हो आप…’
कब आई. कोई
खबर भी नही. अचानक
से कैसे…?’
एग्ज़ाम ख़त्म हो गये तो सोचा क्यूँ ना घर आ कर
आपको सर्प्राइज़ दूं. क्यूँ? कैसा रहा सर्प्राइज़…?’
वातावरण में हँसी की गूँज.
का रायता…’
हँसी के ठहाके…
नानू के घर जाने का मन है..’
चहकते हुए बोल उठीं…
दोनो माँ बेटी ने खाना शुरू ही किया था कि, फोन
की घंटी बजी.
कौन..?’
सिविल अस्पताल से बोल रहा हूँ. सड़क
दुर्घटना में एक व्यक्ति को गंभीर चोटें आई हैं और उनकी जेब से मुझे आपका नंबर मिला इसलिए आपको फोन मिला दिया. क्या
आप उन्हें जानती हैं.’
इस नाम के किसी भी व्यक्ति को नही जानती.’
अर्चना ने फोन रख दिया..
नंबर था.’
सुबह अर्चना घर से ये कह कर निकली कि, ज़रूरी
काम से शहर से बाहर जा रही हूँ. शाम
तक लौटूँगी.
के ग्यारह बज रहे हैं. अर्चना
अस्पताल में दाखिल हुई…
नाम अर्चना है कल राकेश नाम के एक व्यक्ति को यहाँ दाखिल करवाया गया था. वो
कहाँ पर हैं.’ अर्चना
ने वहाँ की रिसेप्षनिस्ट से पूछा.
पत्नी हूँ उनकी..’
भी रिश्तेदार ना आने पर अस्पताल की ओर से उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया.’
तो रो भी नही सकती थी. राकेश
से उसका रिश्ता कब का बिखर चुका था. आज
से बीस बरस पहले के पन्नों में दोनो ने एक दूसरे के साथ रहने की कस्में खाई थी. राकेश
अर्चना से बहुत स्नेह करता था. घरवालों
की सहमति से ही दोनो ने शादी भी की. शादी
के कुछ महीनों बाद ही राकेश को किसी काम से दिल्ली जाना पड़ा और फिर उसने दिल्ली में ही नौकरी भी कर ली. वो
दिल्ली से वापिस नही लौटा. घरवालों
के फोन गये पर कोई भी जवाब नही मिल पाया. फिर
अर्चना ने दिल्ली जाने का फैंसला किया. राकेश
के पते के बारे में तो वो कुछ जानती नही थी. उसकी
कंपनी के बारे में वो जितना जानती थी उसी के सहारे राकेश तक पहुँचने में सफल रही. राकेश
के दफ़्तर पहुँचने पर उसे पता चलता है कि वो आज दफ़्तर नही आया. उसके
घर का पता मालूम किया और अर्चना वहाँ पहुँच गयी.
ने फ्लैट की घंटी बजाई…दरवाजा
खुला…
मिलना है आपको..?’
कौन?’
अभी अपने सच को कहने ही वाली थी कि.. इससे
पहले ही सब मौन हो गया…
यहाँ कैसे…??’
है ये..?’
में किसी को कोई खबर नही कि राकेश कहाँ है, अर्चना
कहाँ है. अर्चना
के माता–पिता
उसे ले कर बहुत चिंतित थे. उसके
भाई को दिल्ली भेजा गया.. और
यहाँ आ कर
उसे सारी सच्चाई का पता चला. लेकिन, अर्चना का कुछ भी पता ना चल पाया.. हताश, वो लौट गया.
ने अपने जीवन को समाप्त करने का निर्णय ले लिया. तीन
महीने की गर्भवती वो अब कहाँ जाती. उसके
पास कोई विकल्प नही था. ससुराल
जाना नही चाहती थी और अपने मायके में क्या मुँह ले कर जाए. क्योंकि
पसंद तो अर्चना की ही थी. कदम
उसे कहाँ ले जा रहे थे वो भी नही जानती थी. सड़क
को पार करते समय उसके मन में एक भयावह विचार आया कि क्यूँ ना वो अगली सड़क को पार करे ही ना. हाँ
यही ठीक रहेगा..
की ज़बरदस्त ब्रेक लगी…
कुछ अनहोनी हो जाती तो लेने के देने पड़ जाते..’
कुछ ना बोली.
का दरवाज़ा खुला और 40-45 वर्ष
का एक व्यक्ति. सफेद
कुर्ता–पायजामा
और पैरों में कोलपुरी जूती पहने हुए बाहर निकला.
जाना है क्या..? रास्ता
भूल गई हो क्या.. ? मैं
कुछ मदद कर दूं…?’
सुन्न खड़ी. मुँह
से एक भी शब्द नही फूट रहा था.
हो तुम? और
कहाँ जाना है तुम्हे?’
