आधी आबादी :कितनी कैद कितनी आज़ाद ( तृप्ति वर्मा )

जरूरी है बराबर का पालन -पोषण 
हमारा भारत स्वतंत्र है और स्वतंत्र भारत में अधिकांश आबादी पित्र सत्ता, रूढिवादी, अंधविश्वास, आडम्बरी परम्पराओं को संग लिए पिढी दर पिढी इसे निभाते देखा गया है।परंतु हमारा भारत आज स्वतंत्र भारत के साथ आधुनिक भारत भी बन चुका है भारत विज्ञान के क्षेत्र में भी परचम लहरा रहा है , इसके साथ ही पिता के सम्पत्ति का वारिस के लिए पुत्र का होना अनिवार्य है ऐसी धारणा भी खंडित हो चुकी है।आज लोग पुत्री के जन्म पर भी उतनी ही खुशियाँ और संतोष व्यक्त करते हैं जितनी की पुत्र के जन्म पर।
किंतु प्रश्न यह है कि बेटा और बेटी को समान प्रेम और अधिकार की बात कहने और करने में कहीं अंतर तो नहीं।
हम स्त्रियां सदैव पुरषों को ही स्त्री विरोधी खलनायक की भूमिका में रखते हैं जहां स्त्री दुराचार में पुरुष दोषी हैं वहीं यह भी देखा जाता है स्त्री स्वयं ही स्त्री विरोधी होती है
     यहाँ मैं सारी स्त्रियों को या सारे पुरुषो को स्त्री विरोधी नहीं कह रही ,सामाज में ऐसे बहुत से स्त्री /पुरुष है जिन्होंने मिल कर स्त्रियों के उत्थान के लिए, शिक्षा के लिए , रोजगार में सहायता के लिए कार्य किया है, यहाँ तक कि बहुत सी ऐसी महिलाएं  हैं जो पुरुषों को पीछे छोड उँचे पद पर हैं , पर
मैं यहाँ स्त्री /पुरुष के उस वर्ग या उन परिवारों को बिन्दू कर रही जो कम पढी लिखी है या पढी लिखी तो है,पर  स्वतंत्रता की मात्र बाते करती है पर मानसिक रूप से , विचारों से  स्वतंत्र नहीं।हमें यही एहसास होता है कि
‘स्त्री की स्वतंत्रता अधीनता के शर्त पर’ ही है
हम देखते हैं कि आज भी स्त्री आधुनिक तकनीकों से लैस जीवन जीती है पर कैद मानसिकता के लोगों से घिरा जीवन उसकी स्वतंत्रता उडान को बाधित करता है।
आज कुछ स्त्री आधुनिक भारत में जन्मी नयी पीढी के साथ चली , शिक्षित हुईं, सपने बुने पर सपने सच करने की स्वतंत्रता केवल शब्दों तक ही सीमित रही स्त्री को स्वतंत्रता केवल अधीनता के शर्त पर ही मिली है ऐसी स्त्रिया समाज में अनगिनत हैं।मैं यहां आधुनिक तकनीकी युग में सफल महिलाओं की बात नहीं करूँगी , मै यहाँ उन महिलाओं की बात करूँगी जो स्वतंत्र, आधुनिक, और वैज्ञानिक क्षेत्र में आगे रहने वाले भारत में आज भी अपनी छोटी इच्छा को पूरा करने , अपनी पहचान बनाने के लिये केंचुए की तरह रेंगती हुई संघर्ष कर रही हैं।
ऐसी ही कहानी अभिलाषा की है जो एहसास दिलाती है की आज भी महिलाएं स्वतंत्र नहीं।
अभिलाषा- एक मल्टी काम्पलेक्स सीटी में रहने वाली पिता सरकारी उच्चाधिकार , माँ कम पढी लिखी सामान्य सोच,  एक भाई आनंद।
‘अभिलाषा’ का घर बिल्कुल आधुनिक साज सज्जा से पूर्ण, आधुनिक उपकरणों से लैस।
‘अभिलाषा’ के परिवारजन शिक्षित सामान्य सोच वाले।
‘अभिलाषा’ के पिता की बदली होती है और अभिलाषा का पूरा परिवार बनारस शहर में आ बसता है।अभिलाषा की उम्र 8 वर्ष और भाई आनंद की उम्र 14 वर्ष।
एक दिन अभिलाषा के घर उनके पडोसी आते हैं बातों -बातें में अभिलाषा के पिता कहते हैं
पिता – हम बेटा -बेटी में कोई अंतर नहीं करते हमारे लिए दोनों ही बराबर है, बस ऐसे ही खुशी से जीवन कट जाए ।
पडोसी – सर नये शहर में आए हैं बच्चो का एडमिशन कहा करा रहे ?
