सिम्मों -(भाग -1)


बचपन में जब मैंने फिल्म “हाथी मेरे साथी “देखी थी तो मुझे इंसान और जानवर का ये प्यार भरा रिश्ता बहुत भाया  था | पर ऐसा रिश्ता सिल्वर स्क्रीन से निकल कर मुझे साक्षात देखने को मिलेगा , इसका मुझे आभास नहीं था |  सिम्मों , यूँ तो एक गाय थी ,एक मूक पशु , पर उसका और अम्माँ जी का एक अटूट बंधन  बन गया था ,वो रिश्ता जीवन पर्यंत चला |

सिम्मों -(भाग -1)

सिम्मों -भाग -1

                                                  फोटो क्रेडिट -विकिमीडिया कॉमन्स

 एक समय था जब मुझे हर जानवर जैसे  कुत्ता , बिल्ली , बकरी , यहाँ तक की गाय से भी
डर लगता था | पर सिम्मों को घर लाने का सुझाव मैंने ही दिया था | मैंने निरोगधाम
में देसी नस्ल की श्यामा गाय के दूध के गुणों के बारे में पढ़ा था , बस गाय
  शुद्ध चारा खाती हो , कूड़ा  न खाती हो … मुझे लगा छोटी दीदी की बिमारी के
इलाज के लिए शायद घर में ही एक गाय पाल लेनी चाहिए | 




अम्माँ  जी को मेरा प्रस्ताव
बहुत अच्छा लगा | पहले भी उन्होंने कई बार  गाय पाली हुई थीं , मोह बढ़ जाता इसलिए पालना
छोड़ दिया था | परन्तु मेरे प्रस्ताव  से एक बार फिर से उनकी “ पुनीत प्रीत” जाग उठी |
अम्माँ
 जी का आदेश था की बछिया लायी जाए
ताकि उसे
   शुरू से पाले | आस –पास के
गाँवों में खबर भिजवाई गयी | बड़ी बुआ सास के गाँव पडरी
 से जैसी चाहते थे वैसे बछिया मिल भी गयी | घर
में उसके स्वागत की तैयारियाँ
 होने लगीं |
पक्के आँगन पर जिसपर
  संगमरमर के टाइल्स
लगे थे , इंटें बिछाई जाने लगी , जिससे उसको खड़े होने में दिक्कत न हो | उसकी
देखभाल के लिए गाँव का एक रिश्तेदार भी बुला लिया गया , गोबर ले जाने वाली से बात
तय हो गयी |


पडरी से जब बुआ सास और चच्चू  उसे
ले कर आये |  उसके आते ही अम्माँ जी
 ने बड़े
प्यार से उसका नामकरण भी कर दिया .. “सिम्मो” | यहाँ से ही शुरू हुई एक नयी प्रेम
कथा “ सिम्मों और अम्मा जी ” 
 की | छोटी सी
सिम्मो मुझे भी बड़ी प्यारी लगी थी , पर उससे ज्यादा भेंट मेरी नहीं हो पायी
क्योंकि अगले ही दिन हमें रांची के लिए निकलना था | इस बीच फोन पर सिम्मो के
हालचाल मिलते रहे | अम्माँ जी की बातों का केंद्र सिम्मों ही रहती | कैसे खाती है
, कैसे सानी होती हैं , भूसा , चने का आटा कहाँ से मंगाते हैं आदि –आदि | 



जब हमारा
वापस घर आना हुआ तब तक सिम्मों बड़ी हो चुकी थी | हम लोग उसे अपरिचित लगे , उसने थोडा
सींग दिखाने  की कोशिश करी पर अम्माँ  जी के साथ हिलमिल कर बात करते देख वो आश्वस्त हो
गयी | पतिदेव तो उससे तुरंत हिल मिल गए पर मुझे उसके बड़े –बड़े सींगों से थोडा सा
डर लगा | अम्मां
 जी उसकी पीठ –पर हाथ फेर
कर उसे समझाती
 रहीं , “ सिम्मो , देखो
भाभी आई हैं , इनके हाथ से अच्छे से खा लेना , परेशांन
 न करना | पता नहीं क्यों मुझे लगा शायद सिम्मों
ने उनकी बात सुनकर ‘ हाँ’ में सर हिलाया है | क्या बेजुबान प्राणी भाषा समझते हैं
, सोचते हुए मैं अपने कमरे में आ गयी | असली मुसीबत
 दूसरे दिन शुरू हुई , जब अम्माँ जी  ने आदेश दिया कि घी , गुड लगा कर सिम्मों को पहली
रोटी अपने हाथ से तुम खिलाओगी , घर की बहु
 खिलाती है तो बरकत होती है | ध्यान रहे जमीन पर मत रखना , अपने हाथ से
खिलाना |


