सकता | जिसको दूर – दूर तक शायरी में रूचि
न हो उससे भी अगर किसी शायर का नाम पूंछा जाए तो वो नाम ग़ालिब का ही होगा | अगर उन्हें
शायरी का शहंशाह कहा जाये तो अतिश्योक्ति
न होगी | दरसल ग़ालिब की शायरी महज शब्दों की जादूगरी नहीं थी उसमें उनके जज्बात की
मिठास ऐसे ही घुली थी जैसे पानी में शक्कर
… जो पीने वालों को एक सुकून नुमा अहसास कराती है | हालांकि ग़ालिब की जिंदगी
बहुत दर्द में गुज़री , ये दर्द उनके जज्बातों में घुलता – मिलता उनकी शायरी में
पहुँच गया |
मिर्जा ग़ालिब की जीवनी /Biography of Mirza Ghalib
शायरी से लोगों के दिलों में राज करने वाले ग़ालिब का असली नाम मिर्जा असद उल्ला
बेग खान था | जो उर्दू और फ़ारसी में शायरी करते थे | वो अंतिम भारतीय शासक बहादुर
शाह जफ़र के दरबारी कवि थे | उनके मासूम दिल ने उस समय का ग़दर व् मुग़ल काल का पतन
अपनी आँखों से देखा था | एक संवेदनशील शायर का ह्रदय उस समय के यथार्थ , प्रेम और
दर्शन का मिला जुला रूप में बिखरने लगा | हालांकि उस समय उन्हें कल्पना
वादी बता कर उनकी शायरी का बहुत विरोध हुआ |इतने विरोधों के बाद भी उनकी ग़ालिब की
शायरी आज भी शायरी क शौकीनों की पहली पसंद बनी हुई है तो कुछ तो खास होगा ग़ालिब
में |
ग़ालिब का आरंभिक जीवन
तुर्क थे | उनके दादा मिर्जा कोबान बेग खान समरकंद के रहने वाले थे जो अहमद शाह के
शाशन काल में भारत आये थे | हालाँकि मात्रभाषा तुर्की होने के कारण अपने आरम्भिक
प्रवास के दौरान उन्हें बड़ी दिक्कते आई | क्योंकि वो हिन्दुस्तानी के कुछ टूटे
फूटे शब्द ही बोल पाते थे | कुछ दिन लाहौर रहने के बाद वो दिल्ली चले आये | उनके
चार बेटे व् तीन बेटियाँ थी |उनके बेटे अब्दुल्ला बेग ग़ालिब के वालिद थे | उनकी
माँ इज्ज़त –उत –निशा –बेगम कश्मीरी मुल्क की थी | जब ग़ालिब मात्र पांच साल के थे
तभी उनका इंतकाल हो गया | कुछ समय बाद ग़ालिब के एक चाचा का भी इंतकाल हो गया |
उनका जेवण अपने चाचा की पेंशन पर निर्भर था |
उनकी आरम्भिक शिक्षा उनकी शिक्षित माँ द्वारा घर पर ही हुई | बाद में उन्होंने जो
कुछ सीखा सब स्वध्याय व् संगति का असर था | कहने की जरूरत नहीं की ग़ालिब के सीखने
की ललक व् काबिलियत इतनी ज्यादा थी की वो फ़ारसी भी यूँ ही सीख गए | ईश्वर के रहमो
करम से वो जिस मुहल्ले में रहे वहां कई शायर रहते थे | जिनसे उन्होंने शायरी की
बारीकियां सीखीं |
में वो उनके साथ दिल्ली आ कर बस गए | यहीं उनके साथ उनका छोटा भाई भी रहता था | जो
दिमागी रूप से अस्वस्थ था | सन १८५० में ग़ालिब अंतिम मुग़ल शासक बहादुर शाह जफ़र के दरबार में उन्हें शायरी सिखाने जाने लगे | बहादुर शाह जफ़र को भी शायरी का बहुत शौक था | उन्हें ग़ालिब की शायरी बहुत पसंद आई | इसलिए वो वहां दरबारी कवि बन गए | शायरी की दृष्टि से वो एक बहुत ही अच्छा समय था |आये दिन महफिलें सजती और शेरो शायरी का दौर चलता | ग़ालिब को दरबार मे बहुत
सम्मान हासिल था | उनकी ख्याति दूर दूर तक पहंचने लगी | इसी समय उन्हें दो शाही सम्मान
“ दबीर उल मुल्क “ और नज़्म उद दौला” का
खिताब मिला |
बहादुर शाह के शासन का अंत और उन्हें मिलने वाली पेंशन भी बंद हो गयी |
ग़ालिब का व्यक्तित्व
ईरानी होने के कारण बेहद गोरा रंग , लम्बा कद , इकहरा बदन व् सुडौल नाक उनके
व्यक्तिव में चार – चाँद लगाती थी | ग़ालिब की ननिहाल बहुत सम्पन्न थी | वो खुद को
बड़ा रईसजादा ही समझते थे | इसलिए अपने कपड़ों पर बहुत ध्यान देते थे |कलफ लगा हुआ
चूड़ीदार पैजामा व् कुरता उनकी प्रिय पोशाक थी | उस पर सदरी व् काली टोपी उन पर खूब
फबती थी |ग़ालिब हमेशा कर्ज में डूबे रहे पर उन्होंने अपनी शानो शौकत में कोई कमी
नहीं आने दी |जब घर से बाहर जाते तो कीमती लबादा पहनना नहीं भूलते |
ग़ालिब का रचना संसार
कारण उन्हें वर्तमान उर्दू गद्य का जनक का सम्मान भी दिया जाता है | इनकी
रचनाएँ “लतायफे गैबी”, दुरपशे कावयानी ”, “नाम ए ग़ालिब” , “मेह्नीम आदि गद्य में हैं | दस्तंब में उन्होंने १८५७ की
घटनाओं का आँखों देखा विवरण लिखा है | ये गद्य फारसी में है |
गद्य में उनकी भाषा सदा सरल और सुगम्य रही है |
कावयानी
शायरी संग्रह “ दीवान ए ग़ालिब” के रूप
में दस भागों में प्रकाशित हुआ है | जिसका अनेक भाषाओँ में
अनुवाद हुआ है |
के अंतिम दिन व् मृत्यु
बच्चे अल्लाह को प्यारे हो गए |एक संतान को गोद के बच्चे की
तरह पाला उसका भी इंतकाल हो गया |वो अपने वैवाहिक जीवन से
संतुष्ट नहीं थे |उनके जीवन में प्रेम का आभाव था |
किशोरावस्था में ही उन्हें शराब की लत लग गयी | जो जिंदगी
की मुसीबतों के साथ बढती गयी | जिस ग़ालिब को बहादुर शाह के
दरबार में इतना सम्मान प्राप्त था उसे अंग्रेजों ने पूंछा भी नहीं | यहाँ तक की उनकी पेंशन भी बंद करवा दी | अंतिम दिन
बहुत बदहाली में बीते | शरीर कमजोर और खोंखला होता गया |
१५ फरवरी 1869 को उनकी मृत्य हो गयी | लेकिन
अपने चाहने वालों के दिलों में वो आज भी जिन्दा हैं और हमेशा रहेंगे |
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