दहेज़ प्रथा – मुझे जीवनसाथी के एवज में पैसे देना स्वीकार नहीं

दहेज़ प्रथा - मुझे जीवनसाथी के एवज में पैसे देना स्वीकार नहीं
दहेज क्या है? विवाह के समय माता-पिता द्वारा अपनी संपत्ति में से कन्या को कुछ धन, वस्त्र, आभूषण आदि के रूप में देना ही दहेज है। प्राचीन समय में ये प्रथा एक वरदान थी। इससे नये दंपत्ति को नया घर बसाने में हर प्रकार का सामान पहले ही दहेज के रूप में मिल जाता था। माता-पिता भी इसे देने में प्रसन्नता का अनुभव करते थे। परंतु समय के साथ-साथ यह स्थिति उलट गयी। वही दहेज जो पहले वरदान था अभिशाप बन गया है। आज चाहे दहेज माता पिता के सामर्थ में हो ना हो, जुटाना ही पड़ता है। कई बार तो विवाह के लिए लिया गया कर्ज सारी उमर नहीं चुकता तथा वर पक्ष भी उस धन का प्रयोग व्यर्थ के दिखावे में खर्च कर उसका नाश कर देता है। इसका परिणाम यह निकला कि विवाह जैसा पवित्र संस्कार कलुषित बन गया। कन्यायें माता-पिता पर बोझ बन गयीं और उनका जन्म दुर्भाग्यशाली हो गया। पिता की असमर्थता पर कन्यायें आत्महत्या तक पर उतारू हो गयीं। 

‘मैं जिस किसी की जीवन साथी बनूँगी, उसको जीवन साथी बनने के एवज में कोई पैसा नही दूँगी।’’

इसके लिए विचारशील नवयुवकों को स्वयं आगे आकर इस लानत से छुटकारा पाना होगा। साथ ही समाज को भी प्रचार द्वारा अपनी मान्यताए बदलकर दहेज के लोभियों को कुदृष्टि से देखकर अपमानित करना चाहिए। अभी तक इस विषय में बहुत कुछ करना अभी शेष है। जैसा आप सबको पता है कि भारतीय पुरूषों के अपने जीवन साथी से पैसा लेने की इस कुप्रथा को ही ‘‘दहेज प्रथा’’ कहते हैं। इस प्रथा का साइड इफेक्ट अब यह हो गया है कि लाखों की संख्या में लड़कियां पैदा होने से पहले ही गर्भ में मार दी जाती हैं। आप जानते ही है कि

‘‘सेक्स अनुपात’’ गड़बड़ा जाने से कितने तरह के अपराध पनपते हैं। 

दहेज प्रथा लोकतंत्र के सभी स्तम्भों तक

कई जगह सुनने में आ रहा है कि जो नौजवान आईएएस/आईपीएस/पीसीएस (जे)/एचजेएस हो जा रहे हैं वो और उनके परिवार अपनी जीवनसाथी से 25-25 करोड़ तक लेकर बेमेल शादी कर रहे हैं। जबकि एक आईएएस/आईपीएस/पीसीएस (जे)/एचजेएस को नौकरी की शुरूआत में ही एक जिले की व्यवस्था सुधारने की जिम्मेदारी दी जाती है और वह भारत की 125 करोड़ की आबादी के उन 600 सबसे शक्तिशाली लोगों में शामिल होते हैं, जिनको भारत के कुल 600 जिलों में रह रहे भारतीय नागरिकों को सबसे अच्छी व्यवस्था देनी होती है, उनको सब प्रकार की बुराईयों से बचाना होता है।
लेकिन दुर्भाग्यवश यह दहेज कुप्रथा लोकतंत्र के सभी स्तम्भों तक भी अब पहुँच गई है और लोकतंत्र में जिस वर्ग को व्यवस्था को चलाने की जिम्मेदारी है अगर वही ऐसी कुप्रथाओं के वायरस से ग्रस्त हो जायेंगे तो फिर भारत के लोकतंत्र का चरमराना तय है। सबसे ऊपर वर्ग ही ग्रसित हो जाये तो बाकी को क्या कहना?

