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माँ तुझे दिल से सलाम

माँ तुझे दिल से सलाम



माँ दुनिया का सबसे खूबसूरत शब्द है, माँ की तुलना नहीं हो सकती
क्योंकि माँ जिस प्रेम व् त्याग से अपने बच्चों को पालती है वो किसी इंसान के लिए
संभव नहीं है, पर माँ भी तो आखिर एक इंसान है अपने बच्चों के लिए सब कुछ नयौछावर करने
की चाह रखते हुए भी कभी -कभी परिस्थितियों के आगे विवश हो जाती है| पर जब कोई माँ विपरीत
परिस्थियों के आगे झुकती नहीं चट्टान की तरह अटल होकर उनका सामना करती है और अपने
बच्चों को भविष्य बनाती है, तो उसके साहस को सजदा करते हुए उसके बच्चे ही नहीं हर
कोई कह उठता है-

 ऐ माँ तुझे दिल से सलाम  



स्कूल में अचानक पड़ोस वाले चाचाजी को देख कर नीला हैरान हो गयी|  वह कक्षा 5 की छात्रा थी| चपरासी स्कूल के ऑफिस में बुला ले गया |  चाचा जी ने कहा ,”चलो घर में मेहमान आये हैं | मैं इसीलिये तुम्हें लेने आया हूँ | जब वो घर पहुंची तो वास्तव में बहुत सारे लोग घर के अन्दर बाहर खड़े थे | छोटी उम्र होने पर भी उसे माजरा समझ में आ गया कि कोई अनहोनी हो गयी है | थोड़ी ही देर में पिताजी आ गए | लेकिन ये क्या? वो तो एम्बुलेंस में लेटे  हुए आये थे | 




उनका पार्थिव शरीर घर के ड्राइंग रूम में रखा गया, जितने मुँह उतनी ही बातें,  ” अरे, राय साहब को कभी बीमार नहीं देखा”|  ऑफिस के लोग कहने लगे,  ” हम तो समझे थे राय साहब ने आज सी. एल ली है| 




                 नन्ही नीला कुछ समझ पाती कि अचानक से माँ को पीछे वाले कमरे से कुछ महिलाएं सहारा देती हुई ले आयीं | माँ का पछाड़  खा कर गिरना , फिर हम तीनों छोटे भाई-बहनों को अपनी बांहों में भर कर चीखना चिल्लाना आज भी नीला के मन को दर्द से भर देता है| 


                                 चौथा निपटते-निपटते घर के दूसरे कमरे में बच्चों के भविष्य को ले कर मीटिंग शुरू हो गयी| एक 34 साल की जवान विधवा और उसके तीन छोटे बच्चे | भाई उनके बारे में सोंचना समझना परिवार के लोगों का जन्मसिद्ध अधिकार होता है| 




बड़े ताऊजी बोले,  ” भाई मैं परिवार की सबसे बड़ी बेटी शिवानी को अपने साथ ले जाऊँगा | माँ को समझ में आ गया कि दीदी, 12-13 साल की है और ताई जी  का हाथ बँटाने लायक है| छोटे चाचा बोले, ” चलो मैं नीला को ले जाऊँगा, छोटी सी, प्यारी सी है, मेरे बच्चों के साथ खेलते कूदते बड़ी हो जायेगी| 


                चाचाजी भोले -भाले  होने से क्या?  फिर उनकी वो फैशनपरस्त पत्नी! अरे , बाप रे बाप ! वो तो अकेली ही सौ के बराबर है| वो अपने बच्चों को ही नहीं बख्शती तो मुझे क्या छोडती|


माँ चुप ,अवाक् सी खड़ी थी| बाकी बचे माँ और मेरा पांच साल का भाई सोमू, उसका क्या किया जाए|


दो बच्चों का तो बँटवारा हो गया, पर सोमू का क्या किया जाए? वो तो छोटा है, इसलिए अपनी माँ के पास ही रहेगा ना | कोई भी चाची, ताई , एक जवान विधवा को  पनाह देने का खतरा मोल नहीं लेना चाहती थीं| 


