पर
सम्बोधन
ठहरी
शब्द-नदी।।
कितने ही
प्रतिमान यहाँ
अर्थहीन
हो चुकी समीक्षा
सोई चादर
तान यहाँ।
चित्रित
सम्वेदन
छवियाँ
नई नई।।
आज
विशेषण के आँगन में,
सर्वनाम
रावण हो बैठा
संज्ञा
शिष्ट नहीं है मन में।
की अर्थी
लेकर
आई नई
सदी।।
स्वर के
पाँव नहीं उठते हैं
छलते
संधि-समास सदा ही
रस के गाँव
नहीं बसते हैं।
की टीस
लिए
ही कविता
रूठ गई।
गरएं
सुलतानपुर
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