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आया सावन बहका बहका
अग्नि समीर का झटका
खत्म हो गई कठिन परीक्षा
भीगत तन मन महका
अश्रु नयन से छलका
प्रिय के लिए सज गई प्रिया
हरी चूनरी घूंघट लटका
बदरी का मन चहका
बीच बदरी के झांकते रवि का
मुख मंडल भी दमका
भीगी लता संग लतिका
झुक धरणी को नमन कर रहीं
खुशी से खुशी मिले हैं मन का
तरु नाचे कमरिया लचका
रुनक झुनुक पायलिया गाए
संग संग कंगन खनका
सतरंगी रंग ….छलका
हरियाली धरती पर बिखरी
अम्बर का फूटा मटका
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हरित बसन पहन सुन्दरी
बहे बयार उड़ जाए चुन्दरी
गिरत उठत घूंघट पट हट गये
सजना से नयना लड़ गयो रे
मन आँगन……………………..
झुकी झुकी धरती को चूम उठीं
मेघ गरज कर शंख नाद कर
मिलन धरा अम्बर भयो रे
मन आँगन…………………….
मन्त्रमुग्ध भये जुड़ गए जियरा
पुरवाई भी बहक रही
छम छम बरखा बरस गयो रे
मन आँगन………………………..
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म्हारो तन मन में लागि अगन
नयन करे दिन रैन प्रतीक्षा
अब दूरी सहा नहीं जाए रे
सखि सावन…………………
उर की तपन रह गई अभी भी
बहे पुरवाई लिए अंगड़ाई
अचरा उड़ी उड़ी जाए रे
सखि सावन…………………..
सखि संग झूलें कजरी गाई के
रिमझिम बरखा बरस बरस
नैनों से कजरा बही बही जाए रे
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आज फिर से मन मेरा भीग जाना चाहता है
छोड़कर दुनिया का क्रंदन
गीत गा बरखा के संग संग
नृत्य करना चाहता है
आज फिर से मन मेरा………………….
अपने कुछ मन की करें
सज संवर सजना के संग मन
फिसल जाना चाहता है
आज फिर से मन मेरा…………….
बहे पुरवाई प्रीत पिया संग
सखियों के संग सुर सजाकर
संग कजरी गाना चाहता है
आज फिर से मन मेरा……………..
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बारिश की बूंदो
और बेटियों में कितनी समानता है
वो भी तो बिदा होकर
बादलों को छोड़ चल पड़ती हैं
नैहर से
सिंचित करने पिया का घर
बेटियों की
तरह
सुन्दर और सुखद
उनका भी
भयभीत मन सोंचता होगा
कैसा होगा पीघर
डरता होगा
बेटियों की
तरह
ले लेती हैं बूंदें आकार
मोतियों का
और
इठलाती हैं अपने भाग्य पर
बेटियों की
तरह
दुर्भाग्य से कहीं
गिरती हैं नालों में
खत्म हो जाता उनका भी अस्तित्व
वो भी
रोतीं हैं अपने भाग्य पर
बेटियों की
तरह
याद है वो क्षण जब मेरे पिता ने मुझे डायरी दिया.था ! तब मैं कलम से कितनी ही बार लिख लिख कर काटती.. फिर लिखती फिर……… ! जब पहली बार मेरे स्कूल के पत्रिका में मेरी कविता छपी उस समय मुझे जो खुशी मिली थी उसका वर्णन मैं शब्दों में नहीं कर सकती ….!
मेरा विवाह १८ वर्ष की उम्र जब मैं बी ए के द्वितीय वर्ष में प्रवेश ही की थी कि १७ जून १९८५ में मेरा विवाह सम्पन्न हो गया ! २८ मार्च १९८८ में मुझे प्रथम पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तथा २४ मार्च १९९४ में मुझे द्वितीय पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई..!
घर परिवार बच्चों की परवरिश और पढाई लिखाई मेरी पहली प्रार्थमिकता रही ! किन्तु मेरी आत्मा जब जब सामाजिक कुरीतियाँ , भ्रष्टाचार , दबे और कुचले लोगों के साथ अत्याचार देखती तो मुझे बार बार पुकारती रहती थी कि सिर्फ घर परिवार तक ही तुम्हारा दायित्व सीमित नहीं है …….समाज के लिए भी कुछ करो …..निकलो घर की चौकठ से….! तभी मैं फेसबुक से जुड़ गई.. फेसबुक मित्रों द्वारा मेरी अभिव्यक्तियों को सराहना मिली और मेरा सोया हुआ कवि मन फिर से जाग उठा …..फिर करने लगी मैं भावों की अभिव्यक्ति..! और मैं चल पड़ी इस डगर पर … छपने लगीं कई पत्र पत्रिकाओं में मेरी अभिव्यक्तियाँ ..! पुस्तक- संयुक्त काव्य संग्रह काव्य सुगंध भाग २ , संयुक्त काव्य संग्रह सहोदरी सोपान भाग 2
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