१)अधूरापन देता है हर पल पूर्णतया से जीने की प्रेरणा
बालकनी में बैठी अपने ख्यालों में खोयी हुई थी | तभी एक करीबी रिश्तेदार के बच्चे का फोन आया | फॉर्मल बातें करने के बाद उसने गिनाना शुरू किया की उसके
जीवन में यह कमी है , वो कमी है | इसलिए उसका काम करने का मन नहीं करता |जरा गौर से सोंचिये की ये उसकी ही नहीं कहीं न कहीं
हम सब की परेशानी होती है जहाँ कोई कमी दिखी अधूरापन दिखा बस हार मान कर बैठ गए |
फिर जिंदगी से लगे शिकायत करने या फिर यूं ही उसे घसीटने |
पड़ी | नन्हा रिशु बहुत देर से अपनी माँ को परेशांन कर रहा था | अचानक माँ को ख्याल आया | उन्होंने
एक खाली बाल्टी रिशु के आगे रख दी और रिशु को एक खाली कटोरी दे कर कहा ,” रिशु नल खोल कर इस बाल्टी को
कटोरी से पानी ला –ला कर भरो | रिशु पूरी तन्मयता से काम में जुट गया | खाली
बाल्टी ने उसे एक उद्देश्य दे दिया था … उसे भरने का |
उत्तर मिल गया | हम अक्सर अपनी जिंदगी में
किसी खालीपन या कमी की शिकायत करते है | उसे उत्साहहीनता का कारण मानते हैं |पर अगर तस्वीर को पलट कर
देखे तो ये कमी ही हमारे लिए प्रेरणा का काम करता है | जिससे हम उस कमी को पूरा करने में पूरी
ताकत झोंक देते हैं | कहीं न कहीं यह हमारे ऊपर है की हम उस अधूरेपन से निराश हो
कर हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाते हैं या उसे अपने जीवन के उद्देश्य में उत्प्रेरक के
रूप में इस्तेमाल करें |
अगर आप ध्यान दीजिए तो आदमी को भी काम करने के लिए प्रेरित ही यह कमी करती है। कोई
भी कदम, हम इस खालीपन को भरने की दिशा में ही
उठाते हैं। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्य जीवन भर असंतुलित को संतुलित करने में लगा रहता है | और तो और हमें भूख भी तभी लगती है जब ताकत की कमी महसूस हो रही हो | आप किसी भी घटना को ले लीजिए हर घटना के पीछे किसी न किसी कमी को पूरा करने का कारण छिपा होता है यहाँ तक की परोपकार व् आतंकवाद के पीछे भी | कोई व्यक्ति किस तरह के कपड़े पहनता है,किस तरह के रंग पसंद करता है | किस तरह कि किताब पढन या गाने सुनना पसंद करता है, किस तरह का कार्यक्रम देखना पसंद करता है और कैसी संस्था से जुड़ा है ये सब अपने जीवन की उस कमी को दूर करने से सम्बंधित है। अभी कुछ समय पहले एक कैंसर के मरीजों के वेलफेयर संसथान में जाना हुआ | ज्यादातर स्वयंसेवी वो थे जिन्होंने कैंसर से अपने किसी प्रियजन को खोया है | वो किसी और कैंसर पेशेंट की सेवा करके अपने जीवन की कमी पूरा करना कहते हैं |
दंपत्ति ने अपने तीनों बच्चों को खो दिया | उन्होंने अपनी आँखों के सामने अपने बच्चों को लहरों द्वारा लीलते
देखा | इस हृदयविदारक घटना के बाद उन्हें अपना जीवन बेमानी लगने लगा | बाद में
उन्होंने सुनामी में अनाथ हुए बच्चों को गोद लेने का मन बनाया | उन्होंने कई
बच्चों को गोद लिया | उनके जीवन को उद्देश्य मिला व् बच्चों को माता –पिता का
प्यार |
देखा जाए तो अगर कमी ना हो तो ज़रूरत नहीं
होगी, तो जोश और जूनून से काम करने की ज़रूरत नहीं होगी तो आकर्षण नहीं होगा, और अगर आकर्षण नहीं होगा तो लक्ष्य भी नहीं होगा |अक्सर देखने में आता है की दो बच्चे
जो समान रूप से इंटेलिजेंट होते हैं पर अलग –अलग आर्थिक स्तिथि के होते हैं उनमें
