना होगा l पुराने लोकप्रिय चरित्रों, लोकोक्तियों को भी वर्तमान संदर्भों में रोचक ढंग से ढालना होगा l संदेशमूलकता खेल-खेल में ही मुखरित होनी चाहिए, उपदेश या डाँट फटकार के रूप में नहीं l  यह रचनाकार के रचनात्मक कौशल पर निर्भर होगा l

 

प्रश्न- सर, हर्ष का विषय है कि आजकल की लेखक, लेखिकाएँ बाल साहित्य के प्रति अपने दायित्व को समझ तो रहे हैं पर की बार ऐसा लगता है कि उनमें बाल मन में उतरने में कहीं कसर रह गई है l कृपया मार्गदर्शन करें कि  बाल साहित्य रचते समय लेखक को क्या -क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए?

भगवती प्रसाद द्विवेदी जी- बाल साहित्य का सृजन तलवार की धार पर चलने जैसा ही जोखिम भरा होता है l बहुत कठिन है डगर पनघट की ! यदि आपने मान लिया की बुद्धि में बच्चा मुझ से छोटा है और आपने बाल साहित्य के नाम पर उपदेश झाड़ना शुरू कर दिया, तो गई भैस पानी में! कुछ लोग नाम ही देते हैं शिक्षाप्रद कहानियाँ l अंत में लिख देते हैं कि इस कहानी से फलां सीख मिलती है l बच्चों को शिक्षा देने की नहीं बल्कि उनसे सीखने की जरूरत है l पहले घुटनों के बाल चलता बच्चा l अपने पैरों के बाल खड़ा होने के क्रम में बार-गिरता-संभालता, फिर कुलांचे भरता बच्चा l कैसी अदम्य जिजीविषा से भरा होता है वह! चाँद-सितारे तोड़ लाने की ललक ! हर असंभव कार्य करने की अभिलाषा l ऐसे नन्हे धीर-वीर के साहस को आँकिए l उसके सुकुमार कल्पनाशील कोमल मन को पढिए परखिये l बच्चों को उपदेश परक नहीं आनंददायी साहित्य दीजिए l ऐसा साहित्य जो उनके अंतर्मन को आल्हादित करे और खेल-खेल में ही कोई मूल्यपरक सीख दे जाए l

प्रश्न – एक प्रश्न जो जो आप जैसे समृद्ध रचनाकार से लगभग हर पाठक लेखक जानना चाहेगा कि आप इतनी सहजता से कहानी कविता को अमूर्त विचारों से शब्दों में मूर्त व जीवंत कैसे कर देते हैं? कृपया अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में पाठकों को बताएँ ?

भगवती प्रसाद द्विवेदी जी- मेरी रचना की प्रक्रिया की न तो कोई निर्धारित तकनीक है और ना ही कोई तौर तरीका l राह चलते भी अचानक से कहीं कोई पंक्ति कौंध जाती है और फिर वहीं से उसकी रचना प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है l दिनचर्या के अन्य कार्यों को करते हुए वो प्रक्रिया तब तक चलती रहती है, जब तक वो कागज पर लिपिबद्ध नहीं हो जाती l कहानियाँ बच्चों के लिए हों या बड़ों के लिए प्रायः क बैठक में ही पूरी कर लेता हूँ l कभी शीर्षक पहले ही मस्तिष्क में घर कर लेता है, और  कभी कहानी की पूर्णता के बाद ही शीर्षक कि उपर्युक्तता की समझ आती है l ‘रफ’ और ‘फेयर’ के चक्कर में मैं नहीं पड़ता, जो लिखता हूँ वही अंतिम प्रति होती है l बाल्यकाल से सुलेख का अभ्यास करने का परिणाम है कि संपादक मित्र हस्तलिपि कि सराहना किया करते थे l एकलव्य (भोपाल)  की पत्रिका ‘चकमक’ ने तो दो पृष्ठों का बालगीत मेरी हस्तलिपि में ही छापा था और उस वर्ष के कैलेंडर में भी उसे कई रंगों में प्रकाशित किया गया था l कुछ अन्य पत्रिकाओं ने भी इसे प्रयोग किए थे l रचना, उस वक्त जो भी कागज़ उपलबद्ध हो उसे पर टाँक दी जाती है और हस्तलिखित प्रति ही अम्पादकों को भेजता आया हूँ l जगह भी कोई तय नहीं, कहीं चौकी, चारपाइयाँ, पलंग पर तो कभी कुर्सी टेबल पर,जहाँ बैठा वहीं लिखना शुरू कर दिया l

प्रश्न- बच्चों का मन कच्ची स्लेट की तरह होता है l उन के मन पर जो अंकित हो जाता है उस का असर जीवन पर्यंत है l ऐसे में एक बाल साहित्यकार की क्या जिम्मेदारियाँ हैं?