                           अचानक बाज़ार से लौटे मझले ताऊजी, जो अभी थोड़े ही दिन पहले विधुर हुए थे ,  ” अरे भाई ऐसी भी क्या बात है, मैं संतानहीन हूँ ,सोमू को मैं गोद ले लेता हूँ और उसके साथ मीना (माँ ) भी कहीं पड़ी रहेगी एक कोने में , इन्हें कोई तकलीफ न होने दूँगा|


 हम सब माँ के साथ घर के एक कमरे में स्तबद्ध होकर बैठे थे| 



माँ का मायका कमजोर होने के कारण उस ओर से सहयता की कोई गुंजाइश नहीं थी| उन्हें लगा जैसे उनके सामने हम सब की नीलामी हो रही थी, और बोली लग रही थी|


                  माँ अचानक से उठी और अपने झर -झर बहते आंसुओं को अपने दोनों हाथों से पोंछते हुए दूसरे कमरे में गयींऔर जोर से चिल्लाई , ” आप सब चुप रहे, जो जी में आया बोले चले जा रहे हैं, कभी मुझ से पूंछा है की मैं क्या चाहती हूँ?” आप सब को इसका अधिकार किसने दिया?एक तो मुसीबत का पहाड़ मुझ पर टूट पड़ा ऊपर से अप मेरे बच्चों का बँटवारा  कर रहे हैं| 
               थोडा रुक कर माँ फिर बोलीं , ” याद रखिये, अभी मैं जिन्दा हूँ , मरी नहीं हूँ| आप सब अपने स्वार्थ  के लिए मेरे बच्चों को अपने साथ ले जा रहे हैं| ये लडकियां आप के घर की नौकरानी बनेंगी| अब बहुत हुआ, आप सब अब यहाँ से प्रस्थान करें| मैं संभाल लूँगी, अपने को और अपने बच्चों को |


 उस दिन अपनी अपनी गाय जैसी माँ का रौद्र रूप देख कर हम सब सकते में आ गए | 



मेरे पिताजी सरकारी मुलाजिम थे| पिताजी के सहयोगी मिस्टर नाथ ने एक दिन घर आ कर माँ से कहा,  ” भाभी जी आप तो पढ़ी -लिखी हैं ,आपको तो मिस्टर राय की जगह नौकरी मिल सकती है |


बिलकुल वैसा ही हुआ माँ ने नौकरी की| अपनी जिंदगी के बेहतरीन साल जिंदगी की जद्दोजहद में निकाले, हम सब को पाला-पोसा, उच्च शिक्षा दी | कमर कसकर सब भाई -बहनों की शादियाँ की| आज मैं जिंदगी के जिस मुकाम पर खड़ी हूँ वो सब माँ का दिया हुआ है| उच्च शिक्षित, सभ्रांत  परिवार और सुखी जीवन|




               यही सोंचती नीला के आँसूं झर -जहर बहते हुए उसकी जीभ से टकराए| उसे अहसास हुआ कि आँसूं  तो नमकीन होते हैं , चाहे वो ख़ुशी के हों या दुःख के | तो फिर ये कौन से आँसू थे, जिनके प्रसाद के रूपमें मुझे मिला सफल जीवन| 


 आज माँ नहीं हैं … पर नीला कभी माँ का ऋण चुका ही नहीं पाएगी |उसे माँ की सेवा का मौका ही नहीं मिला| अपनी रिटायरमेंट से कुछ दिन पहले ही वो चल बसीं | माँ और पिता का फर्ज बखूबी से निभाकर हम बच्चों को शिक्षा दे गयीं कि मुसीबत आने पर उसका मुकाबला डट कर करें | 


                              अरे ये क्या? यादों के ताने-बाने में वो भूल ही गयी थी कि साँझ  से रात होने को आ गयी है| साड़ी  के  पल्लू  के एक कोने से आँखों से गिरते अश्कों को पोंछती मन ही मन बुदबुदाई,  ” माँ तुझे दिल से  सलाम” |  


सरबानी सेनगुप्ता 


लेखिका

  


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