अगर हम अब भी न चेते तो हमारी बेटियाँ/बहनें निराशा में चली जाएंगी, और हम सब ध्यान रखें कि बेटी ही भावी माँ होती है और अगर माँ ही निराशा में चली गई तो हम लाख ‘‘भारत माता की जय’’ बोले, भारत कैसे आगे बढ़ेगा।

दहेज़ प्रथा को रोकने की शुरुआत हर लड़की कोखुद से करनी होगी 

भारतीय मानस दहेज मुक्त हो और दहेज कुप्रथा से उत्पन्न हो रही समस्याओं से अवगत हो।

दहेज़ प्रथा को रोकने की शुरुआत हर लड़की कोखुद से करनी होगी  | उसी की शुरुआत करते हुए मैं संकल्प लेती हूँ कि मैं दहेज प्रथा आधारित वैवाहिक सम्बन्ध को किसी भी दशा में स्वीकार नही करूँगी तथा मैं इस सामाजिक कुरीति के विरूद्ध प्रारम्भ हो रही वैचारिक क्रान्ति में पूर्ण मनोयोग से तब तक सहभागिता करती रहूँगी जब तक सर्वथा समाज विरोधी इस कुप्रथा का समूल नाश न हो जाये। आप सभी विचारशील नागरिकों के आशीर्वाद से मेरा शुभ संकल्प पूरा हो। दहेजरहित समाज के निर्माण में मीडिया बन्धुओं का सक्रिय सहयोग बड़ी भूमिका निभा रहा है, आगे भी निभाता रहेगा।  

तो अब वक्त आ गया है कि भारत के श्रेष्ठ बौद्धिक जन उठकर खड़े हों और ‘‘डाउरी फ्री इंडिया मूवमेंट’’ की शुरूआत करें। संकल्प सभा का आयोजन किया जाये जिसमें हर जाति/धर्म की ऐसी लड़कियां जो आत्मनिर्भर हैं या आत्मनिर्भरता की तरफ अग्रसर हैं, वो संकल्प ले कि

‘‘मैं अपने आत्म गौरव के सापेक्ष संकल्प लेती हूँ कि मैं जिस किसी की जीवन साथी बनूँगी, उसको जीवन साथी बनने के एवज में कोई पैसा नहीं दूँगी।’’ 

दहेज़ प्रथा के विरुद्ध एक सवाल भारतीय पुरुषों से  

‘‘आइये हम भारतीय पुरूषों से यह सवाल पूछें कि क्या आप अपने गृहस्थ जीवन की शुरूआत अपनी जीवनसंगिनी से पैसा लेकर करेंगे? आइए हम भारतीय स्त्रियों से यह सवाल पूछें कि तुम कब तक जीवनसंगिनी बनने के भी पैसे दोगी? हम सब ‘‘दहेज कुप्रथा’’ पर व्यवस्थित तरीके से चोट करना अपने परिवार से आरम्भ करें, यही देश के महापुरूषों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
दहेज मांगना और देना दोनों निन्दनीय कार्य हैं। जब वर और कन्या दोनों की शिक्षा-दीक्षा एक जैसी है, दोनों रोजगार में लगे हुए हैं, दोनों ही देखने-सुनने में अच्छे तथा स्वस्थ हैं, तो फिर दहेज की मांग क्यों की जाती है? कन्यापक्ष की मजबूरी का नाजायज फायदा क्यों उठाया जाता है? भारत में कुछ ऐसी जातियां भी हैं जो वर को नहीं, अपितु कन्या को दहेज देकर ब्याह कर लेते हैं, लेकिन ऐसा कम ही होता है। अब तो ज्यादातर जाति वर के लिए ही दहेज लेती हैं।

