गुड़िया जायेगी ससुराल लेकिन …

गुडिया जायेगी ससुराल लेकिन ...

नेहा की चार साल की दो जुड़वां बेटियाँ हैं … फूल सी प्यारी | कल दोनों ने पीले  रंग की एक सी फ्रॉक पहनी थी , जिसमें नन्हें -नन्हे  फूल  बने हुए थे | सारा समय वो इधर -उधर शरारत करती रहीं | फिर नेहा के कहने पर उन्होंने डांस दिखाना शुरू किया | दोनों एक साथ एक लय ताल पर नृत्य कर रहीं थी | नृत्य की हर लय  पर उनकी फ्रॉक ढेर सारे फूल खिलखिला रहे थे |  वो साथ -साथ गा भी रहीं थीं ” “गुडिया जायेगी ससुराल लेकिन रो -रो कर”| इस गुडिया को   ससुर , जेठ , देवर जो भी बुलाता है वो  ससुराल नहीं जाती है | बाद  पति बुलाते हैं तो हँसते – हँसते जाती है |  ऐसा ही एक गीत हमारे समय में गाया जाता था भरी दुपहरी मैं न जाऊं रे डोला पिछवाड़े रख दो | जिसे चांदनी फिल्म में ” मैं  ससुराल नहीं जाउंगी ‘शब्दों  के साथ श्रीदेवी पर बहुत खूबसूरती से फिल्माया गया था | तब से लेकर अब तक हर गीत के बोल थोड़े बहुत अलग भले ही हों पर भाव वही है …. गुडिया जानती है की ससुराल में उसे प्यार करने वाला सिर्फ पति ही है | या यूँ कहें कि पति नहीं पूंछता तो ससुराल में कोई नहीं पूंछता,  लेकिन बहुत सी गुड़ियाएं ऐसी भी हैं जिनका पति भी प्यार नहीं करता , उन्हें हर हाल  में रो के जाना है और रो के  जीना हैं |

 मेरा ध्यान एक और  गुडिया पर चला गया ,  जिसका पति उसे बहुत मारता रहा  है … और मारने के बाद उससे पत्नी धर्म निभाने की फरमाइश भी करता रहा है | उसकी नज़र में ये गलत नहीं … आखिर वो अपनी पत्नी से प्यार करता है | तन और मन से टूटी गुड़िया  ने आखिरकार बच्चों के साथ अलग रहने का फैसला किया , ससुराल में सभी ने किनारा कर लिया | गुड़िया  तीन साल से एक कमरे के किराए के मकान में अपने बच्चों के साथ रह कर उन्हें पढ़ा रही है |  खर्चे के लिए उसने छोटी नौकरी कर ली  | तीन साल में पति ने एक पैसा भी नहीं दिया | एक दिन भाई ने  भावुक हो कर उसे परिवार का वास्ता दे कर पति के पास जाने को कहा | भाई के आँसुओं  का असर हुआ या समाज का डर  , गुड़िया  वापस पति के पास चली गयी |  अभी कुछ दिन पहले  ही पता चला गुड़िया हॉस्पिटल में है | वहाँ  जा कर देखा कि गुडिया के शरीर पर चोटों के अनगिनत निशान हैं , जबकि गुडिया ने बयान दिया  वो गिर गयी थी | अकसर गुड़ियाएं सीढ़ी से गिरती रही हैं | गुडिया की माँ का रुदन जारी  था | वो दामाद को कोस रही थी , ” अरे मर जाए तो कम से कम हम अपनी लड़की को रख तो लेंगे ,नहीं तो समाज कहेगा लड़की में ही कोई दोष था तभी आदमी को छोड़ मायके में पड़ी है | कैसा है ये समाज , जो दूसरों की बेटियों को घुट -घुट कर जीने को विवश करता है | ये समाज हब सब से मिलकर बना है | कहीं न कहीं हम सब दोषी हो जाते हैं जब हमारी आपसी बात इस प्रश्न के साथ शुरू होती है , ” फ़लाने  की गुडिया की तो शादी हो गयी थी , वो मायके में क्या कर रही है ?

                                               तभी मेरी तन्द्रा टूटी जब वो दोनों बच्चियां मेरा हाथ पकड़ कर खींच रही थी , ” आंटी  डांस कैसा लगा ?” उनके खिले हुए चेहरे और फ्रॉक के मुस्कुराते फूलों को देख कर मैंने कहा , ” तुम्हारा डांस तो बहुत अच्छा था पर मेरी बच्चियों इस गाने के बोल बदलने होंगे , ” गुडिया रो-रो के ससुराल नहीं और  रो , रो के तो वहां बिलकुल नहीं रहेगी |

मेरी बात का अर्थ न समझते हुए वो खिलखिला उठीं | मैं मन ही मन सोचने लगी , ” गुडिया , तुम्हारी इस हंसी को बरकरार रखने की जिम्मेदारी , हमारी है , पूरे समाज की है |

वंदना बाजपेयी

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filed under- women empowerment, domestic violence

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