आधी आबादी :कितनी कैद कितनी आज़ाद (वंदना गुप्ता )










कोई युग हो या कोई काल स्त्री के बिना संभव ही नहीं जीवन और संसार , जानते हुए इस अटूट सत्य को जाने क्यों कोशिशों की पुआल पर बैठ वो जारी करते हैं तालिबानी फतवे ……….ये एक ऐसा प्रश्न तो अनादिकाल से चला आ रहा है और जाने कब तक चलता रहेगा क्योंकि अभी तक तो आधी आबादी अपने होने के अर्थ को ही नहीं समझ पायी है तो अपने लिए , अपने हक़ के लिए लड़ने और फिर अपने अस्तित्व को प्राप्त कर एक इतिहास बनाने को अभी जाने कितने युग लग जाएँ . 

और जो ये ही न जानता हो उसकी कैसी आज़ादी . कैद हथकड़ी और बेड़ियों से ही नहीं होती जो दिखाई नहीं देतीं उन कैदों की जकड़न और पीड़ा अथाह होती है . छटपटाहट के भंवर में डूबते उतराते स्वीकार ली जाती है यथास्थिति और वो कब आदत में तब्दील हो जाती है कोई जान ही नहीं पाता और फिर शुरू हो जाता है अंतहीन सिलसिला पीढ़ी -दर- पीढ़ी . अब तक यही तो होता आया है मगर जब आज ज्ञान के उजाले में आधी आबादी के मुश्किल से एक प्रतिशत हिस्से ने यदि कदम आगे भी बढाया है तो भी नहीं कहा जा सकता वो कितनी आजाद हैं क्योंकि बेशक वो घर से बाहर काम करने जा रही हैं , कमा कर भी ला रही हैं मगर क्या उन्होंने पूर्ण रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है अपने घर में , समाज में , ये प्रश्न उठता है तो उत्तर में जवाब नकारात्मक ही आता है . आज भी जो स्त्रियाँ बाहर निकल रही हैं उनमे से हर तरह के निर्णय लेने में सक्षम स्त्रियों का यदि प्रतिशत ढूँढा जाए तो चौंकाने वाले आंकड़े आयेंगे क्योंकि बेशक उन्हें आज़ादी मिली है मगर उतनी ही जितनी से पितृसत्ता के दावे पर आंच न आये और उनका राज सुरक्षित रहे तो कैसे कह सकते हैं हम आज़ाद हैं वो . जब तक एक स्त्री आर्थिक के साथ मानसिक स्वतंत्रता महसूस नही करेगी और अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सचेत नहीं होगी तब तक वो कैद ही है एक अदृश्य बेड़ी  जिससे मुक्त होने के लिए उन्हें अपनी सोच के धरातल को पुख्ता बनाना होगा और उसे जीवन में क्रियान्वित करना होगा तभी वास्तव में आधी आबादी कह सकेगी आज़ाद है वो ……….फिलहाल कितनी कैद में है और कितनी आज़ाद ………जानने के लिए जरूरत है उसे अपने ही गिरेबान में झाँकने की। 
सिर्फ स्त्री विमर्श कर लेना , या शोर मचा लेना भर नहीं है आज़ादी की परिभाषा , बंधनमुक्त होने का प्रमाण । वहीँ देहमुक्ति भी नहीं है वास्तविक विमर्श या आज़ादी ख़ास तौर से उनके लिए जिन्होंने इसके अर्थ सिर्फ  देह तक ही समझे और आज भी दोहन का शिकार हो रही हैं एक प्रोडक्ट बनकर।  एक स्त्री का अपनी देह पर पूरा अधिकार है मगर उसका उपयोग एक बार फिर पुरुषवादी सोच का शिकार बन किया जाए तो ये भी एक कैद है जिसे वो अब तक जान नहीं सकी। मुक्त होना है उसे इस मानसिक शोषण से भी।  आधी आबादी होने का अर्थ क्या है वास्तव में ये जानना जरूरी है और फिर उस जानने को प्रमाणिकता से सिद्ध करना अपनी उपयोगिता के साथ ही है आज़ादी का पूरा मतलब।  
जिस दिन उसका होना स्वीकार लिया जायेगा एक बराबर के स्तर  पर अनिवार्यता के साथ समझ लेना आज़ाद हो गयी है वो उस जड़ सोच से जिसके कारण सदियों से ये पीड़ा झेलती रही ………. फिलहाल तो मंज़िल बहुत दूर है ……

वंदना गुप्ता

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