अफसर पिता – बेटे का एडमिशन शहर के टाप कालेज में कराया है घर से 45 मिनट का रास्ता है एक बाइक खरीद दिया है उसी से चला जाएगा
पडोसी – और बेटी का एडमिशन
अफसर पिता – बेटी को पास के हिन्दी स्कूल में डाला है वक्त कहा है बेटी को लेकर स्कूलों में दौड लगाए।
अभिलाषा ये सुन दौड कर माँ के पास जा कहती हैं
अभिलाषा –  माँ वो हिंदी स्कूल मेरे पुराने अंग्रजी स्कूल सा नहीं मुझे वहाँ कुछ समझ में नहीं आता।
माँ जो बिल्कुल साधारण सोच की जिसने जिंदगी में परिवार को बनाने खिलाने के अलावा कोई भी आकांक्षा नहीं जताई , वो अपनी बच्ची के मन को ना समझ पायी , और कहा
माँ- अभिलाषा परेशान मत करो , ज्यादा जानने लगी हो, पापा ने कुछ सोच कर ही एडमिशन कराया होगा।
अभिलाषा उसी स्कूल में जाने लगती है और आगे की पढाई करते हुए दसवीं कक्षा में पहुंच जाती हैं।
अब उसे अपना विषय चुनना होता है अभिलाषा विज्ञान को आगे की पढाई के लिए चुनती है अब उसे पढाई में कठिन परिश्रम की अवश्यकता है सहेलियों की मदद से घर से कुछ दूर ट्यूशन की व्यवस्था होती है ।
अभिलाषा रोज सुबह 5 बजे से 9 बजे तक ट्यूशन में ही रहती  एक दिन अभिलाषा 5 बजे सुबह ट्युशन जाती है सडक पर सन्नाटा पसरा सामने से एक लडका अचानक से आ अभिलाषा से टकरा जाता और कुछ  दुर्व्यवहार कर तुरंत भाग जाता , अभिलाषा साक हो जाती आँखो में आँसू भर जाते जो कदम पढने को जा रहे थे अब वो वापस घर को लौट जाती है
अभिलाषा तुरन्त अपने माँ ,पिता ,भाई को सारी बातें कहती हैं , अभिलाषा और उसका पूरा परिवार सदमे में , अभिलाषा रोती है और सोचती आज क्या सोच जा रही थी और क्या हो गया , पिता और भाई उस लडके को खोजते पर वह दूर भाग चुका था।अभिलाषा कुछ दिनों तक घर में ही रहती हैं फिर हिम्मत कर कालेज जाना शुरू करती पर उसका पूरा परिवार डरा हुआ।अब मानो अभिलाषा के पैरों में जंजीर लग गई हो , परिवार का बार -बार कहना तुम्हें यहाँ नहीं जाना तुम्हें वहां नहीं जाना
“यहां पुरूषों को सोचने की जरूरत है कि उनके एक दुर्व्यवहार से लडकी का पूरा जीवन कितना प्रभावित हो जाता है”
अब अभिलाषा के साथ हुए इस घटना के बाद पूरा परिवार उसे कहता है –  तुम विज्ञान की पढाई छोड दो और आसान विषय ले अपनी आगे की पढाई खत्म करो, बार -बार बाहर आना जाना तुम्हारे बस की बात नही।
“अब यहां समस्या का दूसरा समाधान हो सकता था परिवार नकारात्मक रुख अपनाने के बजाए सकारात्मक और हिम्मत का साथ देता तो अभिलाषा का आज स्वपन उसकी खुशियाँ छूटती नहीं।” ऐसी परिस्थिति में माँ बेटी को हिम्मत और सहारा देती , पिता बेटी को अपनी सुरक्षा के तरीके समझाते साथ ही आगे की पढाई अपनी रूचि के अनुसार कर सके ऐसी व्यवस्था करते और ऐसी स्थिति में बहुत से परिवार ऐसा करते भी है, परिस्थियों से डर कर भाग जाना ये तो समाधान नहीं हुआ बल्कि मनचलों को बढावा देना है।”
