अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस पर विशेष : चलो चले जड़ों की ओर : वंदना बाजपेयी

जंगल में रहने वाले  मानव ने जिस दौर में आग जलाना सीखा , पत्थरों  को नुकीला कर हथियार बनाना  सीखा , तभी  शायद उसने परिवार के महत्व को समझा और यह भी समझा कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है जिसे सहज जीवन जीने  के लिए समाज , परिवार अपनों के स्नेह की छाया जरूरत है | कदाचित यही से  परिवार संस्था का जन्म हुआ | तब परिवार  का अर्थ संयुक्त परवार ही हुआ करता था | मातृ देवो भव , पितृ देवो भव् में विश्वास रखने वाले भारतीय जन -मानस ने इस व्यवस्था को लम्बे समय तक जीवित रखा । संयुक्त परिवार में स्नेह और सुरक्षा का मजबूत ताना बाना होता है । यहाँ दादी और नानी की कहानियां होती हैं ,जो हौले से बच्चों में संस्कार के बीज रोप देती है , चाचा बुआ के रूप में बड़े मित्र और साथ खेलने के लिए भाई -बहनों की लम्बी सूची । धीरे -धीरे औध्योगिक करण  के साथ रोटी की तालाश में कुछ को माता -पिता से दूर दूसरे  शहरों /देशों में जाने को विवश कर दिया वही स्वंत्रता की चाह में कुछ उसी शहर में रहते हुए माता पिता से दूर एकल परिवार में रहने लगे । यही वो समय था जब समाज नए तरीके से पुर्नगठित होने लगा ।

                                                                  वो माता -पिता जिन्होंने अपना जीवन के सब सुख त्याग कर बच्चों को बड़ा किया थ। उन्ही के बच्चों ने बुढ़ापे में दूसरों पर आश्रित रहने पर विवश कर दिया । बुजुर्ग दम्पत्तियों के लिए अपने स्वास्थ्य के साथ -साथ घर के एकाकीपन से निपटना असाध्य हो गया । सूनी पथराई आँखों में विवशता और प्रतीक्षा के अतिरिक्त कुछ नहीं बचा । जीते जी और मरने के बाद अंतिम क्रिया के लिए भी उनके हाथ बच्चों की प्रतीक्षा ही आई । दूसरी तरफ एकल परिवारों में बच्चों ने   माता -पिता की दिन भर हर काम में रोक टोक से आज़ादी  महसूस की । उन्हें लगा कि वो बिना किसी दखलंदाजी के  अपना जीवन आराम से जी सकते हैं । जो चाहे पहन सकते हैं ,कर सकते है । इसमें वो अपने माता -पिता के प्रति कठोर और कठोर होते गए ।
                                         जब -जब समाज बदलता है उसके परिणाम एक दो जनरेशन के बाद आते हैं । आज़ादी की तलाश में घर से बाहर गए उन्ही बच्चों ने जब अपने बच्चों को संस्कारों के आभाव में  बड़े होते देखा तब उन्हें अपनी गलती का अंदाजा हुआ ।खासकर जहाँ पति -पत्नी दोनों ऐसी नौकरी में उलझे थे जहाँ उनके दिन का बहुत सारा समय घर के बहार बीतता ।  स्नेह के आभाव में आयाओ या क्रेच  द्वारा पाले गए ये बच्चे बड़े घर्रों के होने के बावजूद चोरी -चकारी करते हुए पकडे गए । सारे नियम तोड़ दो की गाडी कहीं रुकी नहीं अपितु दिन दूनी रात चौगुनी रफ़्तार से आगे बढ़ने लगी । इन्द्राणी मुखर्जी जैसे किस्से इसी की देन है । बबूल पर आम की आशा व्यर्थ साबित हुई ॥
                                 आज की नव युवा पीढ़ी एक बार फिर चिंतन -मंथन के मुहाने पर खड़ी  है  । जहाँ उन्हें समझना है कि एकाकीपन मात्र बुजुर्गों की समस्या कह कर टालने का विषय नहीं है ।बुजुर्ग व् उनके द्वारा दिए गए संस्कार  वो नीव हैं जिस पर हमारा भविष्य टिका हुआ है । ये पूरे समाज की समस्या है । ऐसे बहुत से युवा हैं जो  अपने बच्चो की खातिर  वापस संयुक्त परिवारों में लौटना चाहते हैं ,या उन्हें अपने पास बुला कर उसी स्नेह भरे माहौल में रहना चाहते हैं । पर यह वही  पीढ़ी है जो स्वतंत्र वातावरण में पली है । जहाँ एक तरफ इसके दिल में “चलो चले जड़ों की ओर”  की अवधारणा में विश्वास   है । साथ ही माता -पिता के बेवजह हस्तक्षेप के विरुद्ध भी है । वही नए -नए दादी नानी बनी पीढ़ी अपने ही बच्चों को शक की नज़र से देख रही है उन्हें लग रहा है कि कहीं उनके अपने बच्चे अपने स्वार्थ वश तो उन्हें नही बुला रहे हैं । अपने बच्चों के पल जाने के बाद उन्हें वापस लड़- झगड़ कर वापस भेज दें । उनको भय है जब बुढ़ापा अकेले ही काटना है तो क्यों न जब -तक हाथ -पाँव चल रहे हैं अपना जीवन अपने हिसाब से जी लिया जाए । शायद हम सब समय के ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहाँ हम यह समझ रहे है कि हमारे बुजुर्गों की सुरक्षा व् हमारे  बच्चों में संस्कार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं  ।  और यह  न सिर्फ बुजुर्गों के लिए , बच्चों के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए हितकर है। पर मंथन का विषय यह है कि जड़ों की ओर लौटने का प्रारूप क्या  हो ?

वंदना बाजपेयी
                                                     

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