ऊँट की पीठ
अपने रेलवे क्वार्टर का दरवाज़ा जीजा खोलते हैं.
गिनाए रहे…..
प्रसूति निपटा कर अपने कस्बापुर के लिए विदा हो रही माँ को सुनाए रहे, ‘दोहती
आपकी. कुसुम आपकी. फिर उसकी डिलीवरी के लिए उधार ली गयी यह रक़म भी तो आपके
नामेबाकी में जाएगी…..’
हूँ.
जमा हो रहा है, एक नया बोध.
खड़े होने के कारण.
मैं अपने कद में, अपने गठन में, अपने विस्तार में जीजा से अधिक ऊँचा हूँ,
अधिकमज़बूत, अधिक वज़नदार. तीन वर्ष पहले जब जीजी की शादी हुई रही तो मेरे उस
तेरह-वर्षीय शरीर की ऊँचाई जीजा की ऊँचाई के लगभग बराबर रही थी तथा आकृति एवँ बनावट उन से क्षीण एवँ दुर्बल. फिर उसी वर्ष मिली
अपनी आवासी छात्रवृत्ति के अन्तर्गत कस्बापुर से मैं लखनऊ चला गया रहा और इस बीच जीजी
से जब मिला भी तो हमेशा जीजा के बगैर.
तुम्हारे हाथ में हो,” जीजा मेरे हाथ के मिठाई के डिब्बे को घूरते हैं. लिप्सा-लिप्त.
भीतरी भाग में इधर-उधर घूमती हुई चिन्हित की जा सकती है. मानोअपनीधमकी को बाहर उछालने
से पहले वे उस से कलोल कर रहे हों.
बाद. जिस विकट जीजा को मैं देख रहा हूँ वे मेरे लिए अजनबी हैं : छोटी घुन्नी आँखें,
चौकोर पिचकी हुई गालें, चपटी फूली हुई नाक, तिरछे मुड़क रहे मोटे होंठ, गरदन इतनी
छोटी कि मालूमदेता है उनकी छाती उनके जबड़ोंऔर ठुड्डी के बाद ही शुरू हो लेती है.
बार भी मैं नहीं दोहराता, “रुपयों का प्रबन्ध हो रहा है. आज तो मैं केवल अपनी हाई
स्कूल की परीक्षा में प्रदेश भर में प्रथम स्थान पाने की ख़ुशी में आप लोगों को
मिठाई देने आया हूँ.”
सुर में पुकारता हूँ, “जीजी…..”
सलवारऔरकमीज़, बेमेल….. दुपट्टा, नदारद….. चेहरा वीरान और सूना…..
अलंकार एवँ आभूषण की बचपन ही से सनक रही? अपने को सजाने-सँवारने की धुन में जो
घंटों अपने चेहरे, अपने बालों, अपने हाथों, अपने पैरों से उलझा करतीं? जिस कारण
बाबूजी को उन की शादी निपटाने की जल्दी रही? वे अभी अपने बी.ए. प्रथम वर्ष ही में
थीं जब उन्हें ब्याह दिया गया था. क्लास-थ्री ग्रेड के इन माल-बाबू से.
जीजी मेरे हाथ का डिब्बा छीन लेती हैं.
चीख़ पड़ती हैं, “मेरी पसन्द की बरफ़ी? मालूम है अपनी गुड़िया को मैं क्या बुलाती हूँ?
बरफ़ी…..”
तत्कालअपने मुँह में छोड़ लेती हैं.
वाली जीजी भूल रही हैं बरफ़ी मुझे भी बहुत पसन्द है. यह भी भूल रही हैं हमारे कस्बापुर
से उनका बस्तीपुर पूरे चार घंटे का सफ़र है और इस समय मुझे भूख़ लगी होगी.
उनकी च्युति बराबर करने की मंशा से मैं बोल उठता हूँ.
ठठाकर जीजी अपने मुँह में बरफ़ी का दूसरा टुकड़ा ग्रहण करती हैं, “मानुष माँस खाते
हैं. मानुष लहू पीते हैं. वे आदमी नहीं, आदमखोर हैं…..”
मैं जीजा ही की दिशा में अपना प्रश्न दाग देता हूँ.
से ले जा. वरना मैं तुम दोनों को खा जाऊँगा. सरकारी जेल इस नरक से तो बेहतर ही
होगी…..”
नहीं? चिनगारी छोड़ोगे तो लकड़ी चिटकेगी नहीं? मुँह ऊँट का रखोगे और बैठोगे बाबूजी
की पीठ पर?”
हैं, “तू रिक्शा ले कर आ. इसे मैं यहाँ अब नहीं रखूँगा. यह औरत नहीं, चंडी है…..”
जीजी ठीं-ठीं छोड़तीहैं और बरफ़ी का तीसरा टुकड़ा अपने मुँह में दबा लेती हैं.
जीजा मुझे बाहर वाले दरवाज़े की ओर संकेत देते हैं, “जब तक मैं इस का सामान बाँध
रहा हूँ…..”
प्रचण्ड हो जाती हैं, “मैं यहाँ से कतई नहीं जाने वाली, कतई नहींजाने वाली…..”
उत्तेजना बढ़ रही है, “वरना मैं इसे अभी मार डालूँगा…..”
