मेरी बेटी लगती है !
बहुत प्रश्न वह करती है
भर कौतूहल आँखों में
हर नई वस्तु को तकती है !
वही सवाल उठाती है
उत्तर पा कर , याददाश्त को
वह दोषी ठहराती है !
चाहे पौरुष साथ न दे
सब कुछ करने को आतुर वह
घर में जो भी काम दिखे !
शिशु समान वह दिखतीहै
वयस तिरासी बिता चुकी है
लेकिन दो ही लगती है !
आटे की चिड़िया दे कर
चौके में बैठा लेती थी
खेल कूद में उलझा कर!
कुछ वैसे ही बहलाऊँ
छोटे छोटे बर्तन ला कर
चूल्हा – चौका करवाऊँ !
उन्हें सुरक्षित तुम रखना
हाथ -पाँव सब स्वस्थ रहें
बस बोझ किसी पर मत करना!
कितनी प्यारी दिखती है
जाने क्यूँ मुझको मेरी माँ
