अंधेरे का खुद का कोई अस्तित्व नहीं होता,खुद का कोई बल नहीं होता,खुद की कोई सत्ता नहीं होती.
अँधेरा प्रकाश के अभाव का नाम है और सिर्फ उसी समय तक अपना अस्तित्व बनाये रख सकता है,जब तक प्रकाश की मौजूदगी न हो.अँधेरा दिखाई भले ही बहुत बड़ा देता हो,लेकिन इतना निर्बल होता है कि एक दीप जलते ही तत्काल भाग खड़ा होता है.दीपक प्रकाश का प्रतीक है और सूर्य का प्रतिनिधित्व करता है। दीपक से हम ऊंचा उठने की प्रेरणा हासिल करते हैं।
जा रही है,जिसका समाधान तलाश पाना विज्ञानं के बस की बात नहीं है.भीतर के अँधेरे से मानव जीवन की लड़ाई बड़ी लम्बी है.जब भीतर का अँधेरा छंटता है.तो बाहर की लौ जगमगा उठती है ,नहीं तो बाहर का घोर प्रकाश भी भीतर के अँधेरे को दूर नहीं कर पाता | जैसे जैसे जीवन में एकाकीपन बढ़ता है मन का अँधेरा और घना होता जाता है | कभी – कभी यह त्यौहार हमारे अन्दर के खालीपन को और बढ़ा देते हैं| क्योंकि त्योहारों में जबरन हंसने के बाद एकाकीपन और महसूस होता है | कभी अवसाद के शिकार किसी व्यक्ति से मिलिए सब कुछ होते हुए भी उसके अन्दर का अँधेरा बहुत घना होता है | भीतर की दुनिया का अँधेरा सिर्फ सकारात्मक सोच और प्रेरक विचारों से ही दूर किया जा सकता है.भीतर का अँधेरा दूर करने के लिए आत्मतत्व को पहचानना जरूरी है |सकारात्मक विचारों का प्रचार प्रसार इतना हो पूरी धरा से निराशा के अँधेरे का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाये.यहाँ सकारात्मक विचारों का अर्थ केवल अच्छा सोंच कर स्वप्नों की दुनिया में रहना ही नहीं , उनको यथार्थ में तब्दील करना है | किसी के आंसूं पोछने हैं , किसी के होठों पर मुस्कराहट लाने का प्रयास करना है | किसी एकाकी व्यक्ति से आत्मीयता के साथ उसका हाल पूँछ लेना हैं | जिससे ये सकर्त्मकता हर तरह फ़ैल जाए और मन का अँधेरा कहीं टिक न पाए | जरूरी है दीप से दीप जलाने का यह सिलसिला तब तक चलता रहे,तब तक मानव मन से अँधेरे का समूल नाश नहीं हो जाता| अंत में गोपालदास नीरज जी की कुछ पंक्तियाँ …….
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए ”
प्रधान सम्पादक
