दीपावली के बाद अनावश्यक गिफ्ट्स का क्या करें ?




दीपों के त्यौहार दीपावली में गिफ्ट्स लेने – देने की परंपरा है | पर
अक्सर त्यौहार के बाद लोग उन गिफ्ट्स को इधर – उधर बाँट कर जैसे एक बहुत बड़े बोझ से
हल्का होने का प्रयास करते हैं | क्या आप भी उनमें से एक हैं ? तो ये लेख आपके लिए
हैं आइये जाने … 

महत्वपूर्ण  सवाल  दीपावली के बाद आप गिफ्ट्स का क्या करते हैं ?
हमारे सभी त्योहार घर-आँगन में ख़ुशहाली बिखेरते हुए मनों में जैसे अक्षय ऊर्जा का संचार कर जाते है, जिनकी गूँज कई-कई दिनों तो कानों में मधुर संगीत की तरह बजती हुई सुनाई देती रहती है। कुछ इसी तरह चल रहा था था पिछले वर्ष दीवाली बीतने के बाद। दो-चार दिन बाद मेरी एक अभिन्न मित्र ने मुझे अपनी किटी पार्टी में आने का निमंत्रण दिया….फ़ोन पर बोली कि कितने दिन हो गए हमें मिले हुए….तो तुम्हें आना ही है। इस बहाने तुम हमारी किटी पार्टी भी देख लेना कैसी होती है।तो मैं गयी। वहाँ काफ़ी कुछ देखा और सुना… जिसने मेरे मन में उथल-पुथल सी मचा दी थी।


क्या दीपावली के बाद आप का भी मुख्य अजेंडा  गिफ्ट्स निपटाने का होता है ?

  क्या बताऊँ भाभी जी! इतनी मिठाई, इतने गिफ़्ट्स इकट्ठे हो गए कि क्या बताऊँ? मिठाई हम इतनी खाते नहीं, गिफ़्ट्स भी ऐसे…जो रखने लायक नहीं…कल सब निबटाये तो आज आराम मिला।


      कहाँ निबटा डाले मिसेज़ शर्मा! बताइए ज़रा।हम भी इसी समस्या से जूझ रहे हैं।
         निबटाने कहाँ….अपनी कामवाली, माली,डाकिया, धोबी…..इन्हीं को दे-दिवा कर छुट्टी पायी मैंने तो। और हाँ….कुछ भिखारियों को भी दे दिए।
      ये अच्छा रास्ता बता दिया आपने तो। हम भी अपने भार से हल्के हो लेंगे जी।
       तभी एक कोई मिसेज़ शील बोली….अरे मिसेज़ शर्मा…जिन भिखारियों को आप दे रही थी वे तो आगे जाकर रास्ते में ही वे सब समान छोड़ गए थे… मैंने अपनी आँखों से दहख था।

 ये सब वर्णन सुनते हुए मेरे मन में उथल-पुथल सी होने लग गयी थी। कई दिनों तक में इसी विषय पर सोचती रही। क्या जो बातें वे सब किटी पार्टी में बोलने में लगी हुई थीं… वे पूर्णतया सच थी?  सब एक-दूसरे के सामने अपने को ऊँचा दिखाने  के चक्कर में दिखावा करते हुए बढ़-चढ़ कर बोलने में लगी हुई थी।

दीपावली के बाद क्या करे  बेजरूरत गिफ्ट्स का ?



        अगर सचमुच में हमारे पास देने के लिए चीज़ें इकट्ठी हो गयी हैं और वे हमारे उपयोग की भी नहीं हैं तो उन्हें निबटाने की सोच क्यों? उन्हें देने की और सही जगह देने की सोच क्यों न हो? कामवालियाँ,माली, धोबी कई घरों में काम करते हैं, वहाँ से उन्हें इतना मिलता है कि वे उस मिले हुए को बहुत महत्व भी नहीं देते…. हाँ तुलना ज़रूर कर लेते हैं कि किसने महँगा दिया, किसने सस्ता दिया,किसने कम दिया,किसने ज़्यादा दिया। जब हमें कुछ देना ही है तो क्यों न …


  • उसे दिया दिया जाए जिसे सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो, जिसे पाकर सच में उसके चेहरे पर मुस्कराहट आए। इसमें श्रम तो अवश्य होगा पर खोज करके जिसे दिया जाएँ उसकी मुस्कराहट देख कर संतोष अवश्य होगा सही व्यक्ति तक हमारा दिया पहुँच रहा है।
  •            जो दें मन से दें, यह सोच कर दें कि जिसे दे रहे हैं उसे देकर और लेने वाले को लेकर अच्छा लगे। ऐसा न हो कि हम देकर यह सोचें कि चलो निबटा यह काम भी और जिसे दिया वो ले कर यह सोचें कि हे! राम इससे तो यह ना ही देता।
  •          हो ये रहा है कि आज दिखावे के वशीभूत होकर लोग देने का दिखावा तो कर रहे है,पर दिया जाने वाला समान दिए जाने वाले व्यक्ति की रुचि का, मन का नहीं होता….तो वह यूँ ही पड़ा रहता है और निबटाया ही जाता है।
  •           सम्बन्धियों के दिए उपहार तो इधर से उधर घूमते ही रहते हैं। हम जिसे कुछ उपहार दे रहे हैं वह काम में आने वाला हो और अपने बजट के अनुकूल हो …यह ध्यान तो होना ही चाहिए। भावनाएँ जुड़ी न हों तो दिए उपहार का कोई लाभ नहीं है।

 दीपावली के अनमोल उपहार जो आप दे सकते हैं ?

  •    त्योहार है….और वो भी अवसर दीवाली का है तो आइए अपनी ज़रूरतों में से थोड़ा सा कम करके उन लोगों के घरों में ख़ुशियों के दीप जलाएँ जिनके घरों के लोग अपने घरों के दरवाज़े पर ख़ुशियों के आने का रास्ता देख रहें हैं। बितायें उनके साथ अपना थोड़ा सा समय, उन वृद्धजनों के बनें अपने…. जिनके अपनों ने छोड़ दिया उन्हें ….. कुछ सुनें उनकी कुछ अपनी सुनायें….जलायें अपनेपन का एक दिया उनके सूने जीवन में…
  • .जलायें ज्ञान का एक दीप उन बच्चों के लिए, जो किसी विवशता के मारे पढ़ाई से दूर हैं…
  • जलाएँ संकल्प का एक दीप कि मृत्यु के बाद आपके नेत्र किसी के जीवन का अंधियारा दूर कर उजाले से प्रकाशित करेंगे संसार।
  •   त्योहार कहते हैं हमें कि जिन संकीर्णताओं की श्रृंखलाओं में अपने को जकड़ लिया है हमने…..उन्हें तोड़ कर अपने मैं से बाहर निकलें, अपनाएँ प्रेम-स्नेह और अपनेपन से सबको। अपने में सबको देखें और सबमें अपने को….. तभी एक- दूसरे के दुःख -सुख को मानवता के धरातल पर हम अनुभव कर सकेंगे और सच्चे बन कर वास्तविक दीप जला सकेंगे।

             तो चलें……सर्वप्रथम हम अपने अज्ञान के अंधेरे को दूर करने के लिए एक दीप जलाएँ और उससे फिर दीप से दीप जला कर उजाले से सज़ा दे सारा संसार। तभी होगी वास्तविक दीवाली।
डा०भारती वर्मा बौड़ाई





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