भगवती प्रसाद द्विवेदी जी- यह सच है कि बचपन की स्मृतियाँ मन मस्तिष्क पर अमिट लकीर की तरह आजीवन अंकित रहती है l मगर ऐसा मानकर बिल्कुल ना चलें कि बच्चे मिट्टी के लौंदे की भांति होते हैं और हम जैसा चाहते हैं वैसी शक्ल दे देंगे l हम जो भी लिखें मौजूदा दौर के बच्चों की अभिरुचि, जीवन शैली, पसंद-नापसंद, को ध्यान में रखकर लिखेंl कभी भी हम झूठे आडंबर, रूढ़ि, अंधविश्वास को बढ़ावा ना दें l साधन संपन्नता का जश्न ना मनाएँ, निर्धनता का मज़ाक ना उड़ाएँ l ऐसी रचनाएँ रचें, जिससे उनमें संवेदना जागे, दीन दुखियों के प्रति मदद का भाव जागे, परदुखकातरता की भावना पैदा हो l समाज से जुड़ाव हो, बच्चे रिश्तों की अहमियत समझें और बड़े- बुजुर्गों के प्रति सेवा सम्मान की भावना उत्पन्न हो l हमारी प्रत्येक रचना कौतूहल जगाए और बालमन की जिज्ञासा को तार्किक व विज्ञान सम्मत तरीके से शांत कर उन्हें संतुष्ट करें l हमारी जिम्मेदारी है कि बाल साहित्य के माध्यम से हमें बच्चों को अंधकार व प्रकाश में भेद करने की दृष्टि देनी चाहिए, ताकि वे बुराइयों से दूर रहकर सत्यपथ की ओर अग्रसर रह सकें l

प्रश्न-8 आप जैसे सुधि साहित्यकारों के प्रभाव व मार्गदशन में एक बार पुनः बाल साहित्य में सुरुचिपूर्ण कार्य होना प्रारंभ हुआ है l ऐसे  में हम ये जानना चाहते हैं कि साहित्यिक उद्देश्य के विशद कार्य में आपके समकालीन बाल साहित्यकारों में किसने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया?

 

भगवती प्रसाद द्विवेदी जी- जिन दिनों मैं राजकीय इंटरमीडिएट कॉलेज बलिया में आई.अस.सी का छात्र था, मेरा संपर्क पुण्यश्लोक रामसिंहासन सहाय “मधुर” जी से हुआ था l उनका आवास कॉलेज के सामने ही था l वे मध्यकाल के प्रथम बालगीतकार थे, और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के काव्य गुरु भी रहे थे l ‘दिनकर’ जी जब राज्य सभा के सदस्य थे तो उन्होंने देश के हालात पर चर्चा करते हुए ‘मधुर’ जी की पंक्तियाँ उदघृत की थी :

“आज देश स्वाधीन हो गया

हम किसान मजदूर  

दिल्ली में ही पूछ रहे हैं

दिल्ली कितनी दूर ?”

“मधुर’ जी जीतने बड़े बाल गीतकार थे, उतने ही सहृदय इंसान भी थे l वे पेशे से वकील थे और उनके दरवाजे पर मुवक्किलों की भीड़ लगी रहती थी l मगर मुझ सा अदना विध्यार्थी जब वहाँ पहुंचता था तो वो मुझे साथ लेकर अंदर के कमरे में चले जाते थे और देर तक मुझे अभिप्रेरित करते रहते थे l पटना आने पर मैंने वैसा ही सरल, सहज, सहृदय व्यक्तित्व महाकवि आरसी प्रसाद सिंह में भी पाया और उनसे गहरे प्रभावित हुआ l निरंकारदेव सेवक, डॉ. हरीकृष्ण देवसरे, डॉ. श्रीप्रसाद, आचार्य विष्णुकांत पाण्डेय, और डॉ. राष्ट्रबंधु के स्नेहिल व्यक्तित्व ने भी किसी न किसी रूप में मुझ पर अपनी छाप छोड़ी l

 

प्रश्न – साहित्यकार तो साहित्य रच देता है l पर उससे बच्चे को जोड़ना साहित्यकार, शिक्षक, और माता माता-पिता की जिम्मेदारी है ? ऐसे में बच्चों को बाल साहित्य से जोड़ने के लिए आप शिक्षक और माता -पिता को क्या संदेश देना चाहेंगे ?

भगवती प्रसाद द्विवेदी जी- यह बहुत जरूरी प्रश्न पूछा आपने l  अधिकतर माता-पिता अपनी दमित इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति बच्चे से करवाना चाहते हैं, जो सर्वथा अनुचित हैl अभिवावक बच्चे की रुचि को पहचानें और उसके अनुरूप ही बालक-बालिका के सर्वांगीण विकास के लिए हर संभव सहायता करें l ज्यादातर माँ- बाप यह शिकायत करते हैं कि उनका बच्चा उनकी बात नहीं मानता l वह उद्दंड, उच्छृंखल, अथवा आत्मकेंद्रित होता जा रहा है l इसके लिए माँ-बाप ही बच्चों के लिए समय निकालें l उन्हें अच्छा बाल साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित करें और खेलकूद में भी सहभागी बनें l उन्हें बच्चों कि पत्रिकाएँ, पुस्तकें नियमित रूप से लाकर दें और साथ बैठकर किताबों को पढ़ने की आदत डलवाएँ l यदि आपका बच्चा सचमुच बाल साहित्य से दोस्ती कर लेगा तो वह कभी भी गलत काम कर ही नहीं सकता l  शिक्षक मार-पीट और डाँट-डपट की जगह बच्चों को प्यार से समझाएँ l समय- समय पर कविता पाठ कहानी पाठ, नाटक आदि के कार्यक्रम करवाएँ और सभी बच्चों कि भागीदारी सुनिश्चित करें l बच्चे प्यार के भूखे होते हैं, उन्हें सच्चा प्यार दें l

