कहीं हम ही तो अपने बच्चों के लिए समस्या नहीं?

कहीं हम ही तो अपने बच्चों के लिए समस्या नहीं?





            दृश्य-१- 


बहुत दिनों से सोच रही थी कि शीतल से मिल आऊँ, उसके हाल-चाल जान आऊँ…सो आज चली गई उसके घर। गप्पों के बीच उसने बीच उसने आवाज़ दी अपनी बेटी को….मोना! अच्छी चाय बना कर ले आ आंटी के लिए। बेटी चाय लेकर आई, रख कर वो बातें करने लगी।




        मोना! यही सीखा है तुमने? इस तरह चाय सर्व करते हैं? कब सीखोगी कुछ? देखा सोनी! ये हैं इसके हाल! हम तो ऐसे किया करते थे, वैसे किया करते थे, पर ये आजकल के बच्चे….करना ही नहीं चाहते कुछ। दूसरे घर जाकर नाक कटवाएँगे हमारी। जब भी उसके घर गई… इसी तरह के दृश्य देखने को मिले मुझे। इसके फलस्वरूप उसकी बेटी हकला कर बोलने लगी….पर शीतल के स्वभाव में कोई बदलाव नहीं। उसका कोसना आज भी वैसे ही जारी है।


       दृश्य-२– 
बेटा बाहर से खेल कर आया। पिता के मित्र घर में बैठे हुए थे। बेटे के घर में प्रवेश करते ही पिताजी बोलने शुरू हो गए…..आ गए बेटा तीर मार कर। पढ़ने-लिखने से तो कोई संबंध है नहीं तुम्हारा। सचिन तेंदुलकर समझते हो ख़ुद को। मेहनत करना तो बस का नहीं…..बनने चले हो विराट कोहली। बेटे ने एक उपेक्षित भाव से अपने पिता की ओर देखा और पिता के मित्र को नमस्कार कर अंदर चला गया।


          दृश्य-३–
घर में किसी मेहमान के आते ही मालती अपने दोनों बेटा-बेटी को परेशान कर डालती…. बेटा आंटी को पोयम सुनाओ तो, बेबी…आंटी को डाँस करके दिखाओ।और जब वे करते…ढंग से कुछ नहीं सुनाते-दिखाते तुम। शर्मा आंटी के बच्चों को देखो और एक तुम हो…..जो कुछ ढंग से करते ही नहीं। इस तरह बच्चे मेहमानों के सामने आने से कतराने लगे।


        दृश्य-४-


आजकल घरों में, स्कूलों में बहुत अच्छी-अच्छी बातें सिखाई जाती हैं…. दूसरों की मदद करनी चाहिए, सेवा करनी चाहिए, माह में एक बार दो-चार घंटे का समय किसी के लिए अच्छा काम करने में देना चाहिए। यदि कोई सच में ऐसा कुछ करता दिखाई देता है…..तो कुछ इस तरह की टिप्पणियाँ सुनने को मिलती हैं…..फ़ालतू इधर से उधर घूमते हैं….ये करना कौन सी बड़ी बात है…..या…अरे अभी से बच्चा तुम इस फ़ालतू काम में लग गए….ये तो रिटायर हो चुके लोगों का काम है। तुम खाओ-पियो, नौकरी करो, परिवार बनाओ। अच्छाई की तरफ़ बढ़ते क़दमों को लौटाने का प्रयास।

जो हो रहा है ….उसके ज़िम्मेदार कहीं हम ही तो नहीं?



