क्या आप ने महसूस किया है की जब हम किसी अपने को अपना दर्द सुनाते हैं तो कई बार वो इस तरह से सुनते हैं की उनके हाव – भाव बता देते हैं की वो बहुत बोर हो रहे हैं | कई बार बात बीच में ही काट कर अपनी राय दे देते हैं और कुछ जल्दी से हाँ में हाँ मिला कर किस्सा ही खत्म करना कहते हैं | या हम जब किसी अपने को अपना दर्द सुनाते हैं तो वो बहुत जजमेंटल हो जाता है | जिससे सुनाने वाले को लगता है की उसकी तकलीफ का मजाक उड़ाया जा रहा है |और अपनों के होते हुए भी अपनापन कम होता जा रहा है |शायद इसी लिए हम सब कितना दर्द सीने में दबाये हुए एक हमदर्द ढूंढते रहते हैं | और बंद होंठों के अंदर ही अंदर चीख – चीख कर कहते हैं ” कोई तो हो जो सुन ले ”
कोई तो हो जो सुन ले
क्या आप ने महसूस किया है की जब हम किसी अपने को अपना दर्द सुनाते हैं तो कई बार वो इस तरह से सुनते हैं की उनके हाव – भाव बता देते हैं की वो बहुत बोर हो रहे हैं | कई बार बात बीच में ही काट कर अपनी राय दे देते हैं और कुछ जल्दी से हाँ में हाँ मिला कर किस्सा ही खत्म करना कहते हैं | या हम जब किसी अपने को अपना दर्द सुनाते हैं तो वो बहुत जजमेंटल हो जाता है | जिससे सुनाने वाले को लगता है की उसकी तकलीफ का मजाक उड़ाया जा रहा है |और अपनों के होते हुए भी अपनापन कम होता जा रहा है |शायद इसी लिए हम सब कितना दर्द सीने में दबाये हुए एक हमदर्द ढूंढते रहते हैं | और बंद होंठों के अंदर ही अंदर चीख – चीख कर कहते हैं ” कोई तो हो जो सुन ले ”