रात को भारत में हैं सुबह अमेरिका में | पूरा विश्व एक आँगन में तब्दील हो गया है
|या यूँ कहे हमारा आँगन बड़ा हो गया है | टी वी देखती हुई ८० वर्षीय रामरती देवी एक उडती सी नज़र अपने आँगन पर डालती
हैं …..वही कोने में चूल्हा जलता था जब चारों बच्चे घेर के बैठ जाते थे | चूल्हे पर धीरे –धीरे
सिकती हर रोटी के ४ टुकड़े कर सब की थाली में एक –एक टुकड़ा डाल देती थी | देवरानी मुस्कुरा कर कहती थी
“दीदी आप से सब बच्चे हिल मिल गए हैं अपना पराया समझ नहीं आता | पर अब ……. अब
तो कोई नजर नहीं आता | बरसों पहले देवरानी न्यारी हो गयी ,और बच्चे अमेरिका में जा
कर बस गए जिन्हें चार साल से देखा नहीं |रामरती देवी चश्मा पोंछ कर बुदबुदाती हैं …..हां
शायद आँगन इतना बड़ा हो गया हैं कि कोई दिखता नहीं बरसों –बरस |
वर्ष चलने –फिरने उठने –बैठने में असमर्थ
एक कमरे में पड़े –पड़े पानी के लिए बच्चों को आवाज़ लगाती हैं | वही घर है ,आँगन भी
वही है …. जब उनकी एक आवाज़ पर सारे बच्चे दौड़े चले आते थे…. वह भी कभी मूंगफली
से कभी टॉफ़ी से कभी ,कभी भुने चनों से बच्चों की झोलियाँ भर देती थी | पर आज इतना
पुकारने पर भी कोई नहीं आता …. घंटों बाद आती है परिचारिका उनके गीले हुए
वस्त्रों को बदलने या पानी और दवाई देने | शकुंतला देवी मन ही मन सांत्वना देती है
वह तो अभी भी वही है ,घर भी वही पर शायद
टी .वी वाला सही बोल रहा है ………. आँगन बड़ा हो गया है तभी तो उनकी आवाज़ आँगन
को पार करके बच्चो तक पहुँच ही नहीं पाती |
साल पहले विदेश जा कर बस गया था | कितना घबराई थी वो अपने कलेजे के टुकड़े अपने बेटे को विदेश भेजते समय | वैधव्य की मार झेलते हुए कैसे नमक रोटी
खाकर पढ़ाया था पप्पू को | बेटे ने हाथ थाम कर कहा था “अम्माँ बस एक साल की बात है ,लौट आउंगा | थरथराते
होंठों से बस उसने इतना ही कहा था “ बेटा मेरी मिटटी खराब न होने देना ,आग तुम्ही
देना “ अरे नहीं अम्माँ अब पूरा विश्व एक आँगन हो गया है ,दूरी रह ही
कहाँ गयी है | विधि की कैसी विडम्बना है जो माँ अपलक १० साल से अपने बेटे का
इंतज़ार कर रही थी उसकी मृत देह १० घंटे भी न कर सकी | इससे पहले कि देह सड़े रिश्ते
के भतीजे को बुला कर पंचतत्व में विलीन कर
दी गयी | पप्पू न आ सका | इतने बड़े आँगन को पार करने में समय तो लगता ही है |
पिछले महीने हमने विदेशियों की परंपरा का निर्वहन करते हुए मदर्स डे ,फादर्स डे
,फैमिली डे मनाया | बहुत से लोगों को इस दिन दूर रहते हुए अपने माता –पिता की याद
आई होगी | शायद फोन मिला कर “ हैप्पी मदर ,फादर ,फैमिली डे कहा हो “ शायद कोई
कार्ड ,कोई गिफ्ट भी दिया हो | और प्रतीकात्मक रूप से अपने कर्तव्य की ईतिश्री
करके अपने सर से बोझ उतार लिया हो | पर
समय कहाँ देख पाता है कि बुजुर्गों के
चेहरे की मुस्कुराहटों की नन्हीं सी शाम, इंतज़ार की लम्बी रात में कितनी जल्दी धंस
जाती है | फिर शुरू हो जाता है अंतहीन पलों को गिनने का सफ़र जो कटते हुए भीतर से
बहुत कुछ काट जाते हैं |जीवन संध्या में एकाकीपन कोई नयी बात नहीं है | बहुत कुछ
कहा जा चुका है कहा जा रहा पर समस्या जस की तस है | एकाकीपन की समस्या से हर
बुजुर्ग जूझ रहा है | वो भी जिनके बच्चे दूर विदेश में हैं और वो भी जिनके बच्चे पास रह कर भी दिल से
बहुत दूर हैं | बड़े होते आँगन में दायरे इतने संकुचित हो गए हैं कि किसी के पास
किसी के लिए समय नहीं है |
अब तस्वीर को पूरा १८० डिग्री पर पलट कर देखते हैं | नीरज एक छोटे से
कस्बे में रहने वाला होनहार छात्र जिसने
अपनी कुशाग्र बुद्धि के दम पर एक देश की सबसे प्रतिष्ठित इंजीनयरिंग परीक्षा पास