से प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल करने की अदम्य इच्छा आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थी की होती है क्योंकि वह सफल होकर धन से वह सब
वस्तुएं प्राप्त करना चाहता है | यह कमी उसके लिए प्रेरणा का काम करती है और वह
लक्ष्य पर फोकस कर पाता है | जबकि संपन्न छात्र जिन सुविधाओं को पहले से भोग रहा
होता है | उन्हीं को प्राप्त करने के लिए बहुत मेहनत करने की प्रबल इच्छा शक्ति उसके अन्दर नहीं होती
| हां वह किसी और दिशा में आगे बढ़ना चाह सकता है | क्योंकि
कमियां सबके जीवन में होती हैं बस
उसके रूप और स्तर अलग-अलग होते हैं। और इस दुनिया का हर काम उसी कमी को पूरा करने
के लिए किया जाता रहा है और किया जाता रहेगा। चाहे जैसा भी व्यवहार हो, रोज का काम हो, ऑफिस जाना हो, प्रेम सम्बन्ध हो या किसी से नए रिश्ते बनाना हो| सारे काम जीवन के उस खालीपन को भरने कि दिशा में
किये जाते है। ये ज़रूर हो सकता है कि कुछ लोग उस कमी के पूरा हो जाने के
बाद भी उसकी बेहतरी के लिए काम करते रहते हैं।
३)अधूरेपन पर मैस्लो के पिरामिड
के नाम से जाना जाता है | उन्हें इस प्रकार से क्रम बद्ध कर सकते हैं …..
ऐसी सुनने में आती हैं जहाँ लोगों ने अपने जीवन की कमियों को अपनी ताकत में
बदला हैं और जिसके कारण आज वो विश्व प्रसिद्द हैं | जैसे अल्बर्ट आइंस्टीन और
अब्राहम लिंकन स्टीफेन हॉकिंग , निक व्युजेसिक आदि | अभी हाल में मेरी फ्रेंड लिस्ट में जुडी केतकी जानी का नाम मैं विशेष रूप रूप से लेना चाहूँगी | जिन्होंने एलोपेसिया से अपने सारे बाल गंवाने के बाद mrs india में भाग लिया व् विशेष पुरूस्कार भी पाया | वो लगातार एलोपेसिया से उपजी हीन भावना से जूझ रहे लोगों के लिए काम कर रही हैं | इससे पहले व् सामान्य नौकरी पेशा स्त्री थी | उनके जीवन की कमी ने उन्हें कुछ खास करने को प्रेरित किया |
४)अधूरापन अभिशाप नहीं है
प्रधानमंत्री मोदी ने विकलांग व्यक्तियों को दिव्यांग नाम दिया है | आपने
भी महसूस किया होगा की विकलांग व्यक्ति के किसी अन्य अंग में अद्भुत छमता उत्पन्न
हो जाती है | एक अंग की कमी दूसरे अंग के अत्यधिक विकास की प्रेरणा बनती है |
के जीवन में कहीं न कहीं अधूरापन है | हम अगर उसे नकारात्मक तौर पर लेते हैं तो हम
सफल होने का एक अवसर खो देते हैं | अगर
इंसान चाहे तो अपने जीवन के अधूरेपन को ही अपनी प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत बना
सकता है ।निराशा से इतर गौर करने की बात यह है की जो अधूरापन हमें जीवन में कुछ कर गुजरने की
प्रेरणा दे,
भला वह बुरा कैसे हो
सकता है।वैसे तो जीवन के हर क्षेत्र में कहीं न कहीं अधूरापन रहता ही है | पर जरूरत है हम समझें की हमें अपने जीवन में ये अधूरापन सबसे ज्यादा कहाँ महसूस हो रहा | जिसके कारण जीवन में बेचैनी है | सबसे पहले काम उस पर करना है | प्रयास करना है की वो अधूरापन भर जाए | अगर ऐसा है तो दूसरा क्षेत्र खोजिये वहां पूरा करने का प्रयास करिए | ये जीना का उद्देश्य भी है और जीने का मज़ा भी | वैसे जितने रचनात्मक लोग होते है उनका अधूरापन कभी भरता ही नहीं है | यही उनको और अच्छा काम करने की प्रेरणा देता है | जैसा की जिगर मुरादाबादी कहते हैं …
अगर ऐसा है तो शुक्रिया कहिये उस अधूरेपन को जिसे आप अभिशाप समझ रहे थे वो तो आपके जीने की प्रेरणा है |
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