गाँव के बरगद की हिन्दी छोड़ आये





रंगनाथ द्विवेदी।
शर्मिंदा हूं—————-

सुनूंगा घंटो कल किसी गोष्ठी में,
उनसे मै हिन्दी की पीड़ा,
जो खुद अपने गाँव मे,
शहर की अय्याशी के लिये——–
अपने पनघट की हिन्दी छोड़ आये।


गंभीर साँसे भर,
नकली किरदार से अपने,
भर भराई आवाज से अपने,
गाँव की एक-एक रेखा खिचेंगे,
जो खुद अपने बुढ़े बाप के दो जोड़ी बैल,
और चलती हुई पुरवट की हिन्दी छोड़ आये।


फिर गोष्ठी खत्म होगी,
किसी एक बड़े वक्ता की पीठ थपथपा,
एक-एक कर इस सभागार से निकल जायेंगे,
हिन्दी के ये मूर्धन्य चिंतक,
फिर अगले वर्ष हिन्दी दिवस मनायेंगे,


ये हिन्दी के मुज़ाहिर है एै,रंग———
जो शौक से
गाँव के बरगद की हिन्दी छोड़ आये।




@@@आप सभी को हिन्दी दिवस की ढ़ेर सारी बधाई।





रंगनाथ द्विवेदी का रचना संसार
अलविदा प्रद्युम्न – शिक्षा के फैंसी रेस्टोरेंट के तिलिस्म में फंसे अनगिनत अभिवावक



जिनपिंग – हम ढाई मोर्चे पर तैयार हैं


आइये हम लंठों को पास करते हैं

Share on Social Media

Comments are closed.

error:
WordPress Repository Meritking Giriş: Meritking Giriş Adresi Marsbahis Giriş: Marsbahis Güvenilir Mi Mavibet Giriş: Mavibet Para Yatırma Ve Çekme İşlemleri कुल्हड़ भर इश्क -बनारसी प्रेम कथा नव वर्ष यानी आपके हाथ में हैं नए 365 दिन माउथ ऑर्गन –किस्सों के आरोह-अवरोह की मधुर धुन Social Stream for WordPress — Add Facebook Youtube Instagram Feed to WordPress Tax Exempt by user & user role for WooCommerce Bundle FlipBook WordPress Plugin Crawler – Ticker Plugin for Elementor Bookly Multisite (Add-on) Interactive World Map for Elementor – Mapper Active eCommerce POS Manager Add-on 3D Carousel Addon for WPBakery Page Builder (formerly Visual Composer) VOIP Pricing Calculator | VOIP Calling Rates, SMS Rates, Mobile Top Up Rates Table/Calculator Button Menu