क्वार्टर से बाहर निकल लेता हूँ.
है. उन के आदेश के साथ, ‘कुसुम के घर जाते समय इसे स्विच ऑफ़ कर लेना और वहाँ से बाहर
निकलते ही ऑन. मुझे फ़ौरन बताना क्या बात हुई. और एक बात और याद रहे इस पर किसी भी
अनजान नम्बर से अगर फ़ोन आए तो उसे उठाना नहीं.’
दूसरे अनदेखे छोर पर आ पहुँचाहूँ.
इस समय उनके पास अपना अलग दफ़्तर हैऔर अलग टेलीफ़ोन.
ज़ोरदार आवाज़ में बाबूजी मुझे मना करते हैं, “वह वहीं ठीक है…..”
“वे बिल्कुल ठीक नहींहैं. उनका दिमाग़, उनकी ज़ुबान उनके वश में नहीं. जीजा उन्हें मार डालेंगे…..”
उसे मार डालने की जुर्रत नहीं कर सकता. वैसे भी वह आदमी नहीं, गीदड़ है. भभकी ही
भभकी रखे है अपने पास…..”
हैं…..” एक बिजली की मानिन्द जीजी मुझे रेल की पटरीपर बिछी दिखाई देती हैं और
ओझल हो जाती हैं.
आत्महत्या नहीं करने देगा. वह जानता है उस की आत्महत्या का दोष भी उसी के मत्थे मढ़ा
जाएगा और उसी की गरदन नापी जाएगी. तुम कोई चिन्ता न पालो. बस, घर चले आओ…..”
राह देख रहे हैं. जीजा ने मुझे रिक्शा लाने भेजा था…..”
कुसुम के पास अब भूल से भी मत जाना. और फिर, इधर तुम्हारे दोस्त तुम्हें पूछ रहे
हैं. टी.वी. चैनल वाले तुम्हारे इन्टरव्यूके साथ तुम्हारी माँ और मेरा इन्टरव्यू भी लेना चाहते
हैं…..”
नहीं कर पाता.
एक बजे वाली बस कस्बापुर के लिए रवाना होती है मुझेध्यान आता है जीजी की बेटी के
लिए माँ ने चाँदी की एक छोटी गिलासीमुझे सौंपी थी, ‘भांजी को पहली बार मिल रहे हो.
उस के हाथ में कुछ तो धरोगे.’ वहगिलासीमेरे साथ वापिस चली आयीहै. भांजीको मिला कहाँ मैं?
बजता है. कई अनजाने नम्बरों से.
तब भी जवाब में मैं उसे नहीं दबाता.
परेशान हो रही हैं और बदले में जीजा को परेशान कर रही हैं. जीजी को बिना बताए मुझे
कदापि नहीं आना चाहिए था. कहीं जीजी मुझे खोजने रेल की पटरी पर न निकल लें और ऊपर
से रेलगाड़ी आ जाए!
मोबाइल से मैं बाबूजी के दफ़्तर का नम्बर कई बार मिलाता हूँ किन्तुहर बार उसे
व्यस्त पा कर मेरा खटका दुगुने वेग से मेरे पास लौट आता है.
जा लगती है.
सामने जमा स्कूटरों और साइकलों की भीड़ मुझे बाहर ही से दिखाई दे जाती है.
को स्त्रियों के एक समूह के साथ विलाप करती हुईं पाता हूँ.
पुरुषों के जमघट में बैठे बाबूजी उठ खड़े होते हैं और मुझे घर के पिछले बरामदे में
लिवा लाते हैं.
होगा,” वे मेरी पीठ घेर रहे हैं, “मज़बूत दिल से, मज़बूत दिमाग़ से. तुम रास्ते में थे,
इसलिए तुम्हें फ़ोन नहीं किया बस में अकेले तुम अपने को कैसे सँभालोगे? क्या करोगे?
कुसुम…..”
निकलीं और रेलगाड़ी ऊपर से आ गयी?” मैं फट पड़ता हूँ.
दिया?” बाबूजी चौकन्ने हो लेते हैं, “अपने को निरापराध ठहराने के लिए?”
रहा हूँ, “जीजी को मैं कहाँ बता कर आया मैं इधर लौटरहा हूँ? ठीक से मैं उन्हें
मिला भी नहीं….. पहले जीजा ने तमाशा खड़ा किया. फिर जीजी आपा खो बैठीं. फिरआपने
हुक़्म दे डाला, वापिस आ
जा, वापिस आ जा…..”
कलाई अपने हाथ में कस लेते हैं, “शान्त हो जा. कुसुम को जाना ही जाना था. उस का
कष्ट केवल काल ही काट सकता था. हम लोग नहीं. हम केवल उस की बिटिया की रक्षा कर
सकते हैं. उस का पालन पोषण कर सकते हैं. उसे अच्छा पढ़ा-लिखा सकते हैं. और करेंगे
भी. बस्तीपुर से लौटती बार उसे अपने साथ इधर लेते आएँगे…..”
पटरीपर बिछी हैं….. लेकिनअब वे अदृश्य नहीं हो रहीं….. मुझे दिखाई दे रही हैं…..
साफ़दिखाई दे रही हैं….. हमारे कस्बापुर की बरफ़ी अपने मुँह में दबाए…..
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