अब अभिलाषा का पूरा परिवार मानो उसकी कुण्डली बना बैठा की अब तुम्हारे साथ यही घटना होगी, अभिलाषा को शिक्षा की स्वतंत्रता तो मिली पर अधीनता के शर्त पर,’मैं जो चाहूँ वो तुम्हे पढना हैं ,मैं जहाँ चाहूँ वहां तुम्हें पढना हैं।’
        यहां अभिलाषा की उम्र ही क्या है कि वो विरोध कर सके , अभिलाषा 10 वी, 12 वी पास कर बी. ए. मे जाती है बनारस विश्व विद्यालय में एडमिशन मिल जाता है, अभिलाषा के पिता अभिलाषा को एक स्कूटी खरीद देते हैं ताकि अभिलाषा को विश्वविधालय जाने मे आसानी हो ।अभिलाषा बहुत खुश रहती हैं , उसे विश्व विधालय का माहौल अच्छा लगता है वहां अभिलाषा के कई मित्र भी बनते हैं जिनमें लडके ,लडकियाँ भी होते हैं वे एक ही क्लास में बैठते और एक दूसरे की स्टडी में सहायता भी करते ।
एक दिन अचानक अभिलाषा बिमार हो जाती है और चार दिनों तक क्लास करने नहीं जाती , इसी बीच अभिलाषा के साथ पढने वाला लडका तत्पर अपनी कापी लेने के लिए फोन करता है
फोन की घंटी बजी ,,,,,,,,ट्रिग,,,,, ट्रिग ,,,,,,
अभिलाषा का भाई आनंद फोन उठाता है
भाई आनंद. ….हेलो कौन ?
तत्पर ……मैं तत्पर अभिलाषा का क्लास मैट अभिलाषा से बात करनी है
आनन्द. ….क्या काम है
तत्पर …..वो मेरी कापी घर लेकर चली गई वो चाहिए मुझे।
भाई आनन्द अभिलाषा को बुला फोन पकडा देता है ।अभिलाषा बात करती है और कल  विश्व विद्यालय आने की बात कहती है
       अगले दिन अभिलाषा विश्व विद्यालय जाने को तैयार होती है
अब यहाँ देखेंगे कि मात्र लडके के फोन आने से
परिवार की मानसिकता अभिलाषा के प्रति कैसे बदल जाती है ।
अभिलाषा हमेशा की तरह तैयार हो विश्व विद्यालय जाती है पर परिवार की बूढी मानसिकता देखे , जो पहले कभी नहीं टोकते आज हर बात पर टोकना शुरू कर देते। साधारण कपडे पहनने चाहिए , इतना तैयार होने की क्या जरूरत ?
अभिलाषा समझ जाती हैं ये सब तत्पर के फोन आने की वजह से हो रहा ।
भाई आनंद. ….तुम्हारा क्लास कब शुरू होता है और कब खत्म ।
अभिलाषा ……11 a.m.से शुरू और 4 p.m. पर खत्म।
अब अभिलाषा समझ जाती कि परिवार का व्यवहार बदल गया है अभिलाषा विश्वविधालय पहुच तत्पर से कुछ नहीं कहती , उसे लगता तत्पर उसके परिवार के बारे में क्या सोचेगा
क्लास खत्म होने के बाद अभिलाषा अपनी स्कूटी लेकर घर के लिए  निकलती है विश्व विद्यालय से घर आने में 40 मिनट लगते हैं पर रास्ते में ट्रैफिक होने से एक घंटे लग जाते हैं।
घर पहुचते ही अभिलाषा का भाई पूछता है इतनी देर क्यों हुई ।
अभिलाषा …..ट्रैफिक बहुत था बोल अपने रूम की तरफ जाती है ।
तभी पीछे से दौडता हुआ उसका भाई आता है उसे पकडता है उसके बाल नोच चेहरे पर कई थप्पड मारता है
अभिलाषा सकपका सी जाती , नीचे गिर जाती
अभिलाषा रोती हुई क्या हुआ ?
भाई आनंद ……दो चार लात और मारते हुए,  इसका तो दिमाग उडने लगा है
अभिलाषा. …..क्या हुआ माँ भाई क्यो मार रहा
माँ. …..इतनी देर से घर क्यों आई ?
