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अनुपमा सरकार की कवितायें

  

                                                               
                                                                                                                           





 
तब्दीली
यूं ही बैठे-बैठे ख्याल आया
क्या हो गर बर्फ की चादर
बिछ जाए उस तारकोल की सड़क पर
क्या हो गर वो सूरज
भूल जाए रोज़ पूरब से खिलखिलाना
चांद न चमके पूनम पर
तारों का खो जाए फसाना
शिवली झरना छोड़ दे
बरगद की दाढ़ी बढ़ना बंद हो जाए
पीपल पर फूल खिलें
गुलमोहर के पत्ते खो जाएं
थम जाए नदियां तालाब बहने लगे
ज्वालामुखी शीतल हो जाए
बादल आग उगलने लगे
क्या हो गर भूल कर अपना पता
दरवाज़े चलने लगें
दीवारों के पंख लग जाएं
पंछी छतों पर जम जाएं
जंगल शहर में बस जाएं
गाँव टापुओं में बदल जाएं
शायद तबाही कहोगे तुम इसे
पर क्यों भला
केवल नाम ही तो बदले हैं
दुनिया चलती रहेगी वैसी ही
कहीं कोई तब्दीली नहीं !



2.       आज़ाद
ये ऊंची दीवारें लोहे के जंगले
घुमावदार सीढियां
क्या महानगर में बस यही बचा
दड़बों में ठूंसा इंसान
दम तोड़ती जीने की आशा
सोच रही थी कैसी आज़ादी
कैसा जश्न कैसा ये तमाशा
यही विचारते आंगन में चली आई
तुलसी के खिलते बीज देख
हौले से मुस्काई
यकायक नज़र गई आसमान पे
उड़ रहे थे वहां असंख्य घोड़े
उन्मुक्त गगन में सफेद पंख फैलाए
बिन आहट बिन चिल्लाहट
जैसे आक्रमण करने चले आए
पर ध्यान से देखा तो शांतिदूत थे
पवन की शीतल मलहम भी साथ लाए
धीमे धीमे से चहलकदमी करते पत्ते
मधुर सा संगीत कानों में उड़ेलने लगे
ढहने लगी दीवारें जंगले पिघलने लगे
और वो घुमावदार सीढ़ियां चमक उठीं
मानो चांद के ही पार जाने को हो बनीं
समय वही जगह वही बस नज़र फर्क हो गई
आज़ाद है प्रकृति स्वतंत्र ये मन
ये बात आज पुख्ता हो गई
ये बात आज पुख्ता हो गई



3.       बादल बिजली
बादलों संग चमचमाती बिजलियाँ
भूल जाती हैं अक्सर
परस्पर साथ रहते भी दोनों जुदा हैं
हमसफर नहीं बस हमनुमा हैं!
बादल धुआं-धुआं बन बिखरने को बने हैं
कभी हवा संग मदहोश आवारा से
कभी बूंदों संग अल्हड़ बरखा से
गरजते बरसते पल-पल जगह बदलते।
रूप रंग आकार विभिन्न
पर नियति बस वही
भाव विभोर हो बह जाना
भाव विहीन हो उड़ जाना!
चंचल दामिनी इससे ठीक उलट
बस पल भर की मेहमान
यकायक चमकती
फिर हो जाती फना जैसे
न कोई वज़ूद था न होगा
क्षण भर का जीवन
फिर लापता।
बस मेघों को चिटकाने ही
आती हो ज्यों
फिर न अस्तित्व न विचार
बस शून्य में गुम!
संगिनी होकर भी जुदा
शक्ति होते भी अर्थहीन
बादल-बिजली
हमेशा आसपास
पर संग कभी नहीं।



4.       सागर सा आसमां
सागर सा लगा आज आसमां
बादलों की लहरों से छितरा।
कभी अपने पास बुलाता
कभी भोले मन को डराता।
अजब उफान था
रूई के उन फाहों में
सिमट रहा हो दिनकर
ज्यों कोहरे की बांहों में।
धुंआ सा फैला चहुँ ओर
उम्मीदों का अरमानों का और..
और
शायद आने वाले तूफानों का
आखिर, आसमां में कश्ती चलाना
कोई आसां तो नहीं!

अनुपमा सरकार 
नाम :     अनुपमा
सरकार
इमेल :    anupamasarkar10@gmail.com
वेबसाइट : www.scribblesofsoul.com
पत्रिकाएं व् समाचारपत्र  
:  उपासना समय
, भोजपुरी पंचायत,डिफेंडर, भोजपुरी जिनगी, आकाश     
  हम शिक्षा के
मंदिरों में
, कई वर्षों की
साधना के बाद भी जो ज्ञान अर्जित नहीं कर पाते
, कभी कभी किसी किताब के कुछ पन्नों में ही पा जाते हैं।
मुंशी प्रेमचन्द जी की
निर्मलामेरे लिए जीवन का
सही रूप दिखाने वाला ऐसा ही दर्पण साबित हुआ।टैगोर और शरतचंद्र के उपन्यासों ने
पढ़ने समझने की चाहत को हवा दी और जाने अनजाने मैं भी कविताएँ कहानियाँ गढ़ने लगी।
अपने इस शौक की पूर्ति के लिए विगत
4 सालों से scribblesofsoul.com नाम का ब्लॉग भी चला रही
हूँ। लेखन में कितनी त्रुटियाँ हैं
, नहीं जानती पर शब्दों और भावों से प्रेम कूट कूट कर भरा है।


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जिस तरह एक स्वस्थ रिश्ते की नींव आपसी विश्वास और समझदारी पर टिकी होती है, उसी तरह परिवार की आर्थिक सेहत के लिए भी सूचित और सतर्क फ़ैसले ज़रूरी हैं। डिजिटल युग में नए-नए वित्तीय विकल्प लगातार उभर रहे हैं, और जो लोग इनकी बारीकियों को समझना चाहते हैं, वे अक्सर bitcoin sázení जैसे विषयों पर विस्तृत जानकारी पढ़ते हैं। हालाँकि, यह कभी न भूलें कि सट्टेबाज़ी में हमेशा जोखिम शामिल होता है और इसे कभी भी आय या पैसा कमाने के भरोसेमंद साधन के रूप में नहीं देखना चाहिए — बेहतर यही है कि ऐसे विकल्पों में केवल उतना ही शामिल हों, जितना आप खोने का खर्च उठा सकते हैं, और ज़रूरत पड़ने पर किसी जानकार से सलाह ज़रूर लें।