आईये हम लंठो को पास करते है ( व्यंग्य )



आईये हम लंठो को पास करते है ( व्यंग्य )







-रंगनाथ द्विवेदी
अब इस देश मे वे दिन नही जब हम अन्य विज्ञापनो की भांति ही ये विज्ञापन भी अपने टेलीविजन या अखबारो मे लिखा हुआ देखेंगे कि “आईये हम अपनी शिक्षण संस्था से लंठो को पास करते है”।
योग्यता बाधा नही परसेंटेज के हिसाब से सुविधाएँ उपलब्ध,हमारी विशेष उपलब्धि व आकर्षण है कि “हम अपना नाम न लिख पाने वाले छात्र को भी पूरे प्रदेश या राज्य मे टाप करवाते है”। इस तरह के तमाम पीड़ित व कमजोर छात्र मौके का लाभ उठा आज तमाम बड़ी नौकरियो में अपनी सफलता पूर्वक सेवाये दे रहे है।
इन लोगो के जीवन कौशल व उपलब्धि की छटा अद्भूत है,कल हमारे ही कुछ सफल तथाकथित छात्रो को ये समाज नकारा और बेकार कहता था,आस-पास के लोग अपने बेटो को इनसे दूर रहने की सलाह देते थे। आज उन्हीं के वे तमाम उज्ज्वल बेटे स्याह से भी ज्यादा स्याह हो गये है”बेरोजगारी ने चेहरे का सारा लालित्य छिन लिया है”।

जबकि हमारी संस्थान से निकले छात्र–“हृष्ट-पुष्ट गेहूँ की तरह लाल हो गये है रेमंड की शर्ट,रेडचीफ की सैंडल और कार से उतरती उनकी सुदंर पत्नियाँ एैसे उतरती है कि देखते बनता है”।उन्हीं के गाँव-गिराव के वे मित्र जो कभी इनसे दूर रहने के लिये अपने पिता के फरमानो का अक्षरशः पालन करते थे आज अपने उसी सफल मित्र के इस जीवन शैली को देख आह!भरते है और उनके मन की सड़क पे पीड़ा के बुलडोज़र के गुजर जाने का सा ऐहसास होता है।

तमाम कार्यालय,आफिस कुकुरमुत्ते की तरह खुले पड़े है बस लेकिन हमारे कार्य करने का तरिका “फ्राड के श्रेष्ठ नासा के वैज्ञानिक की तरह है”।”यहाँ तमाम तरह की शैक्षणिक खरिदारी की जा सकती है”।हर रेट वय मे सुविधाएँ उपलब्ध है हम अपने ग्राहक की सुविधा का ध्यान रखते है।हमारा ये रैकेट विश्वसनीय व खरा है,हमारे यहाँ तमाम तरह के वर्कर हर जगह जुगाड़ बिठाने मे लगे रहते है अर्थात ये फिल्ड वर्क देखते है।इस फिल्डवर्क करने वालो को साम-दाम-दंड-भेद जैसे भी अपना काम निकलवाने के लिये,किसी भी तरह के हथकंडे अपनाने की सुविधा इन्हें होती है।

इस तरह की सुविधाओ से उन नियुक्त करने वाले अधिकारियो व मंत्रियो की सटीक विश्वस्त गोपनीय सुविधा मुहैया करा पैसे के साथ “उनकी पचास साल की उम्र मे हफ्ते-पन्द्रह दिन पे एक खूबसूरत बीस-पच्चीस साल की लड़की उनके आवास या कमरे पे भेज इनके अंग-प्रत्यंग की थिरैपी व मसाज के साथ कामासन कराते है” जिसका परोक्ष लाभ हमारी संस्था पाती है।

“इतने सारे कलात्मक पापड़ बेलने के बाद तब हमारी ये संस्था चल व निखर रही है”।बस हमे और हमारी इस संस्था को उस कालजई निर्णय का राष्ट्रीय इंतजार है,जब सरकार हमें बाकायदा इस तरह के विज्ञापन करने का लाइसेंस दे देगी और हम बाईज्जत टेलीविजन या अखबार मे इस तरह हेडिंग के साथ ये विज्ञापन लगा सकेंगे कि……….


“आईये ये शैक्षिक संस्था लंठो को पास करती है “


रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।

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