भगवती प्रसाद द्विवेदी

भगवती प्रसाद द्विवेदी

प्रश्न-10 आपने भोजपुरी भाषा में भी बहुत काम किया है l बच्चे की पहली भाषा लोक भाषा ही होती है l बाल साहित्य को लोक भाषा से जोड़ना कितना आवश्यक है ?

भगवती प्रसाद द्विवेदी जी- यह भी आपका एक अहम सवाल है l नई शिक्षा नीति 2020 में यह स्पष्ट रूप से प्रावधान किया गया है कि अंचल की लोकभाषा के माध्यम से बच्चों को प्राथमिक शिक्षा दी जाए l भाषा वैज्ञानिकों का यह स्पष्ट मत है कि भाषा के माध्यम से दी गई शिक्षा सर्वाधिक कारगर होती है l बच्चे माँ से, परिवार से, आसपास के परिवेश से लोकभाषा में ही तो सीखते हैं l “चंदामामा आरे आवs, पारे आवs, नदिया के किनारे आवs…  सरीखे गीत वाचिक परंपरा में हजारों साल से शिशुओं का मनोरंजन करते आए हैं l लोरियाँ, खेलगीत आदि संबंधित क्षेत्र में लोकभाषा में ही तो बच्चों कि जुबान पर चढ़कर सदा-सदा के लिए दिल दिमाग में रच बस जाते हैं l लोककथाएँ और लोकगाथायेँ भी तो लोकभाषा में ही पीढ़ी दर पीढ़ी वाचिक परिपाटी में अपनी छाप छोड़ती आ रही हैं l सबसे बड़ी बात यह है कि लोक भाषा हमें जड़ों से जोड़े रखती है l जड़ों से जुडने का अर्थ है अपनी गौरवशाली लोक संस्कृति से जुड़ना, अपनी जड़ों और अपनी मिट्टी से जुड़ना l जैसे जड़ विहीन पौधे परजीवी हो जाते हैं l वैसे ही जड़ों से कटे लोग अपना अस्तित्व खो देते हैं और कहीं के नहीं रह जाते हैं l लोकभाषा अपना घर है और हिंदी अपना देश l  ना हम घर को छोड़ सकते हैं, ना ही देश को l

 

वंदना बाजपेयी

सकाक्षात्कार कर्ता -वंदना बाजपेयी

प्रश्न- हाल में बाल साहित्य से जुड़ कर बच्चों की दुनिया में प्रवेश करने वाले साहित्यकारों के लिए आप के क्या सुझाव हैं ? कृपया मार्गदर्शन करें ?

भगवती प्रसाद द्विवेदी जी- बाल साहित्य को साधना मैं ईश्वरीय आराधना मानता हूँ l बच्चे भी तो ईश्वर की ही प्रतिमूर्ति हैं l उन्हें रिझाना आनंदित करना हमारा दायित्व हैl कई किस्म के दवाब, तनाव, अवसाद में जीने को लाचार बाल गोपालों के चेहरे पर हँसी-मुस्कान लाने का दायित्व हमारे ऊपर भी है l क्योंकि

“बच्चे हँसते हैं तो दुनिया प्यारी लगती है l

उनकी हँसी सलोनी लगती है सोन चिरैया सी

चहक-फुदक दाने चुगने वाली गौरैया सी

हँसी दूधिया तीन लोक से न्यारी लगती है l

बच्चे हँसते हैं तो दुनिया प्यारी लगती है l”

उत्कृष्ट बाल साहित्य सर्जना के लिए जरूरी है कि भारतीय भाषाओं के साथ-साथ विदेशी भाषाओं के भी क्लासिकल बाल साहित्य का भी अध्ययन करें l  उससे भी ज्यादा आवश्यक है कि बालक बालिकाओं के मन को पढ़ना l शिशुओं, बालकों और किशोरों के लिए हम उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप बाल साहित्य का सृजन करें l “जो रचेंगे वो ही बचेंगे” अतः बच्चों के लिए हम अपना सर्वोत्तम देने का प्रयास करें l बाल साहित्य रचकर हम बच्चों को क्या देना चाहते हैं? इस पर हमारी दृष्टि साफ होनी चाहिए l यह शॉर्टकट नहीं दीर्घकालिक साधना है, और लक्ष्य होना चाहिए पुरस्कार सम्मान पान नहीं, अपना सर्वस्व होम देना l

यह लेख बाल किरण मासिक पत्रिका में प्रकाशित है l

अटूट बंधन

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