अभिलाषा …..सडक पर जाम लगा था माँ, पहले भी तो देर हो जाती थी पर तब भाई ने कभी नहीं मारा।
माँ. ….हाँ आनन्द बहुत गुस्से में हैं , वो लडका कौन था जिसने फोन किया ।
अभिलाषा. …..माँ वो तत्पर , उसने अपनी कापी के लिए फोन किया था
माँ कुछ बडबडा के अपना काम करने लगती।
अभिलाषा. ..रोती हुई उठती, खुद को शीशे में देखती, चेहरा सुजा हुआ।
अभिलाषा सोचती ये कैसी मानसिकता एक लडके के फोन कर देने मात्र से मार दिया
     जब कालेज जाने की स्वतंत्रता दी तो इन्हें ये भी तो मालूम था कि लडके भी साथ पढते हैं तो उनसे बातें भी होगी ।
अभिलाषा चार दिनों तक विश्व विद्यालय नहीं जाती जब तक कि वो ठीक नहीं हो जाती चार दिनों बाद वह विश्व विद्यालय जाती है किसी से भी अपनी परेशानी नहीं कहती ।क्लास खत्म हो जाने के बाद घर आती है , घर के दरवाजे पर खडी घंटी बजती है , भाई दरवाजा खोलता है देखता दो लडके अभिलाषा के पीछे आ लौट जाते।अभिलाषा को इस बात का ऐहसास भी नहीं होता कोई उसका पीछा कर रहा ।
भाई आनन्द …..वो लडके कौन थे
अभिलाषा ……कौन ? मैं नहीं जानती ।
आनन्द …..तुम्हारे साथ आए थे ?तुम्हें छोडऩे?
अभिलाषा ….भाई आप ये कैसे कह सकते , आप ने देखा है कि वह मेरे साथ आए थे और पीछे आने का क्या मतलब हुआ कि मुझे छोडऩे आऐ थे , मैं तो उसका चेहरा भी नहीं देखी ।
भाई लपकते हुए अभिलाषा का बाल नोचते हुए मारता है।माँ थोडी रोकती ,बडबडाती हुई अपना काम करने लगी।अभिलाषा पुनः बिना गलती के दण्ड पा जाती।
अभिलाषा पुनः उसी दशा मे अपना दर्द कहे भी तो किससे ,वह सोचती लोग  सूने गे तो क्या कहे गे , अपने परिवार की निन्दा कर रही और भाई मारता है तो जरूर इसी की गलती होगी ।
ऐसे अनेक भय से महिलाएं चुप रह जाती है ,
यहां हमें भाई आनंद की और माँ की मानसिकता को समझने की जरूरत है भाई आनंद जो कि काफी दिनों से पढाई खत्म कर नौकरी के लिए प्रयास कर रहा पर असफलता ही हाथ लगती है जिससे वह कुंठा ग्रस्त हो जाता है और यह अभिलाषा के ऊपर हिंसा के रूप में निकालता है ।माँ भी ग्रामीण परिवेश से कम पढी लिखी कभी कालेज भी नहीं गई इस लिए कालेज के माहौल को नहीं समझ पाती और अभिलाषा के साथ न्याय नहीं कर पाती ।पिता घर से दूर नौकरी में व्यस्त बेटे पर ही घर की जिम्मेदारी छोड , केवल धन की पूर्ति में व्यस्त।
आज भी हमारे भारत में ऐसे परिवार है जिन्हे लडका -लडकी का बात करना पसंद नहीं करते उन्हें लगता है मात्र बातें करने से उनमें प्रेम सम्बंध बन सकता है और कल को शादी कर ली तो परिवार के इज्जत का क्या होगा।बहुत ही हास्यास्पद मात्र सम्भावनाओं के अनुमान से ही लोग अपनों के साथ हिंसक व्यवहार करते हैं।
अब अभिलाषा की पढाई खत्म होती है
अभिलाषा के विवाह का वक्त आता है यहां भी उसकी पसंद नापसंद की परवाह किए बिना ही उसकी शादी एक कसबे में कर दी जाती है अभिलाषा जो कि शहर में पली बडी अब एक कसबे के एक परिवार की बडी बहू बनती हैं जहाँ लगभग 98% लोग आज भी 18 वी सदी के विचारों के साथ जी रहे।अब अभिलाषा का एक नया संघर्ष शुरू होता है , अभिलाषा का पति नीरज चार भाई , चार बहनों का परिवार। अभिलाषा का पहला दिन पति के साथ और उसके परिवार के साथ बिता ।अभिलाषा को पति बहुत ही शान्त स्वभाव का माता पिता का आज्ञाकारी, और परिवार को खुश रखने वाले लगे। अभिलाषा के साथ नीरज स्नेह से रहता ।
