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चाह कर भी वापस नहीं ले सकते

 चाह कर भी वापस नहीं ले सकते.

एक बार एक व्यक्ति ने कुछ लोगों को बाला बुरा कह दिया | बाद में गुस्सा शांत होने पर उसे दुःख हुआ कि बेकार में ही उसने कह दिया , न कहता तो सही रहता| अक्सर हमारे साथ भी तो यही होता है हम  गुस्से में अनाप -शनाप बोल जाते हैं , बाद में लगता है अरे , ये हम क्या बोल गए , ऐसा तो हम कहना ही नहीं चाहते थे | इसका मतलब तो ये भी निकल सकता है , दूसरा हर्ट हो सकता है | पर फिर कुछ हो नहीं पाता , जो हो गया सो हो गया सोंच कर पछताने के अलावा हाथ में कुछ नहीं रहता |

ऐसे ही वो व्यक्ति भी  पछता रहा था| उसने अपने दोस्तों से सॉरी भी बोली , पर वो बहुत हर्ट थे , उनका घाव हरा था , इसलिए उन्होंने मना कर दिया | अब तो उस व्यक्ति को और भी पछतावा हुआ , उसने मन में सोंचा की ये बात  उन साधू से कही जाए जो गाँव के बाहर रहते हैं | शायद वो कुछ चमत्कार कर सकें |

वो साधू के पास जा कर बोला , ” हे महात्मा मैं अपने कहे हुए शब्द वापस लेना चाहता हूँ | महात्मा ने उसकी ओर देखा और कहा , ” ठीक है पर अभी मैं व्यस्त हूँ , अच्छा सुनो , मेरा एक काम करो , वो टोकरी चौराहे पर रख दो |

उस व्यक्ति ने टोकरी उठा ली | उसमें कबूतर व् अन्य चिड़ियों के पंख भरे हुए थे | व्यक्ति ने वो टोकरी उठा कर चौराहे  पर रख दी | शाम को वो फिर साधू के पास गया | साधू ने कहा , ” वो टोकरी उठा लाओ , देखना एक भी पर कम न हों , उसके बाद मैं तुम से बात करूंगा |

व्यक्ति टोकरी लेने गया … पर वो तो खाली हो चुकी थी | सारे पर उड़ गए थे , उन्हें वापस टोकरी में भरना असंभव था | उसने साधू के पास जा कर उन्हें खाली टोकरी देते हुए कहा ,  ” लीजिये , बस ये टोकरी बची है , पंख तो सब उड़ गए , अब उन्हें किसी भी प्रकार से इकट्ठा नहीं किया जा सकता |

साधू उसकी तरफ देख कर मुस्कुरा कर बोले,  ” बस यही बात मैं तुम्हें बताना चाहता था … निकले हुए शब्द कभी वापस नहीं हो सकते , उन्होंने कहाँ पर कितना बड़ा घाव बना दिया है तुम कभी नहीं जान सकते |

अब तुम चाह  कर भी अपनने शब्द वापस नहीं ले सकते … पर आगे से सोंच कर जरूर बोल सकते हो |

प्रेरक कथाओं से

टीम ABC

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