 मैंने हाँ में सर हिला दिया
पर मुझे अगली सुबह के लिए घबराहट होने लगी | मायके में माँ तो गाय को अपने हाथ
 से खिलाती थीं पर मैंने ये काम अभी तक किया ही
नहीं था | जब भी माँ ने कहा तो मैंने
  आप
खिलाइए मैं आप का हाथ पकड़ लेती हूँ , कह कर खुद से खिलाने की कभी कोशिश नहीं की |
पर ये ससुराल थी , परीक्षा की घडी थी , यहाँ तो ये नहीं कह सकती थी कि आप खिलाइए मैं आप की कलाई पकड लेती हूँ  | राम –राम
करते हुए मैं सुबह रोटी ले कर सिम्मों के पास पहुंची तो उसके बड़े –बड़े सींग देख कर
मैं डर गयी |


अम्माँ   जी वहीँ खड़ी थीं,
मैंने सिम्मों को रोटी खिलाने के लिए हाथ आगे बढाया सिम्मों ने झट से पूरा मुंह
खोल दिया …. मुझे लगा ये मेरा हाथ खा
 
डालेगी , डर  के मारे रोटी हाथ से छूट कर जमीन पर गिर गयी | अम्माँ  जी ने हल्के गुस्से से मेरी तरफ देखा पर कहा कुछ
नहीं , देवर को बुला कर कहा , “ तुम खिला दो , कल से हमारी सिम्मो जमीन पर गिरी
रोटी नहीं खाएगी , बिना मुँह की है तो क्या उसकी कोई इज्ज़त नहीं है ‘| मुझे पता था
ये डांट मेरे लिए है पर शायद कल मुझे न खिलाना पड़े ये सोच कर मुझे थोड़ी तसल्ली थी


गाय का गोबर साफ़ करने के लिए जो गाँव के रिश्तेदार रहते थे वो  देवर लगते था ,
उनसे
 गाय की सानी कैसे करते हैं , मैं सीखने
लगी | अम्माँ
 जी को ये देखकर ख़ुशी हुई |
उन्होंने प्यार से मुझे अपने पास बुलाया , “ देखो अपनी सिम्मों की छवि कितनी
न्यारी
 है , आस – पड़ोस के लोग तारीफ करते
हैं इसकी बनक की , आँखे कितनी सुंदर गढ़ी हैं भगवान् ने | गाय को  इस नज़र से मैंने
पहले कभी देखा नहीं था पर अम्मां
 के कहने
पर ध्यान दिया … वाकई बहुत सुंदर आँखे थी सिम्मों की … बोलती हुई सी | अगले
दिन मैं सुबह जल्दी उठ कर रोटी बना कर सिम्मों के लिए ले गयी ताकि अम्माँ जी खुश
हो जाए , पर फिर वही ढ़ाक के तीन पात , जैसे ही उसने मुँह खोला मैं घबरा गयी और
रोटी जमीन पर गिर गयी , सिम्मों ने जमीन से ही मुँह में भर ली | मैं खुश थी कि
अम्माँ जी को पता नहीं चला | अम्माँ
  जी ने
पूंछा सिम्मों
 को रोटी खिला दी | मैंने
हाँ में सर हिला दिया | अंदर ही अंदर मेरा मन कह रहा था “ अश्वत्थामा मारा गया
कितु … हाथी” वाला ये युधिष्ठरी झूठ है पर अम्माँ
 जी की नाराजगी को झेलने की हिम्मत मुझमें नहीं
थी | 


