दिल्ली
मान्या तो पेट पकड़ पकड़ कर हंसी से दोहरी हुयी जा रही थी ।
प्रेरणा आँखे फाडे अचंभे से उन्हें देखते हुए बोली,”अरे क्या हुआ,ऐसे क्यों हँस् रहे हो तुम दोनों “
पर दोनों की हंसी तो रुकने का नाम ही नही ले रही थी।
प्रेरणा ने निखिल का मुँह अपने हाथ से टाइट दबाकर उनकी हंसी रोकते हुए बेटी से पूछा,
” बाबू प्लीज़ बताना ,क्या हुआ ऐसा,जो तुम हँस रहे हो,
क्या मेरे चेहरे पर कुछ लगा हुआ है ।”
बमुश्किल हंसी रोकते हुए मान्या बोली,”मम्मा आप क्या कर रहे थे “
मैं ,मैं ,नही तो, कुछ भी नही,बस माला ही तो फेर रही थी,प्रेरणा मासूमियत से बोली।”
अरे मम्मा ,
की आवाज आई ,तो मैं धीरे से आपके पास आकर सुनने लगी, मैंने चुपचाप पापा को इशारे से बुलाया और तब से दोनों बड़ी मुश्किल से हंसी रोककर बैठे है..
“यह मम्मी कोनसी देवता आ गयी”
राम ,कृष्ण, महावीर या भिक्षु भी तो इंसान ही थे,
अपने कर्म से वो भगवान बने ।
और आज सब उन्हें पूजते है ।
तो माँ कहीँ भगवान से कम है क्या, उनकी माला तो सबसे पहले फेरनी चाहिए ।
वो किसी भी देवता से कम नहीं…
