दो स्तन




ये महज कविता नही वरन रोंगटे खड़े करता एक भयावह यथार्थ है।


रंगनाथ द्विवेदी


कुछ भिड़ झुरमुट की तरफ देख,
अचानक मै भी रुक गया——–
और जैसे ही मेरी नज़र उस झुरमुट पे पड़ी,
उफ!मेरे रोंगटे खड़े हो गये,
एक पैत्तीस साल की औरत का———–
विभत्स बलात्कार मेरे सामने था,


उसके गुप्तांग जख्मी थे,
और उससे भी कही ज्यादा जख्मी थे—–
उसके वे दो खुले स्तन।
जिसपे पशुता के तमाम निशान थे,
नोचने के,खसोटने के,दाँतो के
बहुत मौन थे,
लेकिन ये मौनता एक पिड़ा की थी,
क्या?इसिलिये ईश्वर ने दिया था,
इस औरत को———-
कि कोई अपनी पशुता से छिन ले,मसल दे
इसके दो स्तन।
जब पहली मर्तबा इसके बलात्कारी ने भी पिया होगा,
अपनी नर्म हाथो से बारी-बारी——-
अपनी माँ का दो स्तन!
तब इनमे दुध उतरा था,
क्यूं ?नहीं दिखा आखिर—–
मसलते,कुचलते,नोचते वक़्त,
शायद देखता तो कांप जाता,
क्योंकि इसकी अपनी माँ के भी थे—–
यही दो स्तन।
इतना ही नही गर कल्पना करता,
तो इसे दिखता————
अपने ही घर मे अपनी बुआ,अपनी चाची
और सीने पे दुपट्टा रंखे अपनी बहन के–
इसी बलात्कार की गई औरत की तरह,
दुपट्टे के उस तरफ भी तो लटके है एै”रंग”—–
यही दो स्तन।
@@@रचयिता—–रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।



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