ही रेत
में
नहीं कब ………….
अम्मा ने
था शिवोपासना का महत्त्व
-पार्वती सा होता है
-पत्नी का बंधन
केश गूँथते हुए
दिया था मेरा मन
लिए
अनदेखे -अनजाने ही
लगने लगे थे
-परिचित
तभी से
हो गया था
समर्पण
लिए
तुम थे अलमस्त
-डंडा खेलने में
नंगे पाँव
हो गयी थी मेरी यात्रा
की तरफ
लिए
तुम किशोरावस्था में
के साथ
चौराहे नुक्कड़
पर
ले रहे थे जीवन का
जला रही थी
सा दिया
के नीचे
लिए
तुम सफलता के हिमालय पर
के लिए
रहे थे
-चोटी का जोर
शुरू कर दिए थे
सोमवार के व्रत
लिए
अनदेखा -अंजाना
निभाने के बाद
अग्नि को साक्षी मान मंत्रोच्चार के साथ
था तुम्हारे जीवन में प्रवेश
से
की छन -छन से
की खन -खन से
की बिंदियाँ से
की मेहँदी से
और रंग में ढलती ही रही हूँ
लिए
-जब सूखने लगा तुम्हारा जीवन
और दर्द की ऊष्मा से
भरने को दरारे
की बदली बन बरसी हूँ
लिए
क्यों यह प्रश्न
है
सम मन में
बता भी दो ना
बचपन से लेकर आज तक
मन में भी रहा है
ही समर्पण
लिए.………………
उत्सव मनाते
लोगों में
लाल गुलाबों के
आदान-प्रदान के बीच
मैं गिन रही हूँ
वो हज़ारों अदृश्य
लाल गुलाब
जो तुमने मुझे दिए
मुझे आराम करने की
हिदायत देकर
रसोई में आंटे की
लोइयों से जूझते हुए
रोटी जैसा कुछ बनाने की
असफल कोशिश करते हो
दूर ना कर पाने की
विवशता में
अपनी डबडबाई आँखों को
गड़ा देते हो
अखबार के पन्नो में
“मेरा-परिवार ” और “तुम्हारा-परिवार”
के स्थान पर
हमेशा कहते हो “हमारा-परिवार”
जब तुम झेल जाते हो
मेरी नाराज़गी भी
और मुस्कुरा कर कहते हो
“आज ज़यादा थक गई हैं मेरी मैडम क्यूरी “
डाली से टूटा लाल गुलाब
क्योंकि मेरा
लाल गुलाब सुरक्षित है
तुम्हारे हिर्दय में
तो ताज़ा होता रहता है
हर धड़कन के साथ।
प्रेम कविता
पर लिख ही नहीं पायी
ढालना चाहती थी ,उस गहराई को
पर शब्द कम पड़ गए
उकेरना चाहती थी ,उस गम्भीरता को
पर वाक्य अधूरे छूट गए
अपने मन के वो भाव
जब तुम्हारे साथ
खाना खाने की प्रतीक्षा में
दिन -दिन भर भूखी बैठी रही
डिश बनाने के लिए
सुबह से ले कर रात तक
हल्दी और तेल लगी साडी में
नहीं सुध रही
अपने बाल सवाँरने की
और फोन न उठाने पर
चिंता और फ़िक्र में
डबडबाई आँखों से तुम्हारी कुशलता हेतु
मान लेती हूँ निर्जला व्रत
कुशल संचालन में
घडी की सुइयों के मानिंद
बिना उफ़ किये ,चलती रहती हूँ
चौबीसों घंटे ,बारहों महीने
अनवरत -लगातार
सुबह से शाम तक न जाने
कितनी प्रेम कवितायेँ लिखती हूँ मैं
जो तैरती है हमारे बीच हवा में
बजता है जिनका संगीत
घर के कोने -कोने में
पर नहीं पहना पाती
उन्हें शब्दों के वस्त्र
क्योंकि मेरा प्रेम
सदा से था ,है और रहेगा
मौन ,अपरिभाषित और अव्यक्त
आँखों में अश्रु लिए
एक ही जीवन में दो जन्मों के
मध्य का पुल पार कर जब लाल जोड़े में
प्रवेश किया था तुम्हारे घर में
तब से
अपनी लाल बिंदियाँ पर
सजाया है परिवार का मान
लाल चूड़ियों की धुरी पर रख कलाई
निभाएं है असंख्य कर्तव्य
पैरों में लगी लाल महावर से
रंगती रही हूँ ,तुम्हारी जिंदगी,
अनंत बार बांधें है मन्नत के लाल धागे
तुम्हारी छोटी -छोटी ख़ुशी के लिए
पर जब भी जुड़े हैं
यह दो हाँथ अपने लिए
माँगा है ,बस इतना ही
की विदाई की बेला में
जब पार करू
दो जन्मों के मध्य का पुल
तब तुम आँखों में
दो बूँद प्रेम के अश्रु लेकर
भर देना मेरी मांग पुनः
लाल सिन्दूर से
ऊपर से नीचे तक
और
पूरा हो जाये मेरा
“लाल से लाल “तक का सफर
वंदना बाजपेयी
Comments are closed.