दहेज प्रथा को रोकने के लिए सार्थक उपाय 

दहेज-दानव को रोकने के लिए सरकार द्वारा सख्त कानून बनाया गया है। इस कानून के अनुसार दहेज लेना और दहेज देना दोनों अपराध माने गए हैं। अपराध प्रमाणित होने पर सजा और जुर्माना दोनों भरना पड़ता है। यह कानून कालान्तर में संशोधित करके अधिक कठोर बना दिया गया है। अधिक संख्या में बारात लाना भी अपराध है। दहेज के लिए कन्या को सताना भी अपराध है।

दहेज के कलंक और दहेज रूपी सामाजिक बुराई को केवल कानून के भरोसे नहीं रोका जा सकता। इसके रोकने के लिए लोगों की मानसिकता में बदलाव लाया जाना चाहिए। 

विवाह अपनी-अपनी जाति में करने की जो परम्परा है उसे तोड़ना होगा तथा अन्तर्राज्यीय विवाहों को प्रोत्साहन देना होगा। तभी दहेज लेने के मौके घटेंगे और विवाह का क्षेत्र व्यापक बनेगा। अन्तर्राज्यीय और अन्तर्राष्ट्रीय विवाहों का प्रचलन शुरू हो गया है, यदि इसमें और लोकप्रियता आई और सामाजिक प्रोत्साहन मिलता रहा, तो ऐसी आशा की जा सकती है कि दहेज लेने की प्रथा में कमी जरूर आएगी।
उच्च शिक्षा प्राप्त युवक-युवातियाँ का अपनी पढ़ाई के दौरान ही एक-दूसरे के विचारों से अच्छी प्रकार परिचय हो जाता है। वे दोनांे अपने लिए अपने पेशे से संबंधित योग्य वर-वधु का चयन स्वयं अपने विवेक से कर लेते हैं तथा अन्त में माता-पिता की सहमति से दहेजरहित विवाह के पवित्र बन्धन में बंधकर एक हो जाते हैं। अर्थात एक ही प्रोफेशन/कैरियर में लगे प्रगतिशील विचार के युवक-युवतियों के विवाह होने की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। जैसे- डाक्टर का डाक्टर के साथ, इंजीनियर का इंजीनियर के साथ, एडवोकेट का एडवोकेट के साथ, वैज्ञानिक का वैज्ञानिक के साथ आदि-आदि। ऐसे सम्बन्ध दहेज प्रथा को समाप्त करंेगे। साथ ही ऐसे एक से कैरियर के बीच होने वाले विवाह सम्बन्ध सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्र में सफलता दिलायेंगे।

बेटी को आत्मनिर्भर बनाना सबसे बड़ा दहेज़ 

बेटी को आज के वैश्विक युग की आवश्यकता के अनुकूल उच्च, तकनीकी तथा आधुनिक शिक्षा दिलाकर आत्मनिर्भर बनाने के लिए हमें जी-जान से कोशिश करनी चाहिए। इस दिशा में गुणात्मक शिक्षा को शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वजन सुलभ बनाने का यह सबसे उपयुक्त समय है। एक बेटी या माँ अच्छी शिक्षक है जिससे बेहतर स्नेह और देखभाल करने का पाठ और किसी से नहीं सीखा जा सकता है। नारी के नेतृत्व में दुनिया से युद्धों की समाप्ति हो जायेगी। क्योंकि कोई भी महिला का कोमल हृदय एवं संवेदना युद्ध में एक-दूसरे का खून बहाने के पक्ष में कभी नही होता है। महिलायें ही एक युद्धरहित विश्व का गठन करेंगी। विश्व भर के पुरूष वर्ग के समर्थन एवं सहयोग का भी वसुधा को कुटुम्ब बनाने के अभियान में सर्वाधिक श्रेय होगा।

लेखिका – कु. शान्ति पाल ‘प्रीति’,
लखनऊ

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