देहाती माहौल , नई बहू अभिलाषा को लोग देखने आते हैं चिल्लाते हुए अरे कनिया कहा बिया ! अभिलाषा को कुछ समझ नहीं आता , कुछ देर बाद उसे समझ आजाता है कि वहाँ बहू को कनिया पुकारा जाता है ।देखने का कार्यक्रम खत्म होता है अभिलाषा के पास उसकी सास माँ आती हैं
सास. ……बहू कल से तुम्हारी जिम्मेदारी शुरू  सुबह 5 बजे उठ जाना ।
अभिलाषा …..सोचती हैं सोने में 2 बज गया तो 5 बजे कैसे उठूँ ।अभिलाषा जैसे तैसे कर जल्दी से 6 बजे तैयार होती हैं।पूजा कर रसोई में जाती हैं , नौकर सहित 12 कप चाय पूरे परिवार के लिए बनाती हैं साथ में चना मसाला, सुबह के 8 बजे रहते हैं , सभी को चाय और चना देती हैं , चार ननदें जो कि एक ही कमरे में सो रही हैं उनके लिए चाय और चना अभिलाषा ले जाती हैं तभी सास रूको अभी वे सो के नहीं उठेगी चारों देर से उठती हैं ।अभिलाषा रसोई में जाती हैं सास माँ से पूछती हैं आज खाने में क्या बनेगा तभी ससुर जी बोलते हैं बैगन आलू की कलौंजी और भिन्डी और रायता , चटनी और दाल , चावल।अभिलाषा नौकर सहित पूरे परिवार का खाना बनाती हैं ।10 बजते हैं ननदें भी उठ जाती हैं तभी काम करते हुए अभिलाषा का घूँघट गीर जाता है तो एक ननद माँ देखो भाभी का घूँघट गीर गया और नौकर आ जा रहे, वो ननद जो हाफ लोवर , और टी शर्ट पहने हैं वो अभिलाषा पर टिप्पणी करती हैं ।सास माँ तपाक से रसोई में आती हैं बहू सर पर पल्लू रखो , सर से पल्लू गिरना नहीं चाहिए , आज 5 बजे उठने को कही थी देर कैसे हो गई और ये साडी कैसे पहना है पल्ला बडा करो हाथ दिखना नहीं चाहिए , ब्लाउज का गला कितना बडा है अब छोटा गला बनवाना , माँ ने कुछ सिखाया नहीं क्या।सबसे पहले 5 बजे उठो, पूजा करो सबका पैर छुओ फिर कोई काम करो।
अभिलाषा सकपका सी ये क्या था ?
“यहाँ हम देखते हैं कि एक स्त्री कैसे चतुराई से दूसरी स्त्री का शोषण करती हैं।”
अभिलाषा ने अनुमान लगा लिया कि उसका आने वाला वक्त संघर्षों से भरा है वह समझ चुकी थी कि वह एक अधीनता से निकल दूसरे अधीनता में आ गई है ।और जो भी उसके सपने थे उसके पूरे होने की संभावना भी खत्म हैं।
वह आधुनिक तकनीकी युग की स्कूटी चलाती,कमप्यूटर यूज करती, नेट यूज करती पर खुद के साथ हो रहे भेद भाव , शोषण को समझती हैं वह शोषण, अत्याचार , भेद भाव, पिछडेपन, की नरक से निकलना चाहती हैं पर
वह यह भी जानती हैं कि उसके एक विद्रोह का क्या परिणाम होगा ।उसे परिवार का नाश करने वाली कह मायके भेज दिया जाए गा या परिवारिक बिखराव का दोषी करार दिया जाएगा।एक स्त्री के लिए दूसरों से संघर्ष करने से ज्यादा कठिन अपनो से संघर्ष करना होता है।आज भी स्वतंत्र आधुनिक भारत में ऐसी पढी लिखी स्त्री हैं जो परिवार के चार दीवारी में आपनी इच्छाओं का दमन कर जी रही हैं ।पर ऐसी स्त्री के संघर्ष को खत्म करने का एक ही उपाय है जब स्त्री खुद दूसरी स्त्री के प्रति संवेदनशील होगी तब तक अभिलाषा जैसी स्त्रीयों का स्वतंत्रता के लिए आधा संघर्ष खुद ही खत्म हो जाएगा और तब पुरूष स्वयम स्त्री को केवल देह नही समझेगा बल्कि स्त्रियों के अपने अस्तित्व को भी पहचानेगा।
                                               तृप्ति वर्मा
                                             गाजीपुर
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