               ये सभी दृश्य काल्पनिक नहीं हैं मैं स्वयं प्रत्यक्षदर्शी हूँ इन दृश्यों की। वास्तव में लोग आजकल दोहरी मानसिकता को लेकर जीते हैं। कहते कुछ हैं, सोचते कुछ हैं और करते कुछ हैं। अपनी संतान के मामले में तो माता-पिता का दृष्टिकोण बनना अपने और दूसरों को देख कर ही बनता है।हमारे समय में ऐसा था, हम ऐसा करते थे, वैसा करते थे, पढ़ाई भी और घर का पूरा काम भी करते थे….पर आज के बच्चे! काम करना तो दूर, ढंग से पढ़ते भी नहीं। जो समय हमने जिया, उसमें हमने जो किया, जैसे किया, वो उस समय के अनुसार  था….पर आज क्या जरूरी है कि बच्चा आज के समय अनुसार न चले। हर समय अपना हवाला देकर बच्चों को दूसरों के सामने नीचा दिखाना, हतोत्साहित करना, हँसी का पात्र बनाना क्या उचित है? फिर जब बच्चे  उपेक्षा करते हैं, विद्रोह करते हैं तो आज के समय और आज की पढ़ाई को कोसने लगते हैं।


           अपनी रूचियाँ, अपने अधूरे सपनों का बोझ अपने बच्चों पर पर डाल कर उनके सपनों का अंत करना क्या उचित है? होना तो यह चाहिए कि हम आज के समय को समझते हुए अपने बच्चों की रुचियों को पहचाने, उनके सपनों की आवाज सुनें और उन्हें पूरा करने में उनके साथ क़दम मिलाएँ, गिरें-लड़खड़ायें तो उन्हें थामें, उत्साहित करें ताकि वे अपने सपनों को पूरा कर सकें। इसके लिए माता-पिता को अपनी भूमिका निभाने के साथ मित्र भी बनना होगा। कहीं-कहीं घरों में डर और अनुशासन का इतना आतंक रहता है की बच्चा अपनी बात कहने से कतराते हैं, बाहर कहते हैं,ड्रग्स लेने लगते हैं। हर बात के लिए दूसरों पर आरोप न लगा कर अपनी ओर भी देखना-सोचना चाहिए कि जो हो रहा है ….उसके ज़िम्मेदार कहीं हम ही तो नहीं?

बच्चों के साथ  के साथ कैसा हो माता -पिता का व्यवहार 



  •              न तो बच्चा बंदर या कठपुतली हैं न हमारी भूमिका क़ादरी की है, तो फिर क्यों हम मेहमानों के आने पर उन्हें नाच दिखाने,गाना-कविता सुनाने को कहते हैं। दूसरों से तुलना करना तो और भी ग़लत है। हर बच्चा दूसरे से अलग होता है। तुलना करके हम उसे हेय बना कर हतोत्साहित करते हैं, उसके विकास की गति को अवरुद्ध करते है।



  •               बच्चे के अंदर स्वतंत्र निर्णय ले सकने की क्षमता का विकास होने देने के लिए उसे स्वतंत्रता देनी चाहिए। सही निर्णय पर प्रशंसा और ग़लत निर्णय पर समझना….ये दोनों प्रक्रियाएँ होनी चाहिए।



  •              आज बच्चे अपने जीवन में जिन भी समस्याओं से जूझते दिखाई पड़ते हैं…..उनकी तह में जाने पर मूल में घर का अशांत वातावरण, माता-पिता का उन्हें अपनी अनुकृति बनने का भरपूर प्रयास ही मिलता है।



  •               आज के समय में तो आज के अनुसार ही जीना-करना होगा। अतीत का गुणगान इतना न हो कि वर्तमान तो बिगड़े ही, भविष्य भी धूमिल हो जाए। इससे परेशानी तो दोनों पक्षों को भुगतनी पड़ती है। तो हम क्यों अपने बच्चों के लिए समस्याएँ उत्पन्न करने का कारण बनें?

           होना तो यह चाहिए कि हम अपने बच्चों की सफलता-विकास की यात्रा में उसके सहयात्री बन कर साथ चलें…..इसके लिए हमें यानी माँ और पिता को अपनी भूमिका पर पुनर्विचार करना होगा, नहीं तो हम जाने-अनजाने उनके लिए समस्या बनने वाले कारक मात्र  बन कर रह जाएँगे।

डा० भारती वर्मा बौड़ाई
देहरादून





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