“त्वदीयवस्तुयोगींद्र, तुम्यमेवसम्पर्य
धर्मप्रेमी, नियमनिष्ठ, साहित्यरसिक!”
पिता-दिवस सभी को मुबारक। वह
सभी लोग खुशनसीब हैं जिनके सिर पर उनके पिता का साया है और उन्हें उनका आशीर्वाद
प्राप्त है!
पिता का वर्ष में सिर्फ एक ही दिन क्यूँ, बल्कि
हर दिन आदर और सत्कार होना चाहिये।
व्याखान की सामग्री के रूप में श्लोकों, दोहों, टोटकों, व्यंग्य, कथा–कहानियोंआदिको संग्रह करने की रूचि मुझे प्रारम्भ से ही रही है। इसका सारे का सारा श्रेय मेरे पूज्य पिताजी को जाता है, उन्होने जो ज्ञान–दान मुझे दिया, वह जीवन में मेरे लिए अविस्मरणीयऔरअमूल्यहै।
कुछ भूली बिसरी यादें
मुझे ही नही बल्कि परिवार के अन्य सदस्यों के कण–कण में भी उन का यह उपकार छिपा है! पिताजी के स्नेह तथा वात्सल्य से लाभान्वित होकर ही मैं लेखन की दिशा मेंअग्रसर हो सका हूँ!
पिताजी असूलोंकेबड़ेपाबंदथे, एक ईमानदारऔरमेहनतीइंसानथे।उन्होने हमारी माताजी, जो पेशे से एक अध्यापिका थी, के सहयोग से हम पाँचभाई बहिनो का अपनी हैसियत से बढ़कर लालन–पालनकिया
। उन्होने हमें एक सफल जीवन जीने के लिये जो मूलमंत्र दिये उनको अपना कर ही हम इस मुकाम तक पहुंचे हैं जहांआज हम सब हैं!
पिता जी केबहुआयामी अध्ययन–अनुभव से ही मेरा ज्ञान एवं अध्ययन भी व्यापक हो सका है।
पिता जी किसी भी बात कोकहावतों, चुट्क्लों–टोटकोंऔरशायरी–दोहों के माध्यम से बड़ी सरलता से कह देते थे।वेअपने तीखे व्यंग्यात्मक और अप्रत्याशित ढंग से किसी भी बात को कहने के लिए बड़े निपुणऔरकुशलथे। एकबार जो भी व्यक्ति उनके कटाक्ष का शिकार हो जाता वह फिर न तो हंस ही पाताऔर नही रो पाता था। पिताजी के यह गुण कुछ मुझे भी धरोहर में मिले हैं, ऐसा मेरा मानना है!
इसी दौरान नौकरी के ईलावा पिता जीनेअपनी पढ़ाई भी जारी रखी औ रपंजाब युनिवर्सिटीसे स्नातक की डिग्री प्राप्त की जो कि उन दिनो एक बहुत बड़ी बात हुआ करती थी देश बंटवारे से पहले पिता जी एफ.ए.(ग्यारवीं के समकक्ष) थे। पिताजी ने दसवीं क्लास प्रथम श्रेणी में पास कीऔर उनके प्रमाण–पत्र पर गवर्नमेंट हाईस्कूल, शोरकोट, पंजाबयुनिवर्सिटी, लाहौर – सत्र 1936- अंकित है। पिताजी नेअपने 28-30 वर्ष का सेवा काल, नाभा, पटियाला, लुधियाना, जालंधर, चंडीगढ़ आदि शहरों में पूरा किया औरअंत का समय उन्होने हरियाणा केशहर रोहतक में बिताया।
इन विभिन्न प्रदेशों के प्रवासऔर हिन्दी, पंजाबी, अ्ग्रेज़ी तथा उर्दू–फारसी के विभिन्न साहित्यों काअनुशीलन करने के अतिरिक्त, समाज के विभिन्न दौर से गुजरने केअपने अनुभवोंका एक विशाल संग्रह पिताजी के पासथा जिसकी एक छाप कुछ हद तक मुझमें भी झलकती है जो शायद पाठकों को मेरी कुछ रचनाओ में भी देखने को मिले।अंत में बस मैं इतना ही कहूँगा कि पूज्य–पिताजी की बदौलत जो संस्कार, संयम, ईमानदारी तथा व्यंगात्मक स्वभाव मुझे विरासत में मिला है उसके लिए मैं सदैव उनका ऋणी हूँ/रहूँगा। सबसे बड़ा उपहार जो ईश्वर ने हम सब
को दिया है वह है पिता!
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