है… मुझे….?हां…नही… पता नही … कहाँ… जाना.. है.. मुझे…’
शब्दों को ढूंढ कर संजोने का असफल प्रयास करती
हुई संजना फिर सन्नाटे की गोद में जा बैठी | ऐसे कई सन्नाटे होते हैं जो व्यक्ति
के जीवन के साथ जुड़े होते हैं और कई बार उनमें से निकलना मुश्किल हो जाता है | दिल
बहुत नाजुक होता है | इसे जितना भ्रम में रखो उतनी ही इसकी उम्र बढ़ जाती है | भ्रम
टूटा तो यह भी टूट जाता है | परन्तु हम हमेशा भ्रम में नहीं रह सकते सच्चाई से
परिचय होना बहुत जरूरी है |
साहिब ने एक अनुमान लगाया.. पर
अपने साथ चलने के लिए भी कैसे कहूँ… क्यूँ
भरोसा करेगी वो मुझपर.. मैं
तो अंजान हूँ इसके लिए…’
साहिब ने अपने बेटी को फोन मिलाया और उसे वहाँ आने के लिए कहा… कपूर
साहिब ने अर्चना को सहारा देते हुए उठाया और अपनी बेटी पूर्वी का इंतज़ार करने लगे..
अचानक मुझे यहाँ क्यूँ बुलाया है.. और
ये… ये
कौन हैं…’
तो आओ..’
चोट तो नही आई ना इसे…’
लगता है इसके साथ कुछ अनहोनी हुई है… जिससे
ये परेशान है.. मैने
तुम्हे यहाँ इसलिए बुलाया है कि तुम इसे घर ले जाओ और मैं पुलिस स्टेशन जा कर आता हूँ…’
निश्चिंत रहो… मैं
इसे घर ले जाती हूँ…’
नही कुछ खाया है कि नही…’
दरअसल ये है कि.. ये
गर्भवती हैं…’
साहिब सोच में पड़ गये.. कि
उन्हें क्या करना चाहिए…
ने सारी कहानी कपूर साहिब को बता दी..
पति को तो जेल हो सकती है..’
कोई भी एक्शन नही लेना चाहती.. वो
अपने अतीत कोभूल जाना चाहती है.. क्या
हम उसके लिए कुछ नही कर सकते…?’
चिंतितस्वरमें…
एक काम करो. कुछ
दिन उसे यहीं घर पर रखो और ये जानने की कोशिश करो कि उसके मन में क्या है. तो
ही हम उसकी मदद कर पाएँगे..’
सारा दिन अर्चना के साथ रहती और उसका खूब ख्याल रखती. दोनो
अब बहनों जैसा रहने लगीं… अर्चना
घर के कामों में पूर्वी का हाथ बटाने लगी. एक
दिन पूर्वी ने अर्चना से पूछा कि अपने और अपने आने वाले बच्चे के भविष्य के बारे में क्या सोचा है. अगर
कहीं नौकरी करना चाहती हो तो बता दो. मैं
तुम्हारी मदद कर सकती हूँ.
तो मुझे करनी ही है. कब
तक यूँही रहूंगी और आप लोगों पर भी बोझ…’
साहिब ने अर्चना की बात को बीच में ही काटते हुए कहा) अगर
तुम नौकरी करती भी तो भी यहाँ से कहीं नही जाओगी. समझी. जैसे मेरे लिए मेरी बेटी पूर्वी है ठीक वैसे तुम भी हो. इसलिए
ये बात अपने मन से निकाल दो कि तुम हमारे लिए बोझ हो.’
नही.. पूर्वी
बोली.. जो
पापा ने कह दिया है वैसा ही होगा… नो
आर्ग्युमेंट्स… पूर्वी ने माहौल में अपनापन भरते हुए कहा…’
ने बिना कुछ पढ़े ही दस्तख़त कर दिए…
साहिब बोले..’
मेरे लिए कुछ अच्छा ही सोचा होगा. इन
काग़ज़ों को पढ़ कर मैं आपका अपमान करने की भूल नही कर सकती. एक
अंजाने रिश्ते को विश्वास के अटूट बंधन में बाँधते हुए अर्चना ने कहा…’
अर्चना क़ानूनी तौर पर मेरी बेटी है. अर्चना
के विश्वास पर कपूर साहिब ने अपनी पिता होने की मोहर लगाई.’
से कोई शिकायत नही रही थी. वो
अपनी हर साँस में भगवान का शुक्रिया अदा कर रही थी. अपने
जीवन में घटी उस दुर्घटना का अर्थ आज उसे समझ में आ रहा
था. कुछ
समय के लिए परमात्मा पर से उसका भरोसा उठ गया था. वो
अपने हर आँसू का कसूरवार उसे ठहरा रही थी. पर
आज.. आज
उसके हर सवाल का जवाब उसे मिल गया था.
हो कर अर्चना बोली.’
पूरे परिवार का आभास हो रहा था उन्हें.’
ऐसी क्या बात हो गयी थी कि तुम इस तरह से…’
