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मूलांक व् भाग्यांक


                           

    



मूलांक व् भाग्यांक 
अंकशास्त्र में हर अंक किसी न किसी ग्रह से संबंद्ध है। अंक ज्योतिष में 1 से लेकर 9 तक की संख्या ग्रहों, उनकी दशा व उनके लक्षण को दर्शाता है। आपकी जन्मतिथि यदि 1 से 9 तक है जो वह अंक आपका मूलांक है, लेकिन यदि अंक 9 से अधिक है तो दोनों अंकों के जोड़ से जो अंक प्राप्त होगा उसे मूलांक माना जाएगा। उदाहरण के लिए यदि आपकी जन्म तिथि 14 (1+4) है तो मूलांक पांच होगा। इसी तरह पूरी जन्म तिथि को जोड़ने से जो अंक प्राप्त होगा, उसे अंक शास्त्र में भाग्यांक कहते है।
उदाहरण के लिए यदि आपकी जन्म तिथि 14 नवंबर 1977 है तो आपका भाग्यांक(1+4+1+1+1+9+7+7) 4 होगा। मूलांक जहां व्यक्ति के चरित्र को दर्शाता है, वहीं भाग्यांक भविष्य की घटनाओं का संकेत देता है।
अंकशास्त्र में मूलांक व भाग्यांक दोनों की गणना का प्रभाव है। यदि किसी व्यक्ति का भाग्यांक उसके मूलांक से अधिक प्रबल है तो मूलांक अपना चरित्र करीब-करीब खो देता है, लेकिन यदि मूलांक भाग्यांक से अधिक प्रबल है तो भाग्यांक उस पर अधिक हावी नहीं हो पाता है।
किसी के जन्म तिथि में एक अंक दो से अधिक बार आता है तो वह अंक व उसका मालिक ग्रह अपने मूल चरित्र को छोड़कर विपरीत अंक व उसके मालिक ग्रह के चरित्र को अपना लेता है। स्वभावत: 8 अंक वाले अंतरमुखी होते हैं, क्योंकि उनका मालिक शनि ग्रह है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति 8 अगस्त 2008 को पैदा हुआ हो तो वह बहिमुखी होगा। क्योंकि उसके जन्मतिथि में 8 की बहुतायत के चलते वह विपरीत अंक 4 व उसके मालिक ग्रह राहु की चारित्रिक विशेषता को अपना लेगा, जिस कारण उसका स्वभाग बहिर्मुखी हो जाएगा।
शादी के वक्त अक्सर दो लोगों की ज्योतिषीय कुण्डली मिलाई जाती है। अंक शास्त्र में यह और भी आसान है। अंक शास्त्र में जन्मतिथि के आधार पर दो लोगों के स्वभाग व भविष्य की तुलना आसानी से की जाती है। मान लीजिए यदि दो व्यक्तियों की जन्मतिथि, माह व वर्ष में कोई एक अंक दो से अधिक बार आ रहा है तो दोनों में किसी भी सूरत में नहीं निभ सकती है। ऐसे व्यक्तियों की आपस में शादी न हो तो ही बेहतर है।
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