राग पुराना

राग पुराना

‘ तुमने तो फिर  वही पुराना राग अलापना शुरू कर दिया .’
‘ जीवन के बहुत से सच हमेशा ताजे  बने रहते हैं , वे कभी …….!.’ 
‘ बस – बस . मुझे पता है , आगे क्या कहोगे .  तुम जैसे इमोशनल लोगों की यही तो प्राब्लम है कि मौका लगते ही   किताबी बातें शुरू कर देते हो .
‘ किताबों में लिखी बातें  हवा में  नहीं बनती . जिंदगी के खट्टे – मीठे , तल्ख या मधुर अनुभव  और घटनाएँ  ही तो शब्दों में पिरोई जातीं हैं जो किताब बन कर सबके सामने आती हैं , कोई – कोई उसे पढ़   लेता है और प्रभावित भी होता है  . ये बात अलग है कि आज कल अधिकांश लोगों को यह सौभग्य नहीं मिलता या उन्होंने   खुद को इससे दूर कर लिया है .’.
‘ देखो , मैं आज किसी बहस – वहस के मूड में नहीं हूँ . बहस करनी  है तो घर वापस चल सकते हो .’ 
‘ यह क्या बात हुई ! जब कोई जवाब नहीं मिलता तो हमेशा डांटने के मोड में आ जाती  हो ? अच्छा बताओ तुम्हें मेरे साथ कहीं भी जाना  अच्छा लगता है या नहीं   ?’ 
‘  तुम्हारा साथ हो और घूमना हो . वो बात अपनी जगह है परन्तु तुम्हारे साथ आने का खास मतलब यह है की मुझे घूमना और कोई भी नई जगह देखना अच्छा लगता है ,यह अलग बात है कि  तुम मेरे साथ होते हो तो मैं स्वयं को सुरक्षित महसूस करती   हुँ . दुनियादारी पर तुम्हारी पकड़ में हमेशा समझदारी दिखाई देती है  . तुम्हारे साथ मैं वह सब शेयर कर लेती हूँ जो उनके और  किसी के साथ शेयर  नहीं कर पाती . तुम मुझे और मेरी दुविधाओं को बड़ी संजीदगी से समझते ही नहीं , उन्हें टेकल भी कर लेते हो . तुममे और भी ऐसा बहुत कुछ है जो मैं भले ही मैं कह न सकूँ पर वह  है जो  मुझे तुम्हारे साथ समय बिताने को मजबूर करता है .मैं तुम्हारे साथ घूम कर इस बड़े से  शहर की हर जगह देखना   पसंद करती हूँ , शॉपिंग करना पसंद करती हुँ . ‘
‘ पर मेरे साथ सिर्फ इतना ही नहीं है !’
‘ हाँ – हाँ जानती हूँ कि क्या कहोगे !’
‘ क्या कहूँगा ….?’
‘ वही गुलशन नंदा के उपन्यास में लिखी बात कि सुधा , मुझे तुम्हारा साथ इसलिए पसंद है क्योंकि मैं तुम्हे बहुत प्यार करता हुँ और अगर मैं तुमसे झूठ बोल रहा होऊंगा तो वह झूठ तुमसे नहीं , अपने आप से बोल रहा होऊंगा . यही न मेरे  मजनूँ मियां .’   
 
‘ अगर यह किसी रूमानी उपन्यास का डायलॉग है तो यही सही क्योंकि यही मेरा सच है और अगर तुम इसे झूठ मानती हो  तो ठीक है साथ रहकर  हमें किसी पाप का भागीदार नहीं बनना चाहिए . चलो घर वापस चलते हैं .’
‘ नहीं न बाबा . इतनी जल्दी दिल छोटा  नहीं करते मेरे भोले प्रेमी महोदय  .  दुनिया के हर लेखक ने यह भी तो  लिखा है, जिसे हम सभी ने  कभी न कभी पढ़ा भी है कि   प्रेमिका की ना में भी उसकी हाँ  ही होती है . मैं तुम्हे प्यार करती हूँ , इसलिए भी तुम्हारे साथ घूमना और समय बिताना पसंद करती हूँ . प्रेमिका के मन की इतनी सी बात  भी नहीं समझते क्या ?
वह अवाक् परन्तु आत्मीय दृष्टि से उसे निहारता रहा .
‘अब अपनी किताबों से बाहर निकलो और देखो मैना के उस जोड़े को , कैसे एक – दूसरे के साथ चुपचाप  अपनी भाषा में बतिया रहे है . चलो हम उनकी बातों को समझने की कोशिश करें .’ सुधा के हाथ अनजाने ही न जाने कब , सुधांशु के हाथों में आ गये और उनकी पकड़ मजबूत हो ती  गयी और उनके कदम मैना के जोड़े के करीब पहुँच गए .
 वहां बैठने के कुछ देर बाद  सुधांशु  ने  धीमें से कुछ कहने के लिए होंठ खोले ही थे की सुधा ने  टोका , ” ” देखो फिर वही अपना पुराना राग मत अलाप देना , मुझे इस प्यारे से अल्हड़ जोड़े की बातें समझने दो .”

 सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा 
लेखक
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