की और कंप्यूटर इंजिनीयर बना | जाहिर है
उसके छोटे से कस्बे में उसकी योग्यता लायक
कोई नौकरी नहीं है | देश के बड़े शहरों और
विदेशों में उसका सुनहरा भविष्य इंतज़ार कर रहा है |अब उसके पास
मात्र दो विकल्प हैं | या तो वो किसी मात्र पेट भरने लायक नौकरी कर के उस
कस्बे में रहे और जीवन भर अपनी योग्यता के अनुसार पद न मिल पाने की वजह से
कुंठित रहे या घर द्वार छोड़ कर कहीं और बस जाए | नीरज निष्ठुर नहीं है विवश है | हमारे
अपने देश में ही बहुत से प्रान्त तरक्की में इतना पिछड़े हुए हैं कि वो अपने होनहार
बच्चो को अच्छी नौकरियाँ उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं | बच्चे विवश हैं प्रान्त को,
देश को छोड़ कर बाहर जाने को |आज नीरज अमेरिका में जरूर है पर उसका मन यही अम्माँ –बाबूजी
के पास है | तन और मन का यह बंटवारा नीरज
को ३३ वर्ष की उम्र में उच्च रक्तचाप व् डायबिटीज की सौगात दे गया है |
वैज्ञानिक है | अपने ही देश में रह रहे माता –पिता से चाह कर भी जल्दी –जल्दी मिलने नहीं जा पाता | जाना चाहता है पर कर्तव्य का बोझ इतना ज्यादा
है कि हर त्यौहार पर मन मसोस कर रह जाता
है | जब कभी माँ की बीमारी की खबर सुनता है तो दर्द और तकलीफ की एक लम्बी रेखा
खींच जाती है मन पर | बेचैन राते आँखों में कटती हैं | पर विवशता है काम की |
अक्सर अपने बच्चों को गाँव की पनघट की ईमली के पेड़ों की , गेंहू के खेत की
कहानियाँ सुनाता है | शायद उन किस्सों को सुना –सुना कर कल्पना में ही सही पर वो सुकून के पल वो ममता की छांव का अहसास कर
लेना चाहता है | तरक्की की दौड़ में अंधराए
हुए बच्चों पर दोष लगाते हुए हम यह भूल जाते हैं कि रोटी की चाह में घर से दूर गए ये
बच्चे भी कहाँ पूरे होते हैं इनके भी
भावनाओं का एक कोना टूटा हुआ होता है | तभी तो सुदूर विदेशों में दिवाली पर मिटटी के दिए ढूंढते हैं| रोली और कुमकुम से
पूजा की थाली सजाते हैं | अपनी सभ्यता को समेटने का प्रयास तो करते हैं पर पर माँ
का स्नेहिल स्पर्श और अपनों के साथ की कमी हमेशा रह जाती है …. हर बार प्रयास
करते हैं सब कुछ पहले जैसा हो जाए पर हर ख़ुशी हर गम यह अहसास दिला देता है ….
अपनों के बिना जीवन वैसा ही हैं जैसे शरीर बिना आत्मा का | परदेश में बसे बच्चे बहुधा एक खोखला और झूठा जीवन
जी रहे होते हैं | गला काट प्रतिस्पर्धा
के वातावरण में उन्हें मित्र नहीं फ्रेनिमीज मिलते हैं | परिवार के
सुरक्षित वातावरण प्रेम और स्नेह की कमी सदा खलती रहती है
आज आँगन बड़ा हो गया है पर क्या केवल कहने के लिए या सिर्फ भौतिक अर्थों में |ज्यादा तेज रफ़्तार से
चलने वाले वाहनों की वजह से घंटों की दूरियां मिनटों में तय हो रही है| आँगन बड़ा
हो गया है पर विचार संकुचित | सब अपने –अपने घेरों में बंद , अपने दर्द अपनी तकलीफ
में कैद …. अपना अपना अकेलापन, अपनी –अपनी रिक्तता | पर क्या इस आँगन को
वास्तविक रूप में बड़ा नहीं किया जा सकता | दिल के अर्थों में भावनाओं के अर्थों
में आपसी सहयोग के अर्थों में | क्यों न
घर से दूर रहते बच्चे अपने आस –पास रह रहे
किसी अकेले बुजुर्ग परिवार को अपना ले
,उनका सहारा बन जाए ,उनके सुख –दुःख बांटे | इससे
उन्हें भी स्नेह की वो छाया मिलेगी जो वो गाँव में छोड़ आये हैं | जीवन
संध्या में अकेलेपन से जूझ रहे बुजुर्गों को भी बेटे बहु का प्यार ,नाती –पोतों का लाड –दुलार और देखभाल
करने वाला परिवार मिलेगा | इस वसुधैव कुटुम्बकम की भावना अपनाने के बाद ही हम कह
पायेंगे …. आज पूरा विश्व एक परिवार हो गया है | सच में हमारा आँगन बड़ा हो गया
है |
Comments are closed.