योग- न हमारे राम और न तुम्हारे रहीम का है
न हमारे राम और न तुम्हारे रहीम का है।
रुग्ण मन,रुग्ण काया किस काम का बोलो,
शरीर,शरीर पहले है ये कहां——–
किसी हिन्दू या मुसलमान का है।
योग———-
न हमारे राम और न तुम्हारे रहीम का है।
आओ इसके आसन मे प्रेम है अपना ले,
स्वस्थ रहेगे ये मन सभी बना ले,
आखिर घर-घर है दवाखाना नही——
किसी वैद्य या हकिम का है।
योग———-
न हमारे राम और न तुम्हारे रहीम का है।
इसे घूँघट या पर्दानश़ी औरत मे हरगिज़ न बाँटिये,
क्योंकि योग———
हर शख्स़ और तंजीम का है।
योग——-
न हमारे राम और न तुम्हारे रहीम का है।
पुरी दुनिया हो उठी है कायल,
इसका फक्र है हमें,
क्योंकि हमारा योग एै”रंग”——-
न किसी रसिया न किसी चीन का है।
योग——-–
न हमारे राम और न तुम्हारें रहीम का है।
@@@रचयिता—–रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
