शादी – ब्याह :बढ़ता दिखावा घटता अपनापन

                                   

शादी - ब्याह :बढ़ता दिखावा घटता अपनापन

                             
आज कल शादी ब्याह ,दिखावेबाजी के अड्डे बन गए हैं | मुख्य चर्चा का विषय दूल्हा – दुल्हन व् उनके लिए शुभकामना के स्थान पर कितने की सजावट , खाने में कितने आइटम व् कितने के कपडे कितनी की ज्वेलरी हो गए हैं | ये दिखावेबाजी क्या घटते अपनेपन के कारण है | इसी विषय की पड़ताल करता रचना व्यास जी का उम्दा लेख 


शादी – ब्याह :क्यों बढ़ रहा है दिखावा 


हम समाज में रहते हैं साहचर्य के लिए ,अपनत्व के लिए और भावनात्मक संतुलन के लिए पर मुझे तो आजकल बयार उल्टी दिशा में बहती नजर आ रही है। अब बयार है प्रतियोगिता की, प्रदर्शन की ,एक दूसरे को नीचा दिखाने की। आजकल व्यक्तित्व, शिक्षा का स्तर व समझदारी से नहीं पहचाना जाता बल्कि कपड़े गहने ,जूते और गाड़ी से श्रेष्ठ बनता है।
                                                               
एक स्त्री होने के नाते मैं गौरवान्वित हूँ  और इस प्रगतिशील युग में जन्मी होने के कारण विशेष रूप से धन्य हूँ।  हमने सभी मोर्चो पर खुद को उत्कृष्ट साबित कर दिया है। पर भीतर ये गहरी पीड़ा है कि हममेंसे ज्यादातर ऊपर बताई गई उस प्रतियोगिता की अग्रणी सदस्या है।


 हम अपने बजट का ज्यादातर हिस्सा कॉस्मेटिक्स ,कपड़ों और मैचिंग ज्वैलरी पर खर्च करते हैं। संस्कृत साहित्य के महान नाटककार कालिदास का कथन है 


“किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम्।” 

अर्थात मधुर आकृतियों के विषय में प्रत्येक वस्तु अलंकार बन जाती है। यदि व्यक्तित्व में ओज हैं ,सात्विकता है तो साधारण श्रृंगार भी विशिष्ट प्रतीत होगा।  आज जब हम किसी पारिवारिक या सामाजिक  आयोजन में जाते है तो स्पष्ट महसूस कर सकते है कि मेजबान का पूरा ध्यान कार्यक्रम को भव्य बनाने पर रहता है।



शादी ब्याह : गायब हो रहा है अपनापन 


चाहे बजट बढ़ जाये पर सजावट में ,व्यंजनों की संख्या में ,मेहमानों की सुविधा में कोई कमी नहीं होनी चाहिए। वहीं मेहमान का पूरा ध्यान स्वयं को ज्यादा प्रतिष्ठित व सुंदर दिखाने पर होता है। इस बीच में बड़ो के लिए सम्मान ,छोटों के लिए आशीर्वाद और हमउम्र के लिए आत्मीयता बिलकुल गायब रहती है। मुझे आत्मिक पीड़ा ये है कि इस सबके लिए हम स्त्रियाँ ज्यादा उत्तरदायी है। 


आज से पंद्रह वर्ष पूर्व तक अपने करीबी की शादी में हम हफ्ते भर रुकते थे। सारा शुभ काम उनके निवासस्थान पर ही होता। सारी स्त्रियाँ हँसते -हँसते हाथों से काम करती। गिने चुने सहायक काम के लिए होते जिन्हें गलती से भी नौकर नहीं समझा जाता था। असुविधा होने पर भी शिकायत नहीं होती थी। ख़ुशी -ख़ुशी जब वापस अपने घर लौटते तो थकान का कोई नामो -निशान भी नहीं होता। आज होटल में मेहमानों के सेपरेट रूम होते हैं।




सर्वेन्ट्स की फौज होती है। पानी तक उठकर नहीं पीना पड़ता पर दो दिन बाद जब घर आते हैं तो बहुत थके होते है। क्या हमारा स्टेमिना इतना कम हो गया। दरअसल हमारे बीच का अपनत्व कम हो गया ,एक दूसरे के लिए शुभ भावना विलीन हो गई इसलिए हमें भावनात्मक ऊर्जा पूरी नहीं मिलती ,हृदय के आशीर्वाद नहीं मिलते।


     अब हमें मात्र औपचारिकता निभानी होती है। दो दिन तक गुड़िया की तरह सज लो ,दिखावे को हँस लो और एक भार -सा सिर पर लादकर आ जाओ कि इनने इतना खर्च किया अब दो -तीन साल बाद मेरी बारी  है। रिसेप्शन शानदार होना चाहिए भले ही हमने अपने बेटे व बेटी को ऐसी सहिष्णुता नहीं सिखाई कि उसकी शादी सफल हो। 



पहले कुछ रूपये शादी में लगते थे और हमारे दादा -दादी गोल्डन व प्लेटिनम जुबली मनाते थे। उससे आगे हजारों लगने लगे पर तलाक की नौबत कभी नही आती थी। आज लाखों -करोड़ों शादी में लगाते है और उससे भी ज्यादा तलाक के समय देना होता है।





 इस सर्द दुनिया में रिश्तों की गर्माहट जरूरी है।तभी रिश्ते सजीव और चिरयुवा रहेंगे। एक अंधी दौड़ हम स्त्रियों ने ही शुरू की है क्यों न हम ही इसे खत्म कर दे। अबकी बार किसी आयोजन में जाए तो अपनी गरिमामय पोशाक में जाये। किसी के कपड़ो की समीक्षा मन में भी न करें। खाना कैसा भी बना हो उसे तारीफ करके ,बगैर झूठा छोड़े खाएं।  सब पर खुले मन से स्नेह और आशीष लुटाए ;बदले में प्रेम की ऊष्मा व ऊर्जा लेकर घर आयें। संतोष व सादगी की प्रतिमूर्ति बनकर ही हम स्त्रीत्व को सार्थक कर सकती है और समाज को एक खुला व खुशनुमा माहौल दे सकती हैं।यही नवविवाहित दम्पत्ति  को दिया गया हमारा ससे खुबसूरत तोहफा होगा | तो अगली बार कहीं शादी में जायें तो आप भी विचार करें की दिखावा कम और अपनापन ज्यादा हो | 


द्वारा
रचना  व्यास
 एम  ए (अंग्रेजी साहित्य  एवं  दर्शनशास्त्र), 
 एल एल बी ,  एम बी ए

लेखिका
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