तरीका काम कर गया ये सोच कर अगली सुबह मैं फिर सिम्मों के पास  रोटी ले कर पहुँच गयी | पर ये क्या? अम्माँ जी
वहां पहले से ही
  मौजूद  थी | पता नहीं उन्हें शक हो गया था या सिम्मों
ने जुगाली के साथ मेरी शिकायत कर दी थी | मुझे देख कर मुस्कुरा कर बोलीं , “ हाँ ,
हाँ , आओ , खिलाओं , मुँह में खिलाना | मैं सिम्मों के सामने जाकर खड़ी हो गयी और
हाथ बढ़ाया | अम्माँ जी को देखकर सिम्मों और उत्साह में थी , आज तो उसने कल से भी
ज्यादा बड़ा मुँह खोला , फिर वही
 हुआ जो
होना था मेरे हाथों से रोटी छूट कर जमीन पर गिर गयी | ये देखकर अम्माँ का पारा
सातवें आसमान पर था , “ ये नहीं मानेगी , आज से इसे भी जमीन पर खाना देंगे , थाली
में नहीं , तब पता
 चलेगा , हमारी सिम्मों
को कैसा लगता है” | अम्माँ जी के तेज स्वर सुन कर देवर ,ननद तो अपने –अपने कमरों में
दुबक गए , पति देव आये तो अम्माँ जी ने उन्हें दूर से देख कर कहा , “ देखों तुम तो
पक्ष लेने बिलकुल ही मत आओ , शादी हो गयी है तुम्हारी तो हमसे बड़े नहीं हो गए हो ,
आज इसे जमीन पर ही खाना मिलेगा | 


पतिदेव तुरंत 
ही शादी की रस्में –कसमें भूल कर ऐसे भाग खड़े हुए कि हमें जानते ही न हों |
मैं अपने कमरे में आकर रोने लगी | बड़ी बुआ की याद आ रही थी , वो बताया करती थीं कि
उनकी सास ने कहा था कि , “ पल्ला सर पर नहीं टिकता , इसके सर पर कील ठोंक दो “|
ऐतिहात के तौर पर
 मैं  चार –चार क्लिप लगा कर अपना पल्ला सर पर ऐसे फिट
किये रहती
 कि सूत भर भी हटे न , पर ये
जमीन पर खाना देने की नयी मुसीबत के बारे में तो बड़ी
 बुआ ने भी कुछ नहीं बताया था | थोड़ी देर रोने के
बाद ये सोच कर कि यहाँ माँ नहीं हैं जो मुझे चुप कराने आएँगी , यहाँ सासू माँ है,
ज्यादा देर कमरे में बैठे रहे तो और डांट पड़ेगी ,
 तो खुद ही आँसूं पोंछ  कर बाहर आ गयी और रसोई के अन्य काम करने लगी | 


थोड़ी देर में  अम्मां जी ने अपने पास बुला
कर समझाया , “ जनावर प्यार का भूखा होता है , आँखों में डर नहीं प्यार भर के जाओ
फिर देखना कैसे झट से खा लेगी और तुम्हे पता भी नहीं चलेगा | शाम को पतिदेव पहले
पाली हुई गायों के “प्यार भरे किस्से “ सुनाते रहे | मन से डर कुछ कम हुआ
  | अगले दिन सुबह जब मैं रोटी ले कर गयी तो
अम्माँ जी सिम्मों की पीठ पर हाथ फेर रही थीं , मुझे हौसला देने के लिए पति , देवर
, ननद , ससुर सब खड़े थे | मैं रोटी ले कर आगे बढ़ी , अम्माँ
 जी सिम्मों 
के किस्से बताने लगी | बातों  ही
बातों ने मैंने हाथ बढ़ा दिया और सिम्मों ने मेरे हाथ से खा लिया | सारे लोग ताली
बजाने लगे | अरे ये कैसे हो गया सोच कर मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा | मैंने
जल्दी से अम्माँ जी के पैर छू लिए | मुझे लगा अम्माँ जी आज मेरी तारीफ करेंगी पर
उन्होंने मुझे उठाते हुए कहा , “ देखा कितनी समझदार है हमारी सिम्मों , कितनी
समझदारी से तुम्हारे हाथ से खा लिया |
  खैर
उसके बाद मैंने सिम्मों को
  एक – एक कर के
चार –पांच रोटियाँ खिलाई |

उस दिन दोपहर का काम निपटा कर जब उठी तो देखा लाईट  नहीं आ रही है अम्माँ जी का कमरा  गैलरी की तरफ पड़ता था |  खिड़की से 
थोड़ी बहुत हवा आ जायेगी ये सोच कर मैं वहाँ  चली गयी | अम्माँ जी  हाथ का पंखा डुला रहीं थीं | मैंने पंखा उनके
हाथ से ले लिया और डुलाने लगी | अम्माँ जी को नींद के झोंके आने लगे नींद में जाते
– जाते उन्होंने मुझे जीवन का महत्वपूर्ण उपदेश दिया ,
  “ इंसान हो या जानवर , कभी किसी को कुछ दो तो
इज्ज़त से देना “ |


क्रमश :

वंदना बाजपेयी 
फाउंडर- atootbandhann.com


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