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बनाए रखे भाषा की तहजीब

यूँ तो भाषा अभिव्यक्ति का एक माध्यम भर है |पर शब्द चयन , बोलने के तरीके व् बॉडी लेंग्वेज तीनो को मिला कर यह कुछ ऐसा असर छोडती है की या तो कानों में अमृत सा घुल जाता है या जहर | सारे रिश्ते बन्ने बिगड़ने की वजह भी ये भाषा ही है | कुछ बोलना ही नहीं सही तरीके से बोलना भी जरूरी है | 
         एक स्कूल टीचर होने के कारण सदा से बच्चो को ये पढ़ाती रही कि अच्छे शब्द और
प्रेम भरी वाणी से आप न केवल खुद आनंदित होते हैं अपितु दूसरों को भी भावनाओं के
सागर में डुबो देते हैं | सुबह के समय किसी के द्वारा चेहरे पर एक मीठी मुस्कान के
साथ कहा गया “गुड मॉर्निंग “ एक ताज़ा हवा के झोंके की तरह पूरे दिन को
सुगंधित  कर देता है | अक्सर सोचती हूँ
क्या जाता है किसी का इतना सा कहने में जो किसी का दिन बना दे | पर हकीकत कुछ अलग
ही है |

क्या आपने कभी लोगों की भाषा पर ध्यान दिया है ? अभद्र और अश्लील भाषा का प्रयोग रोजमर्रा की
जिंदगी का अंग बन गया है | बात –बात पर एक दूसरे को गाली देना एक लकाब  जैसा बन गया  है | पुरुष अनौपचारिक बातचीत करते समय अभद्र
भाषा का प्रयोग बहुतायत से करते हैं | पर क्या ये सही  समाज का आइना है ?


        
गुस्सा ,तनाव या रोज़मर्रा की परेशानियाँ  कब नहीं थी| इनकी ढाल बना कर अभद्र भाषा के
प्रयोग को सही नहीं सिद्ध किया जा सकता | मेरे विचार से तो इसमें घरों में पीढ़ी दर
 पीढ़ी चली आ रही अभद्र भाषा के प्रयोग का
योगदान हैं | बच्चा पहले घर से सीखता है | माता –पिता पहले शिक्षक होते  हैं | अगर वो सही भाषा का प्रयोग करेंगे तो
बच्चे भी सही भाषा ही सीखेंगे |



 मुझे एक वाकया याद आ रहा है | हमारे पड़ोस में एक
भरा –पूरा परिवार रहता था | उस परिवार के मुखिया बात –बात पर अभद्र भाषा का प्रयोग
करते थे |घर की छोटीबड़ी महिलाओं को भद्दी गालियाँ देकर आवाज़ लगाते थे | लगातार
सुनते –सुनते एक दिन परेशान होकर मैं उनकी धर्मपत्नी से  पूँछ ही बैठी कि ऐसी भाषा आप के यहाँ क्यों बोली
जाती है | वह बड़ी सरलता से हँसते हुए बोली “अरे छोड़ न ! टू क्यों टेंशन लेती है |
इनकी तो आदत है हमारे घर में गालियाँ देकर ही बात की जाती है और कोई बुरा भी नहीं
मानता | मैं उनका उत्तर सुन कर अवाक् रह गयी क्योंकि किसी संभ्रात परिवार में ऐसी
वीभत्स  भाषा का प्रयोग नहीं किया जाता|
नतीजा यह हुआ कि उनके घर में छोटे बड़े बच्चे जब भी आपस में  लड़ते तो एक दूसरे
 को जी भर के गालियाँ देते | मुझे तो भय लगने लगा कि
उनकी आने वाली नस्ल भी अपनी तोतली जुबान में ऐसी ही गन्दी भाषा का प्रयोग करेगी
…… “अले मम्मी टुम टो
 बिकुल …..”

    मेरा
परिवार तेरा परिवार कह कर हम इस प्रकार की भाषा को उचित नहीं ठहरा सकते |
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है हमारी बात व्यवहार  का असर हमारे बच्चों पर ,और उनसे दूसरे बच्चों
पर पड़ता है |  अभद्र भाषा किसी संक्रामक
बिमारी की तरह बढती है | इसे अपने स्तर पर ही रोक लेना बहुत जरूरी है नहीं तो एक
मछली पूरे तालाब को गन्दा करती  है की
तर्ज़  पर 
एक व्यक्ति की अभद्र भाषा पूरे समाज को प्रदूषित  कर सकती है |

 समाज में   स्वस्थ और मिठास  से ओत –प्रोत 
भाषा को संचालित करना हमारा परम कर्तव्य होना चाहिए | इसकी शुरुआत तो घर से
ही हो सकती है | बात करते समय सभी का सम्मान करना चाहिए चाहे वो परिचित हो या
अपरिचित | हम जब भी बोले शालीनता से बोले |यदि हम अच्छी भाषा का प्रयोग आज और अभी
से करेंगे तो पायेंगे कि इसका  सुनहरा जादू
पूरे समाज में खुशबू की तरह फ़ैल गया है |


    गुस्से
और तनाव को परे धकेलकर ,ठन्डे दिमाग से सोच समझ कर बातचीत का प्रयोग सुन्दर सभी व्
शालीन भाषा में करे तो हमारे जीवन के मायने ही बदल जायेंगे और मुंह का जायका भी
बदल जाएगा | भाषा के जादुई असर इ रिश्ते –नाते भी मज़बूत हो जायेंगे | याद रखिये
अगर आपकी भाषा रोशोगुल्ला ( रसगुल्ला ) की तरह मीठी –मीठी हो तो देखिएगा लोग कैसे
मखियों की तरह आप के आस –पास मंडराएंगे | क्यों न हम प्राण लें कि हम सदा मीठी
वाणी का ही प्रयोग करेंगे  ,साथ ही धयान दे
कि हमारे आस –पास कोई गलत भाषा का प्रयोग तो नहीं कर रहा है | अगर ऐसा है तो उसे
प्यार से समझाए |और समझाइये की भाषा की कोयल और कौवे में फर्क होता है |सही तरीके से बोलेन ताकि रिश्तों में काँव  – कांव की जगह कुहू कुहू के मीठे स्वर गूंजे | 




श्रीमती स .सेनगुप्ता 

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जिस तरह एक स्वस्थ रिश्ते की नींव आपसी विश्वास और समझदारी पर टिकी होती है, उसी तरह परिवार की आर्थिक सेहत के लिए भी सूचित और सतर्क फ़ैसले ज़रूरी हैं। डिजिटल युग में नए-नए वित्तीय विकल्प लगातार उभर रहे हैं, और जो लोग इनकी बारीकियों को समझना चाहते हैं, वे अक्सर bitcoin sázení जैसे विषयों पर विस्तृत जानकारी पढ़ते हैं। हालाँकि, यह कभी न भूलें कि सट्टेबाज़ी में हमेशा जोखिम शामिल होता है और इसे कभी भी आय या पैसा कमाने के भरोसेमंद साधन के रूप में नहीं देखना चाहिए — बेहतर यही है कि ऐसे विकल्पों में केवल उतना ही शामिल हों, जितना आप खोने का खर्च उठा सकते हैं, और ज़रूरत पड़ने पर किसी जानकार से सलाह ज़रूर लें।